UPSC प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास
UPSC प्रारंभिक परीक्षा क्विज़ 27 अक्टूबर 2026: करेंट अफेयर्स MCQ
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आज के करेंट अफेयर्स पर आधारित 14 प्रश्न
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प्रश्न 1 / 14
1. स्क्रीनिंग (screening) का चरण केवल श्रेणी B की परियोजनाओं पर लागू होता है।
2. लोक सुनवाई (public hearing) राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (या किसी संघ राज्यक्षेत्र की प्रदूषण नियंत्रण समिति) की ओर से परियोजना स्थल पर या उसके निकट आयोजित की जाती है।
3. लोक सुनवाई की अध्यक्षता राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष के हाथ में होती है।
4. विशेषज्ञ अंकन समिति अंतिम EIA रिपोर्ट के साथ लोक परामर्श के परिणाम की भी संवीक्षा करती है, जिसमें लोक सुनवाई की कार्यवाही शामिल है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: चारों चरण क्रम से चलते हैं, स्क्रीनिंग, स्कोपिंग (scoping), लोक परामर्श (public consultation) और मूल्यांकन (appraisal), और स्क्रीनिंग केवल श्रेणी B की परियोजनाओं के लिए है।
कथन 2 सही है: सुनवाई का आयोजन SPCB, या संघ राज्यक्षेत्र की प्रदूषण नियंत्रण समिति, स्थल पर या उसके निकट, ज़िलेवार करती है। आवेदक के अनुरोध के 45 दिन के भीतर सुनवाई की कार्यवाही विनियामक प्राधिकरण को भेजी जाती है।
कथन 3 गलत है: सुनवाई की अध्यक्षता ज़िला मजिस्ट्रेट या उपायुक्त के हाथ में होती है, या ऐसे प्रतिनिधि के, जिसका रैंक अपर ज़िला मजिस्ट्रेट से नीचे न हो, या किसी ऐसे अन्य ज़िला-स्तरीय अधिकारी के, जिसे ज़िला मजिस्ट्रेट अधिकृत करें (परिशिष्ट IV, पैरा 4.0)। SPCB सुनवाई का आयोजन करता है, पर उसकी अध्यक्षता नहीं करता।
कथन 4 सही है: विशेषज्ञ अंकन समिति (या राज्य स्तर पर उसकी समकक्ष समिति) अंतिम EIA रिपोर्ट और ‘लोक सुनवाई की कार्यवाही सहित लोक परामर्श के परिणाम’ की संवीक्षा करती है।
विश्लेषण: अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी ज़िले में प्रस्तावित 1,605 MW की सुबनसिरी अपर जलविद्युत परियोजना के विरोध में 12 घंटे के बंद ने इस प्रक्रिया को चर्चा में ला दिया। द हिंदू की ख़बर के मुताबिक़, बंद के दौरान हुई हिंसा के बाद परियोजना पर होने वाली लोक सुनवाई रद्द कर दी गई।
अवधारणा नोट
EIA अधिसूचना, 2006 (S.O. 1533(E), 14 सितंबर 2006 को जारी) वह रास्ता तय करती है जिससे पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति की ज़रूरत वाली किसी परियोजना की जाँच होती है। इसके चार चरण ‘क्रमिक रूप से’ चलते हैं: स्क्रीनिंग (केवल श्रेणी B की परियोजनाओं के लिए), स्कोपिंग, लोक परामर्श और मूल्यांकन। श्रेणी A और श्रेणी B1 की सभी परियोजनाओं के लिए लोक परामर्श अनिवार्य है; कुछ अपवाद हैं, जैसे सिंचाई परियोजनाओं का आधुनिकीकरण। लोक परामर्श वह प्रक्रिया है जिससे ‘स्थानीय प्रभावित व्यक्तियों और परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों में युक्तिसंगत हित रखने वाले अन्य लोगों की चिंताओं’ का पता लगाया जाता है। इसके दो हिस्से हैं: स्थानीय प्रभावित लोगों के लिए स्थल पर या उसके निकट, ज़िलेवार लोक सुनवाई, और युक्तिसंगत हित रखने वाले अन्य लोगों से लिखित प्रतिक्रियाएँ। सुनवाई स्थगित नहीं की जा सकती, ‘जब तक कोई अप्रिय आपात स्थिति उत्पन्न न हो’, और तब भी केवल ज़िला मजिस्ट्रेट की सिफ़ारिश पर (परिशिष्ट IV, पैरा 3.3)। अगर एजेंसी यह रिपोर्ट करे कि सुनवाई इस तरह नहीं हो सकती कि स्थानीय लोगों के विचार ‘स्वतंत्र रूप से व्यक्त’ हो सकें, तो विनियामक प्राधिकरण यह तय कर सकता है कि परामर्श में सुनवाई को शामिल करना ज़रूरी नहीं है। स्थानीय लोगों के लिए लोक सुनवाई सहमति का क़ानूनी माध्यम है, और बाद में विशेषज्ञ समिति उसी के रिकॉर्ड पर भरोसा करती है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS3 पर्यावरण प्रभाव आकलन और संरक्षण; GS2 सहभागी शासन और स्थानीय समुदायों के अधिकार।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: लोक परामर्श, पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति, विशेषज्ञ अंकन समिति, स्थानीय सहमति।
सामान्य भूल: यह मान लेना कि सुनवाई की अध्यक्षता SPCB करता है; SPCB सुनवाई का आयोजन करता है, पर अध्यक्षता ज़िला मजिस्ट्रेट या ज़िला स्तर का कोई प्रतिनिधि करता है।
परीक्षा सुझाव: चारों चरण क्रम से याद रखें (स्क्रीनिंग, स्कोपिंग, लोक परामर्श, मूल्यांकन), और यह भी कि स्क्रीनिंग केवल श्रेणी B की परियोजनाओं पर लागू होती है।
साक्षात्कार का कोण: जब स्थानीय लोग कहें कि वे लोक सुनवाई में खुलकर नहीं बोल सके, तो क्या स्वीकृति की प्रक्रिया रुकनी चाहिए, चाहे परियोजना सामरिक महत्व की ही क्यों न हो?
प्रश्न 2 / 14
लिखत : विषय या विशेषता
1. कार्टाजेना प्रोटोकॉल : जीवित संशोधित जीवों का सुरक्षित प्रबंधन, परिवहन और उपयोग
2. नागोया प्रोटोकॉल : आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का उचित और न्यायसंगत बँटवारा
3. कैली फ़ंड : आनुवंशिक संसाधनों की डिजिटल अनुक्रम सूचना का वाणिज्यिक उपयोग करने वाली निजी क्षेत्र की संस्थाओं से अंशदान
4. कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता फ़्रेमवर्क : 2050 के लिए चार लक्ष्य (goals) और 2030 के लिए 23 लक्ष्य (targets)
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
तथ्य: युग्म 1 सही सुमेलित है: जैव सुरक्षा पर कार्टाजेना प्रोटोकॉल का उद्देश्य आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी से बने जीवित संशोधित जीवों (LMO) का सुरक्षित प्रबंधन, परिवहन और उपयोग है; इसे 29 जनवरी 2000 को अपनाया गया और यह 11 सितंबर 2003 को लागू हुआ।
युग्म 2 सही सुमेलित है: पहुँच और लाभ-साझाकरण (ABS) पर नागोया प्रोटोकॉल 29 अक्टूबर 2010 को जापान के नागोया में अपनाया गया और 12 अक्टूबर 2014 को लागू हुआ।
युग्म 3 सही सुमेलित है: कैली फ़ंड की स्थापना कैली में COP-16 के निर्णय 16/2 से हुई। इसका उद्देश्य DSI का वाणिज्यिक उपयोग करने वाली निजी क्षेत्र की संस्थाओं से अंशदान प्राप्त करना है, और इसकी कम से कम आधी राशि, जहाँ उपयुक्त हो, देशज लोगों और स्थानीय समुदायों की स्वयं चिह्नित ज़रूरतों पर ख़र्च होनी चाहिए।
युग्म 4 सही सुमेलित है: मॉन्ट्रियल में COP-15 के दूसरे भाग में निर्णय 15/4 से अपनाया गया KMGBF 2050 के लिए 4 लक्ष्य (goals) और 2030 के लिए 23 लक्ष्य (targets) तय करता है।
विश्लेषण: इस विषय पर आम तौर पर जाल यही होता है: कार्टाजेना (जैव सुरक्षा) और नागोया (लाभ-साझाकरण) को आपस में बदल देना। केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने आर्मेनिया के येरेवान में CBD के COP-17 के उच्च-स्तरीय खंड में भारत का राष्ट्रीय वक्तव्य दिया और कहा कि KMGBF को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप लागू किया जाना चाहिए।
अवधारणा नोट
जैव विविधता अभिसमय (CBD) पर 1992 के रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन में 150 सरकारी नेताओं ने हस्ताक्षर किए थे। इसके तीन उद्देश्य हैं: जैव विविधता का संरक्षण, उसके घटकों का सतत उपयोग, और आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का उचित और न्यायसंगत बँटवारा। येरेवान में COP-17 के साथ-साथ कार्टाजेना प्रोटोकॉल के पक्षकारों की 12वीं बैठक और नागोया प्रोटोकॉल के पक्षकारों की छठी बैठक भी चल रही है। कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता फ़्रेमवर्क (KMGBF) 19 दिसंबर 2022 को अपनाया गया। इसका लक्ष्य (Target) 3 कहता है कि 2030 तक स्थलीय और अंतर्देशीय जल क्षेत्रों के, तथा समुद्री और तटीय क्षेत्रों के, कम से कम 30 प्रतिशत हिस्से का संरक्षित क्षेत्रों और अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों (OECM) के ज़रिए प्रभावी संरक्षण हो। लक्ष्य (Goal) C आनुवंशिक संसाधनों, DSI और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान से होने वाले लाभों के उचित बँटवारे का है; लक्ष्य (Goal) D कार्यान्वयन के पर्याप्त साधनों का है, और यह हर साल $700 बिलियन के जैव विविधता वित्त अंतर का उल्लेख करता है। भारत में जैव विविधता अधिनियम, 2002 (2023 में संशोधित) तीन स्तरों के ज़रिए काम करता है: राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (2003 में स्थापित एक सांविधिक निकाय, चेन्नई स्थित), राज्य जैव विविधता बोर्ड और स्थानीय जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS3 संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण समझौते; GS2 बहुपक्षीय मंचों पर भारत का रुख़।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: 30x30, पहुँच और लाभ-साझाकरण, डिजिटल अनुक्रम सूचना, कार्यान्वयन के साधन।
सामान्य भूल: दोनों प्रोटोकॉल को आपस में बदल देना; कार्टाजेना जैव सुरक्षा (LMO) से जुड़ा है, नागोया पहुँच और लाभ-साझाकरण से।
परीक्षा सुझाव: हर लिखत को उसके COP से जोड़कर याद रखें: KMGBF को COP-15 (निर्णय 15/4, मॉन्ट्रियल) से और कैली फ़ंड को COP-16 (निर्णय 16/2, कैली) से।
साक्षात्कार का कोण: क्या डिजिटल अनुक्रम सूचना का उपयोग करने वाली कंपनियों के अंशदान से चलने वाला कोष, आनुवंशिक संसाधनों से होने वाले लाभ को उनका संरक्षण करने वाले समुदायों के साथ बाँटने का न्यायसंगत तरीक़ा है?
प्रश्न 3 / 14
कथन-I: भारत के संविधान के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जाएगा, जिस रीति से और जिन आधारों पर सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है, अन्यथा नहीं।
कथन-II: भारत के संविधान के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अलावा किसी अन्य निर्वाचन आयुक्त को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर ही पद से हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही है?
तथ्य: कथन-I सही है: अनुच्छेद 324(5) का पहला परंतुक कहता है कि CEC को ‘उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जाएगा, जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, अन्यथा नहीं’।
कथन-II सही है, किंतु कथन-I की व्याख्या नहीं करता: अनुच्छेद 324(5) का एक और परंतुक कहता है कि किसी अन्य निर्वाचन आयुक्त या प्रादेशिक आयुक्त को ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर ही पद से हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं’। यह बाक़ी आयुक्तों के लिए एक अलग सुरक्षा है; CEC को न्यायाधीश जैसी सुरक्षा मिलने का कारण यह नहीं है।
विश्लेषण: सर्वोच्च न्यायालय में एक संयुक्त जवाबी हलफ़नामे में ECI, CEC और दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने अनुच्छेद 324(5) का सहारा लेकर तर्क दिया कि CEC को कामकाज से रोकने की याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। दोनों पक्षों के रुख़ एक लंबित मामले में दिए गए तर्क भर हैं; न्यायालय ने कोई निष्कर्ष नहीं दिया है।
अवधारणा नोट
अनुच्छेद 324(5) में अलग-अलग मज़बूती वाले दो सुरक्षा-उपाय हैं। पहला परंतुक मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी सुरक्षा देता है: उसे ‘उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जाएगा, जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, अन्यथा नहीं’। एक और परंतुक बाक़ी निर्वाचन आयुक्तों और प्रादेशिक आयुक्तों को दूसरे तरीक़े से सुरक्षा देता है: उन्हें ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर ही पद से हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं’। यानी CEC का कार्यकाल सीधे संविधान से सुरक्षित है, जबकि बाक़ी आयुक्तों को हटाना कुछ हद तक CEC की सिफ़ारिश पर निर्भर है। आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 का विषय हैं। सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे मामले में याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े फ़ैसले बाक़ी दो आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। ECI का कहना है कि ऐसे सभी फ़ैसले सर्वसम्मति से हुए, और मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फ़ॉर्म 6 में कोई संशोधन नहीं किया गया।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS2 संवैधानिक निकाय (निर्वाचन आयोग) और चुनाव सुधार; GS4 संस्थाओं की स्वतंत्रता और ईमानदारी (probity)।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: कार्यकाल की सुरक्षा, संस्थागत स्वतंत्रता, सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव।
सामान्य भूल: यह मान लेना कि हर निर्वाचन आयुक्त को न्यायाधीश जैसी सुरक्षा मिली है; यह सुरक्षा केवल CEC को है, और बाक़ी आयुक्तों को CEC की सिफ़ारिश पर हटाया जा सकता है।
परीक्षा सुझाव: अनुच्छेद 324(5) को दोनों परंतुकों के साथ पढ़ें; कथन-I/II वाले प्रश्न में दो सही कथन ऐसे भी हो सकते हैं जो एक-दूसरे की व्याख्या न करें।
साक्षात्कार का कोण: क्या बाक़ी निर्वाचन आयुक्तों को भी CEC जैसी कार्यकाल की सुरक्षा मिलनी चाहिए?
प्रश्न 4 / 14
1. डिजिटल वैयक्तिक डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड की स्थापना करता है।
2. डिजिटल वैयक्तिक डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1) के खंड (j) को प्रतिस्थापित करता है।
3. न्यायमूर्ति के. एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्निहित अंग के रूप में संरक्षित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: DPDP अधिनियम, 2023 (2023 का अधिनियम संख्यांक 22) की धारा 18 भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड की स्थापना करती है।
कथन 2 सही है: अधिनियम की धारा 44(3) RTI अधिनियम, 2005 की धारा 8(1) के खंड (j) की जगह यह खंड रखती है: ‘ऐसी सूचना जो वैयक्तिक सूचना से संबंधित है’।
कथन 3 सही है: पुट्टस्वामी मामले (24 अगस्त 2017) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्निहित अंग के रूप में संरक्षित है।
विश्लेषण: सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की अनुच्छेद 32 के तहत दायर रिट याचिका पर नोटिस जारी किया है। याचिका अधिनियम के कई प्रावधानों को चुनौती देती है, जिनमें धारा 44(3) भी है। न्यायालय ने किसी प्रावधान पर रोक नहीं लगाई है और कोई निष्कर्ष नहीं दिया है; चुनौती के आधार याचिकाकर्ताओं के तर्क हैं।
अवधारणा नोट
पुट्टस्वामी फ़ैसले, यानी न्यायमूर्ति के. एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ (24 अगस्त 2017) के ज़रिए निजता का अधिकार भारत के डेटा क़ानून का संवैधानिक आधार बना। इस फ़ैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने निजता को अनुच्छेद 21 के तहत प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्निहित अंग के रूप में संरक्षित माना। इसके बाद डिजिटल वैयक्तिक डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (2023 का अधिनियम संख्यांक 22, दिनांक 11 अगस्त 2023) आया। इसकी धारा 18 भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड की स्थापना करती है। धारा 44(3) एक दूसरे क़ानून में बदलाव करती है: यह RTI अधिनियम, 2005 की धारा 8(1) के खंड (j) की जगह ‘ऐसी सूचना जो वैयक्तिक सूचना से संबंधित है’ रखती है। DNPA की याचिका कई आधारों पर अधिनियम को चुनौती देती है। उसका तर्क है कि अधिनियम में पत्रकारिता के लिए कोई छूट नहीं है, धारा 36 के तहत सूचना माँगने की केंद्र की शक्ति पर कोई न्यायिक निगरानी नहीं है, और नई धारा 8(1)(j) प्रकटीकरण पर एकमुश्त रोक है। न्यायालय ने अभी केवल नोटिस जारी किया है। मुख्य परीक्षा के उत्तर में यह मामला दो अधिकारों को आमने-सामने रखता है: अपने वैयक्तिक डेटा पर व्यक्ति का नियंत्रण, और नागरिक का सूचना का अधिकार। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों और मीडिया के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना होगा।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS2 मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21), पारदर्शिता और RTI अधिनियम; GS3 डेटा शासन और साइबर सुरक्षा।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: सूचनात्मक निजता, डेटा फ़िड्युसरी, सूचना का अधिकार, आनुपातिकता।
सामान्य भूल: यह मान लेना कि DPDP अधिनियम ने RTI अधिनियम को नहीं छुआ; धारा 44(3) उसकी धारा 8(1)(j) को प्रतिस्थापित करती है।
परीक्षा सुझाव: तीनों को जोड़कर याद रखें: पुट्टस्वामी (अनुच्छेद 21), DPDP अधिनियम, 2023 (धारा 18 के तहत बोर्ड) और RTI में संशोधन (धारा 44(3))।
साक्षात्कार का कोण: क्या वैयक्तिक डेटा की सुरक्षा से पत्रकारिता और सूचना के अधिकार की जगह सिकुड़ती है?
प्रश्न 5 / 14
1. इसने भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद अधिनियम, 1956 का निरसन किया।
2. अधिनियम के तहत गठित स्नातक आयुर्विज्ञान शिक्षा बोर्ड चिकित्सा संस्थानों का मूल्यांकन और रेटिंग करता है।
3. आयुर्विज्ञान मूल्यांकन और रेटिंग बोर्ड आर्थिक दंड लगा सकता है, प्रवेश क्षमता घटा सकता है या प्रवेश रोक सकता है।
4. आचार और आयुर्विज्ञान रजिस्ट्रीकरण बोर्ड राष्ट्रीय रजिस्टर रखता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: NMC अधिनियम, 2019 (2019 का अधिनियम संख्यांक 30) ने भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद अधिनियम, 1956 का निरसन किया और भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद को भंग कर दिया।
कथन 2 गलत है: UGMEB और PGMEB मानक और पाठ्यक्रम तय करते हैं; संस्थानों का मूल्यांकन और रेटिंग आयुर्विज्ञान मूल्यांकन और रेटिंग बोर्ड (MARB) करता है।
कथन 3 सही है: धारा 26 के तहत MARB के कार्यों में ‘चेतावनी जारी करना, आर्थिक दंड अधिरोपित करना, प्रवेश क्षमता घटाना या प्रवेश रोकना और मान्यता वापस लेने के लिए आयोग से सिफ़ारिश करना’ शामिल है।
कथन 4 सही है: आचार और आयुर्विज्ञान रजिस्ट्रीकरण बोर्ड (EMRB) राष्ट्रीय रजिस्टर रखता है और पेशेवर नैतिकता की निगरानी करता है।
विश्लेषण: द हिंदू का संपादकीय चिकित्सा शिक्षा के मानकों का अनुरक्षण विनियम, 2023 (MSMER) वापस लेने के लिए NMC की आलोचना करता है। संस्थानों पर जुर्माना MARB विनियम, 2023 के तहत बना हुआ है, हर अननुपालन पर ₹1 करोड़ तक। जो हटा है, वह MSMER का व्यक्तिगत जुर्माना है: झूठी घोषणाओं या रिकॉर्ड के लिए संकाय सदस्यों, प्रमुखों और डॉक्टरों पर ₹5 लाख तक।
अवधारणा नोट
राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग अधिनियम, 2019 ने भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद की जगह एक आयोग बनाया, और उसकी समग्र निगरानी में चार स्वायत्त बोर्ड (धारा 16)। स्नातक और स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा बोर्ड मानक और पाठ्यक्रम तय करते हैं, और चिकित्सा संस्थानों के अनिवार्य वार्षिक प्रकटीकरण के मानदंड निर्धारित करते हैं। आयुर्विज्ञान मूल्यांकन और रेटिंग बोर्ड संस्थानों का मूल्यांकन और रेटिंग करता है और अनुमतियाँ देता है। धारा 26 के तहत वह चेतावनी दे सकता है, जुर्माना लगा सकता है, प्रवेश क्षमता घटा सकता है, प्रवेश रोक सकता है और मान्यता वापस लेने की सिफ़ारिश कर सकता है; उसे चिकित्सा संस्थानों का मूल्यांकन और रेटिंग नियमित अंतराल पर प्रकाशित भी करनी होती है। आचार और आयुर्विज्ञान रजिस्ट्रीकरण बोर्ड राष्ट्रीय रजिस्टर रखता है और पेशेवर नैतिकता की निगरानी करता है। अधिनियम दो राष्ट्रीय परीक्षाओं का भी प्रावधान करता है: प्रवेश के लिए NEET और नेशनल एग्ज़िट टेस्ट, NExT। विनियम आयोग धारा 57 के तहत बनाता है। किसी बोर्ड के फ़ैसले से व्यथित व्यक्ति साठ दिन के भीतर आयोग के पास अपील कर सकता है (धारा 22(3))। MARB विनियम, 2023 के तहत MARB के आदेश के विरुद्ध अपील पंद्रह दिन के भीतर होती है, और उसके बाद तीस दिन के भीतर केंद्र सरकार के पास आगे अपील की जा सकती है। MSMER वापस लिए जाने के बाद भी वार्षिक प्रकटीकरण रिपोर्ट अधिनियम की धारा 24(i) और 25(h) के तहत जारी है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS2 स्वास्थ्य, शिक्षा और सांविधिक नियामक निकाय; GS4 सार्वजनिक संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: मूल्यांकन और रेटिंग, स्व-प्रकटीकरण, नियामक दोहराव, संस्थागत जवाबदेही।
सामान्य भूल: कॉलेजों की रेटिंग का काम शिक्षा बोर्डों के ज़िम्मे मान लेना; मूल्यांकन और रेटिंग MARB करता है, जबकि UGMEB और PGMEB मानक और पाठ्यक्रम तय करते हैं।
परीक्षा सुझाव: धारा 16 के चारों बोर्ड एक-एक काम के साथ याद रखें: UGMEB और PGMEB (मानक), MARB (मूल्यांकन और रेटिंग), EMRB (रजिस्टर और नैतिकता)।
साक्षात्कार का कोण: क्या प्रकटीकरण से जुड़ा कोई विनियम वापस लेने से निगरानी आसान होती है, या कमज़ोर?
प्रश्न 6 / 14
1. CII ऐसा कंप्यूटर संसाधन है, जिसके अक्षम या नष्ट होने का राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, लोक स्वास्थ्य या संरक्षा पर दुर्बलकारी प्रभाव पड़ेगा।
2. राष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र (NCIIPC) अधिनियम की धारा 70ख के तहत स्थापित राष्ट्रीय नोडल एजेंसी है।
3. CERT-In सेवा प्रदाताओं, मध्यवर्तियों, डेटा केंद्रों और निगमित निकायों को निर्देश दे सकता है।
4. CERT-In द्वारा जारी निर्देशों के तहत साइबर घटनाओं की सूचना, उनका पता चलने के 24 घंटे के भीतर देनी होती है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: धारा 70 के तहत CII ऐसा कंप्यूटर संसाधन है, ‘जिसके अक्षम या नष्ट होने का राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, लोक स्वास्थ्य या संरक्षा पर दुर्बलकारी प्रभाव पड़ेगा’।
कथन 2 गलत है: NCIIPC की स्थापना धारा 70क के तहत हुई। धारा 70ख में CERT-In का प्रावधान है, जो साइबर सुरक्षा घटनाओं से निपटने वाली राष्ट्रीय एजेंसी है।
कथन 3 सही है: धारा 70ख(6) के तहत CERT-In सेवा प्रदाताओं, मध्यवर्तियों, डेटा केंद्रों और निगमित निकायों से सूचना माँग सकता है और उन्हें निर्देश दे सकता है।
कथन 4 गलत है: CERT-In के 28 अप्रैल 2022 के निर्देशों के तहत साइबर घटनाओं की सूचना, उनका पता चलने के 6 घंटे के भीतर देनी होती है।
विश्लेषण: द हिंदू में ख्याति सिंह का तर्क है कि कुडनकुलम डेटा लीक दिखाता है कि भारत के साइबर नियम संचालक (ऑपरेटर) पर बाध्यकारी हैं, उन ठेकेदारों पर नहीं जिनके पास उसका डेटा रहता है। NPCIL का कहना है कि यह सामग्री केवल पारंपरिक बैलेंस ऑफ़ प्लांट (Balance of Plant) की साझा सेवा सुविधाओं से जुड़ी है, किसी नाभिकीय संरक्षा या सुरक्षा प्रणाली से नहीं।
अवधारणा नोट
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना के लिए परत-दर-परत सुरक्षा कवच बनाता है। धारा 70 के तहत समुचित सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी करके CII को प्रभावित करने वाले किसी कंप्यूटर संसाधन को संरक्षित प्रणाली घोषित कर सकती है। ऐसी प्रणाली तक अनधिकृत पहुँच दस वर्ष तक के कारावास और जुर्माने से दंडनीय है, और उसकी सुरक्षा पद्धतियाँ सूचना प्रौद्योगिकी (संरक्षित प्रणालियों के लिए सूचना सुरक्षा पद्धतियाँ और प्रक्रियाएँ) नियम, 2018 तय करते हैं। धारा 70क में CII संरक्षण के लिए एक राष्ट्रीय नोडल एजेंसी का प्रावधान है, और राष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र इसी के तहत स्थापित हुआ। धारा 70ख CERT-In को साइबर सुरक्षा घटनाओं से निपटने वाली राष्ट्रीय एजेंसी बनाती है; उसके निर्देशों का पालन न करने पर एक वर्ष तक का कारावास, या ₹1 लाख तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं (धारा 70ख(7))। CERT-In के 28 अप्रैल 2022 के निर्देश जारी होने के 60 दिन बाद लागू हुए। कुडनकुलम के साथ ऐसा पहले भी हो चुका है: NPCIL के मुताबिक़ CERT-In ने 4 सितंबर 2019 को उसे बताया था कि उसके प्रशासनिक नेटवर्क के एक PC में मैलवेयर है। शोधकर्ताओं ने इसकी पहचान डीट्रैक (Dtrack) के रूप में की, जिसे कथित तौर पर लाज़रस (Lazarus) समूह ने विकसित किया था। डिजिटल वैयक्तिक डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 वैयक्तिक डेटा का क़ानून है; यह महत्वपूर्ण अवसंरचना का क़ानून नहीं है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS3 साइबर सुरक्षा और महत्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा; GS3 नाभिकीय ऊर्जा।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना, संरक्षित प्रणाली, आपूर्ति-शृंखला का जोखिम, घटनाओं की सूचना देना।
सामान्य भूल: दोनों एजेंसियों को आपस में बदल देना; NCIIPC धारा 70क के तहत है और CERT-In धारा 70ख के तहत।
परीक्षा सुझाव: CERT-In को सूचना देने की समय-सीमा 6 घंटे याद रखें, और यह भी कि संरक्षित प्रणाली की घोषणा राजपत्र में अधिसूचना से होती है।
साक्षात्कार का कोण: जब किसी नाभिकीय संयंत्र के दस्तावेज़ किसी ठेकेदार के पास हों, तो उनकी सुरक्षा का जवाब किसे देना चाहिए?
प्रश्न 7 / 14
कथन-I: राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (NHRC) द्वारा केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों को जारी की गई एडवाइज़री में सिफ़ारिशें होती हैं, और यह न्यायालय का आदेश नहीं है।
कथन-II: मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत NHRC के कार्यों में मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए रक्षोपायों का पुनर्विलोकन करना और उनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए उपायों की सिफ़ारिश करना शामिल है, और एडवाइज़री ऐसी ही सिफ़ारिशों का एक समूह है।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही है?
तथ्य: कथन-I सही है: NHRC की एडवाइज़री में सिफ़ारिशें होती हैं; यह न्यायालय का आदेश नहीं है। आयोग प्राधिकारियों से अपनी सिफ़ारिशें लागू करने और की गई कार्रवाई की रिपोर्ट (Action Taken Report) देने को कहता है।
कथन-II सही है और कथन-I की व्याख्या करता है: अधिनियम की धारा 12 में आयोग के कार्य गिनाए गए हैं। उनमें से एक है ‘मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए संविधान या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन उपबंधित रक्षोपायों का पुनर्विलोकन करना और उनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए उपायों की सिफ़ारिश करना’। अधिनियम इस कार्य को उपायों की सिफ़ारिश के रूप में रखता है, और एडवाइज़री ऐसी ही सिफ़ारिशों का समूह है; इसीलिए वह न्यायालय का आदेश नहीं है।
विश्लेषण: NHRC ने ‘Women’s Safety at Work and Public Spaces’ (कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा) पर एक एडवाइज़री जारी की है। यह केंद्रीय मंत्रालयों के सचिवों, रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष, और सभी राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों के मुख्य सचिवों और प्रशासकों को भेजी गई है, और आयोग ने दो महीने के भीतर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट माँगी है।
अवधारणा नोट
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत काम करता है; यह अधिनियम 1994 का अधिनियम संख्यांक 10 है। अधिनियम की धारा 12 में आयोग के कार्य गिनाए गए हैं। उनमें से एक है ‘मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए संविधान या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन उपबंधित रक्षोपायों का पुनर्विलोकन करना और उनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए उपायों की सिफ़ारिश करना’। यह कार्य सलाहकारी प्रकृति का है: आयोग पुनर्विलोकन करता है और सिफ़ारिश करता है, और एडवाइज़री में सिफ़ारिशें होती हैं; वह न्यायालय का आदेश नहीं है। ताज़ा एडवाइज़री ‘Women’s Safety at Work and Public Spaces’ पर है। यह केंद्रीय मंत्रालयों के सचिवों को भेजी गई है (इन मंत्रालयों में महिला एवं बाल विकास, शिक्षा, गृह, श्रम एवं रोज़गार, और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण शामिल हैं), साथ ही रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष को, और सभी राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों के मुख्य सचिवों और प्रशासकों को। इसमें आठ क्षेत्र शामिल हैं: महिलाओं की सुरक्षा और यौन उत्पीड़न के प्रति जागरूकता, अवसंरचना, आसपास मौजूद लोगों का हस्तक्षेप (bystander intervention), पुलिस की भूमिका, पीड़ितों (survivors) को सहायता, महिलाओं के विरुद्ध साइबर अपराध, दीर्घकालिक सुधार और अन्य उपाय। आयोग ने प्राधिकारियों से कहा है कि वे उसकी सिफ़ारिशें लागू करें और दो महीने के भीतर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट दें।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS2 सांविधिक निकाय और कमज़ोर वर्गों का संरक्षण; GS1 महिलाओं से जुड़े मुद्दे; GS4 सार्वजनिक स्थानों और कार्यस्थलों पर नैतिकता।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: सिफ़ारिशी निकाय, की गई कार्रवाई की रिपोर्ट, आसपास मौजूद लोगों का हस्तक्षेप, सुरक्षित कार्यस्थल।
सामान्य भूल: NHRC की एडवाइज़री को न्यायालय का आदेश मान लेना; इसमें सिफ़ारिशें होती हैं, और आयोग उन पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट माँगता है।
परीक्षा सुझाव: अधिनियम की दोहरी पहचान याद रखें: मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 का क्रमांक 1994 का अधिनियम संख्यांक 10 है, और इसकी धारा 12 में आयोग के कार्य गिनाए गए हैं।
साक्षात्कार का कोण: क्या NHRC की सिफ़ारिशों को बाध्यकारी बना देना चाहिए, या उनका प्रेरक स्वरूप आयोग के लिए ज़्यादा उपयोगी है?
प्रश्न 8 / 14
1. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) शिरा रक्त (venous blood) के नमूनों में हीमोग्लोबिन मापता है।
2. NFHS-5 (2019-21) में 6-59 महीने के बच्चों में एनीमिया-ग्रस्त बच्चों का अनुपात NFHS-4 की तुलना में कम पाया गया।
3. संशोधित एनीमिया मुक्त भारत रणनीति के तहत जोड़ा गया सातवाँ लाभार्थी समूह 10-19 वर्ष के किशोर हैं।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 गलत है: NFHS केशिका रक्त (capillary blood) की जाँच करता है, और उसकी अपनी फ़ैक्ट शीट चेतावनी देती है कि उसके नतीजों की ‘शिरा रक्त का उपयोग करने वाले अन्य सर्वेक्षणों से तुलना करने की ज़रूरत नहीं’।
कथन 2 गलत है: 6-59 महीने के बच्चों में एनीमिया NFHS-4 के 58.6 प्रतिशत से बढ़कर NFHS-5 में 67.1 प्रतिशत हो गया, यानी ऐसे लगभग दो-तिहाई बच्चे।
कथन 3 गलत है: किशोरियाँ और किशोर (10-19 वर्ष) 2018 की 6x6x6 रणनीति के छह समूहों में पहले से शामिल थे; 7x7x7 के तहत जोड़ा गया समूह 0-6 महीने के कम जन्म-भार (LBW) वाले शिशु हैं।
विश्लेषण: द हिंदू में सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोषण के पाँच विशेषज्ञों का तर्क है कि संशोधित रणनीति के निवारक पक्ष के रूप में डबल फ़ोर्टिफ़ाइड नमक का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए, ख़ासकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के ज़रिए। NFHS-6 (2023-24) में एनीमिया का कोई आँकड़ा नहीं है; स्वास्थ्य मंत्रालय ने शिरा रक्त का उपयोग करने वाले ICMR के एक सर्वेक्षण के आँकड़े अपनाने का फ़ैसला किया है, इसलिए दोनों को सीधे-सीधे एक रुझान के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।
अवधारणा नोट
पाँचवाँ राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) एनीमिया के आँकड़ों वाला सबसे हालिया NFHS दौर है। इसमें 6-59 महीने के बच्चे या गर्भवती महिला को 11.0 g/dl से कम हीमोग्लोबिन होने पर एनीमिया-ग्रस्त गिना जाता है, गैर-गर्भवती महिला को 12.0 g/dl से कम पर और पुरुष को 13.0 g/dl से कम पर। हर समूह में एनीमिया NFHS-4 से ज़्यादा था: बच्चे 67.1 प्रतिशत (58.6), 15-49 वर्ष की सभी महिलाएँ 57.0 प्रतिशत (53.1), गर्भवती महिलाएँ 52.2 प्रतिशत (50.4) और पुरुष 25.0 प्रतिशत (22.7)। ग्रामीण दरें शहरी दरों से ऊपर रहीं: बच्चों में ग्रामीण 68.3 प्रतिशत, शहरी 64.2 प्रतिशत। नीतिगत जवाब है एनीमिया मुक्त भारत, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कार्यक्रम, जो 2018 में 6x6x6 रणनीति के साथ शुरू हुआ: छह संस्थागत तंत्रों के ज़रिए छह लाभार्थी समूहों के लिए छह हस्तक्षेप। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण परिषद की 16वीं बैठक में जारी एनीमिया मुक्त भारत अभियान के परिचालन दिशानिर्देश (Operational Guidelines) 7x7x7 की ओर बढ़ते हैं। इनमें LBW शिशु (0-6 महीने), ‘Eating Right’ (सही खान-पान) दृष्टिकोण और डिजिटल ट्रैकिंग के लिए एक निगरानी और मूल्यांकन ढाँचा जोड़ा गया है, और T3 (Test, Treat, Talk) को T4 (Test, Treat, Talk, Track) में बदला गया है। हीमोग्लोबिन के रिकॉर्ड JANANI, RBSK और U-WIN पोर्टलों के ज़रिए एक एकीकृत एनीमिया मुक्त भारत अभियान पोर्टल में मैप किए जाने हैं।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS2 स्वास्थ्य, और गरीबी व भूख से जुड़े मुद्दे; GS3 खाद्य प्रसंस्करण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: छिपी हुई भूख (hidden hunger), Test-Treat-Talk-Track, केशिका बनाम शिरा रक्त से माप, उपचारात्मक देखभाल।
सामान्य भूल: ICMR के शिरा रक्त वाले आँकड़े को NFHS-5 के मुक़ाबले रुझान मानकर पढ़ना; दोनों की विधियाँ अलग हैं, और सर्वेक्षण स्वयं ऐसी तुलना के प्रति आगाह करता है।
परीक्षा सुझाव: NFHS-5 में एनीमिया: 6-59 महीने के बच्चे 67.1 प्रतिशत, सभी महिलाएँ 57.0 प्रतिशत, पुरुष 25.0 प्रतिशत; 7x7x7 का सातवाँ समूह LBW शिशु हैं।
साक्षात्कार का कोण: क्या भारत को एनीमिया से मुख्य रूप से फ़ोर्टिफ़ाइड मुख्य खाद्यों के ज़रिए लड़ना चाहिए, या जाँच और उपचार के ज़रिए?
प्रश्न 9 / 14
1. दोनों देशों की समुद्री सीमा एक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अधिकरण के पंचाट से तय हुई थी।
2. भारत का ऑपरेशन कैक्टस, तख़्तापलट के एक प्रयास को विफल करने के लिए मालदीव के अनुरोध पर शुरू किया गया था।
3. बांग्लादेश कोलंबो सुरक्षा कॉन्क्लेव का सदस्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
तथ्य: कथन 1 गलत है: सीमा उस समझौते से तय हुई, जिस पर दोनों देशों ने 28 दिसंबर 1976 को हस्ताक्षर किए। यह सीमा अरब सागर में 496.25 समुद्री मील तक 20 अंतिम या मोड़ बिंदुओं (terminal or turning points) को बृहत् वृत्तों के चापों (arcs of great circles) से जोड़ती है, और उस त्रिसंधि बिंदु से शुरू होती है जिस पर भारत, मालदीव और श्रीलंका 31 जुलाई 1976 को सहमत हुए थे।
कथन 2 सही है: 3 नवंबर 1988 को स्थानीय षड्यंत्रकारियों के समर्थन से विदेशी भाड़े के सैनिकों ने तख़्तापलट की कोशिश की; मालदीव के अनुरोध पर भारत ने ऑपरेशन कैक्टस शुरू किया, और भारतीय वायुसेना ने पैराट्रूपर्स को आगरा से माले पहुँचाया।
कथन 3 सही है: भारत, मालदीव, मॉरीशस, श्रीलंका और सेशेल्स के साथ बांग्लादेश भी कोलंबो सुरक्षा कॉन्क्लेव का सदस्य है। सेशेल्स ने नवंबर 2025 में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक में पर्यवेक्षक के रूप में भाग लिया, सदस्यों ने पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल होने के उसके फ़ैसले का स्वागत किया, और प्रधानमंत्री मोदी ने 9 फ़रवरी 2026 को पूर्ण सदस्य के रूप में उसका स्वागत किया।
विश्लेषण: ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में एसोसिएट फ़ेलो ने द इंडियन एक्सप्रेस में तर्क दिया है कि राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू की पाकिस्तान की राजकीय यात्रा के बाद भारत को अपनी लक्ष्मण-रेखाएँ स्पष्ट कर देनी चाहिए। इस यात्रा में दोनों पक्षों ने 20 MoU पर हस्ताक्षर किए, जिनमें रक्षा और समुद्री सुरक्षा के MoU भी हैं।
अवधारणा नोट
मालदीव भारत के लक्षद्वीप द्वीपसमूह के दक्षिण में है। दोनों के बीच अरब सागर में समुद्री सीमा है, जो 28 दिसंबर 1976 के समझौते से तय हुई; सीमा के पश्चिमी खंड के सबसे निकट भारतीय भू-भाग मिनिकॉय है। उत्तर लिखते समय दो प्रसंग इस रिश्ते की धुरी बनते हैं। 1988 में ऑपरेशन कैक्टस ने दिखाया कि भारत ने एक पड़ोसी की मदद की पुकार का जवाब दिया: कुछ ही घंटों में भारतीय वायुसेना पैराट्रूपर्स को आगरा से 2,000 किमी से अधिक दूर माले ले गई, जहाँ वे हुलहुले हवाई अड्डे पर उतरे। आज रिश्ते की धुरी आर्थिक सहायता है। मालदीव मौद्रिक प्राधिकरण (Maldives Monetary Authority) के साथ भारतीय रिज़र्व बैंक का स्वैप समझौता SAARC देशों के लिए मुद्रा स्वैप व्यवस्था पर फ़्रेमवर्क, 2024-2027 के तहत है; यह फ़्रेमवर्क पहली बार 2012 में लाया गया था। PTI के मुताबिक़ तब से मालदीव को RBI की स्वैप सहायता USD 1.1 बिलियन से अधिक रही है। अक्टूबर 2024 में लिए गए USD 400 मिलियन के स्वैप का निपटान हो चुका है, और जुलाई 2025 में घोषित 4,850 करोड़ रुपये की ऋण-सहायता (line of credit) मालदीव को दी गई ऐसी पहली ऋण-सहायता है, जो भारतीय रुपये में अंकित है। सुरक्षा सहयोग कोलंबो सुरक्षा कॉन्क्लेव के ज़रिए चलता है। मुइज़्ज़ू की पाकिस्तान यात्रा, जो 11 वर्षों में किसी मालदीवी राष्ट्रपति की पहली पाकिस्तान यात्रा है, यह सवाल उठाती है कि क्या ऐसी सहायता के साथ शर्तें जुड़ी होनी चाहिए।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS2 भारत और उसका पड़ोस, और क्षेत्रीय समूह; GS1 हिंद महासागर के द्वीपों की अवस्थिति; GS3 समुद्री सुरक्षा।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: पड़ोस नीति, समुद्री सुरक्षा, मुद्रा स्वैप, प्रभाव (leverage) और लक्ष्मण-रेखाएँ।
सामान्य भूल: कोलंबो सुरक्षा कॉन्क्लेव के सदस्यों की पुरानी सूची का प्रयोग करना। इसके छह सदस्य हैं: भारत, मालदीव, श्रीलंका, मॉरीशस, बांग्लादेश और सेशेल्स; नवंबर 2025 में पर्यवेक्षक रहे सेशेल्स का फ़रवरी 2026 में पूर्ण सदस्य के रूप में स्वागत किया गया।
परीक्षा सुझाव: भारत-मालदीव सीमा अरब सागर में है, और 28 दिसंबर 1976 के समझौते से तय हुई: 20 बिंदु, 496.25 समुद्री मील।
साक्षात्कार का कोण: जो पड़ोसी पाकिस्तान से रिश्ते गहरे कर रहा हो, क्या भारत को उसे दी जाने वाली आर्थिक सहायता के साथ शर्तें जोड़नी चाहिए?
प्रश्न 10 / 14
1. स्थापित उत्पादन क्षमता MW या GW में व्यक्त की जाती है, जबकि भंडारण में रखी ऊर्जा MWh या GWh में व्यक्त की जाती है।
2. केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की स्थापित क्षमता तालिकाओं में 'नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत' (RES) स्तंभ में बड़ी जलविद्युत शामिल है।
3. नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के आँकड़ों में पंप्ड स्टोरेज क्षमता को बड़ी जलविद्युत से अलग गिना जाता है।
4. ग्रिड कंट्रोलर ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (ग्रिड-इंडिया) को पहले POSOCO के नाम से जाना जाता था।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: क्षमता MW या GW में गिनी जाती है, और भंडारित ऊर्जा MWh या GWh में।
कथन 2 गलत है: CEA की तालिकाओं में ‘नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों’ में बड़ी जलविद्युत शामिल नहीं है; बड़ी जलविद्युत सहित नवीकरणीय क्षमता का योग अलग से दिया जाता है।
कथन 3 गलत है: MNRE के अनुसार उसके बड़ी जलविद्युत के आँकड़े में 7,425.6 MW पंप्ड स्टोरेज शामिल है, यानी पंप्ड स्टोरेज बड़ी जलविद्युत के भीतर ही गिना जाता है।
कथन 4 सही है: ग्रिड-इंडिया, यानी ग्रिड कंट्रोलर ऑफ़ इंडिया लिमिटेड, पहले POSOCO था, और ग्रिड सुरक्षा का ज़िम्मा उसी पर है।
विश्लेषण: द इंडियन एक्सप्रेस में सोमित दासगुप्ता का तर्क है कि क्षमता में आई तेज़ बढ़ोतरी से भारत के ग्रिड में दिन में सौर बिजली की अधिकता और रात में कमी की स्थिति बन गई है, और भंडारण का काम अटक सकता है, क्योंकि प्रतिस्पर्धी बोलियों में उसकी क़ीमत ‘लाभकारी नहीं बताई जाती’। 30 सितंबर 2026 की स्थिति वाली CEA की तालिका में कुल 558,896.39 MW स्थापित क्षमता में सौर क्षमता 171,051.47 MW थी।
अवधारणा नोट
भारत की बिजली समस्या अब यह नहीं रही कि क्षमता कितनी है; अब सवाल यह है कि बिजली किस घंटे चाहिए। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की 30 सितंबर 2026 की स्थिति वाली तालिका में कुल स्थापित क्षमता 558,896.39 MW है: तापीय 250,869.87 MW, बड़ी जलविद्युत 52,064.66 MW, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत (बड़ी जलविद्युत को छोड़कर) 247,181.87 MW, जिसमें सौर 171,051.47 MW है, और नाभिकीय 8,780.00 MW। सौर ऊर्जा केवल दिन में काम आती है। 21 मई 2026 को अपराह्न 3:45 बजे पूरी की गई अधिकतम माँग (peak demand met) 270.8 GW तक पहुँची। ग्रिड-इंडिया के SCADA आँकड़ों पर आधारित EAC-PM का एक वर्किंग पेपर दिखाता है कि शाम को माँग में आई बढ़ोतरी ने उसे रात 10:45 बजे के आसपास लगभग 252 GW के दूसरे शिखर तक फिर पहुँचा दिया। पेपर के शब्दों में, ‘अंधेरे में सौर ऊर्जा का योगदान कुछ नहीं होता, और नेट लोड (माँग में से सौर घटाकर) बस कुल लोड के बराबर होता है।’ भंडारण दिन की ऊर्जा को रात तक ले जाता है। CEA की राष्ट्रीय विद्युत योजना 2023 के अनुमान के अनुसार 2026-27 में ऊर्जा भंडारण की ज़रूरत 82.37 GWh होगी (47.65 GWh पंप्ड स्टोरेज, 34.72 GWh बैटरी), जो 2031-32 में बढ़कर 411.4 GWh हो जाएगी (175.18 GWh पंप्ड स्टोरेज, 236.22 GWh बैटरी)।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS3 अवसंरचना (ऊर्जा) और ऊर्जा संक्रमण; GS2 विद्युत क्षेत्र की विनियामक संस्थाएँ।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: नेट लोड, ऊर्जा भंडारण, ग्रिड का लचीलापन, सौर बिजली में कटौती (curtailment)।
सामान्य भूल: CEA के ‘नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों’ में बड़ी जलविद्युत को जोड़ देना; वहाँ यह शामिल नहीं है, और पंप्ड स्टोरेज MNRE के बड़ी जलविद्युत के आँकड़े के भीतर है।
परीक्षा सुझाव: इकाइयाँ अलग रखें: क्षमता के लिए MW, भंडारित ऊर्जा के लिए MWh; NEP 2023 में भंडारण की ज़रूरत GWh में बताई गई है।
साक्षात्कार का कोण: क्या भारत को अभी भंडारण के लिए ज़्यादा क़ीमत चुकानी चाहिए, या दिन में सौर बिजली का उत्पादन घटाना (backing down) जारी रखना चाहिए?
प्रश्न 11 / 14
मुख्य खाद्य : FSSAI के खाद्य फ़ोर्टिफ़िकेशन विनियमों के तहत मिलाए जाने वाले पोषक तत्व
1. चावल : विटामिन A और D
2. डबल फ़ोर्टिफ़ाइड नमक : आयोडीन और आयरन
3. खाद्य तेल : आयरन, फ़ोलिक एसिड और विटामिन B12
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
तथ्य: युग्म 1 सही सुमेलित नहीं है: गेहूँ के आटे की तरह चावल में भी आयरन, फ़ोलिक एसिड और विटामिन B12 मिलाए जाते हैं; विटामिन A और D खाद्य तेल और दूध में मिलाए जाते हैं।
युग्म 2 सही सुमेलित है: डबल फ़ोर्टिफ़ाइड नमक (DFS) में आयोडीन और आयरन होते हैं।
युग्म 3 सही सुमेलित नहीं है: खाद्य तेल में विटामिन A और D होते हैं, आयरन, फ़ोलिक एसिड और विटामिन B12 नहीं।
विश्लेषण: द हिंदू में सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोषण के पाँच विशेषज्ञों का तर्क है कि DFS का दायरा सभी राज्यों में बढ़ाया जाना चाहिए, ख़ासकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिए। NFHS-5 में 94.3 प्रतिशत परिवार आयोडीन युक्त नमक का उपयोग करते पाए गए, जो NFHS-4 के 93.1 प्रतिशत से अधिक है।
अवधारणा नोट
खाद्य फ़ोर्टिफ़िकेशन का मतलब है उन मुख्य खाद्यों में पोषक तत्व मिलाना, जिन्हें लोग पहले से खाते हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने 2018 में पाँच मुख्य खाद्यों के लिए खाद्य सुरक्षा और मानक (खाद्य फ़ोर्टिफ़िकेशन) विनियम अधिसूचित किए। गेहूँ के आटे और चावल में आयरन, फ़ोलिक एसिड और विटामिन B12 मिलाए जाते हैं; खाद्य तेल और दूध में विटामिन A और D; और डबल फ़ोर्टिफ़ाइड नमक में आयोडीन और आयरन। फ़ोर्टिफ़ाइड उत्पादों पर +F लोगो होता है। नमक की पहुँच पहले से व्यापक है: NFHS-5 में 94.3 प्रतिशत परिवार आयोडीन युक्त नमक का उपयोग करते पाए गए। फ़ोर्टिफ़िकेशन एनीमिया से निपटने का एक हिस्सा है। दूसरा हिस्सा एनीमिया मुक्त भारत है, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कार्यक्रम, जो 2018 में 6x6x6 रणनीति के साथ शुरू हुआ और अब संशोधित होकर 7x7x7 रणनीति बन गया है; इसमें ‘Eating Right’ (सही खान-पान) दृष्टिकोण और कम जन्म-भार वाले शिशुओं को एक लाभार्थी समूह के रूप में जोड़ा गया है। संशोधित दिशानिर्देश कार्यक्रम को ‘पूरकता (supplementation) से आगे ले जाकर जाँच, उपचारात्मक प्रबंधन, सही खान-पान और सामुदायिक भागीदारी तक’ फैलाते हैं, और उनका लक्ष्य एनीमिया प्रबंधन को ‘रोगनिरोधी देखभाल से उपचारात्मक देखभाल की ओर’ ले जाना है। मुख्य परीक्षा के उत्तर के लिए: फ़ोर्टिफ़िकेशन पूरी आबादी के लिए एक निवारक उपाय है, जबकि जाँच और उपचार उन लोगों तक पहुँचते हैं जो पहले से एनीमिया-ग्रस्त हैं।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS3 खाद्य प्रसंस्करण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली; GS2 स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रम।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, डबल फ़ोर्टिफ़ाइड नमक, +F लोगो, लक्षित सार्वजनिक वितरण।
सामान्य भूल: आयरन, फ़ोलिक एसिड और विटामिन B12 को नमक से जोड़ देना; DFS में आयोडीन और आयरन होते हैं, जबकि ये तीनों गेहूँ के आटे और चावल में मिलाए जाते हैं।
परीक्षा सुझाव: पाँचों मुख्य खाद्य तीन समूहों में याद रखें: गेहूँ का आटा और चावल; खाद्य तेल और दूध; डबल फ़ोर्टिफ़ाइड नमक।
साक्षात्कार का कोण: क्या PDS में किसी फ़ोर्टिफ़ाइड मुख्य खाद्य को अनिवार्य कर देना चाहिए, या परिवारों के पास चुनाव का विकल्प रहना चाहिए?
प्रश्न 12 / 14
कथन-I: ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार, वाणिज्यिक अपराधों के मामलों में FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जाँच की जा सकती है।
कथन-II: ऐसी प्रारंभिक जाँच का दायरा प्राप्त सूचना की सत्यता का सत्यापन करना है।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही है?
तथ्य: कथन-I सही है: ललिता कुमारी मामले (12 नवंबर 2013, पैरा 111) में संविधान पीठ ने उन श्रेणियों में ‘वाणिज्यिक अपराध’ भी गिनाए हैं, जिनमें प्रारंभिक जाँच की जा सकती है।
कथन-II गलत है: जाँच ‘केवल यह सुनिश्चित करने के लिए की जा सकती है कि संज्ञेय अपराध प्रकट होता है या नहीं’; इसका दायरा ‘प्राप्त सूचना की सत्यता या असत्यता का सत्यापन करना नहीं है’, और यह समयबद्ध होनी चाहिए तथा ‘7 दिन से अधिक नहीं होनी चाहिए’।
विश्लेषण: अभिनव चंद्रचूड़ ने द इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि सुस्त दीवानी अदालतें उन वादियों को पुलिस की ओर धकेलती हैं जिनका पैसा बकाया है, और वहाँ गिरफ़्तारी का डर देनदारों को समझौते के लिए मजबूर करता है। क़ानून ऐसी जाँच को उद्देश्य और समय से सीमित करता है, विषय से नहीं।
अवधारणा नोट
ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (संविधान पीठ, 12 नवंबर 2013) में कहा गया कि अगर सूचना से संज्ञेय अपराध प्रकट होता है, तो FIR दर्ज करना अनिवार्य है। यह फ़ैसला दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 154 के तहत दिया गया था। उसकी जगह आई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173 भारसाधक अधिकारी को यह अनुमति देती है कि वह ऐसे अधिकारी की पूर्व अनुमति से, जिसका रैंक पुलिस उपाधीक्षक से नीचे न हो, ‘तीन वर्ष या उससे अधिक किंतु सात वर्ष से कम के लिए दंडनीय’ अपराध के मामले में चौदह दिन के भीतर प्रारंभिक जाँच कर सके (धारा 173(3))। अगर पुलिस FIR दर्ज करने से इनकार करे, तो शिकायतकर्ता पुलिस अधीक्षक को लिख सकता है, और अगर SP कार्रवाई न करे, तो मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर सकता है (धारा 173(4))। अशोक कुमार जैन बनाम गुजरात राज्य (2025 INSC 614) में सर्वोच्च न्यायालय ने इस नियम को उद्धृत किया कि ‘केवल संविदा-भंग से छल के लिए आपराधिक अभियोजन नहीं बनता, जब तक कि लेन-देन की शुरुआत में ही कपटपूर्ण या बेईमान आशय न दिखाया जाए’, और माना कि जिस FIR ने एक दीवानी विवाद को छल का रंग दे दिया था, उसे जारी रखना विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग था।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS2 न्यायपालिका और आपराधिक न्याय सुधार; GS4 पुलिस की नैतिकता और शक्ति का दुरुपयोग।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: प्रक्रिया का दुरुपयोग, व्यवहार में क़ानून (law in action), प्रारंभिक जाँच, न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात।
सामान्य भूल: यह सोचना कि प्रारंभिक जाँच शिकायत के सच होने की परख करती है; वह केवल यह देखती है कि संज्ञेय अपराध प्रकट होता है या नहीं।
परीक्षा सुझाव: पुराने और नए नियम को साथ याद रखें: ललिता कुमारी (7 दिन से अधिक नहीं) और BNSS की धारा 173(3) (चौदह दिन, DSP की पूर्व अनुमति से, तीन वर्ष या उससे अधिक किंतु सात वर्ष से कम के लिए दंडनीय अपराधों में)।
साक्षात्कार का कोण: पुलिस अधीक्षक के रूप में आप अधिकारियों को क़र्ज़ वसूली करने वालों की तरह काम करने से कैसे रोकेंगे?
प्रश्न 13 / 14
1. तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो के नाम से जानी जाने वाली नदी अरुणाचल प्रदेश में सियांग के रूप में प्रवेश करती है, जिसे दिहांग भी कहा जाता है।
2. सियांग, दिबांग और लोहित से मिलकर ब्रह्मपुत्र बनाती है।
3. सुबनसिरी ब्रह्मपुत्र में उसके बाएँ तट पर मिलती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: तिब्बत में ब्रह्मपुत्र यारलुंग त्सांगपो है, और यह अरुणाचल प्रदेश में सियांग (दिहांग) के रूप में प्रवेश करती है, जो भारत में लगभग 293.9 किमी बहती है।
कथन 2 सही है: सियांग, दिबांग और लोहित से मिलकर ब्रह्मपुत्र बनाती है।
कथन 3 गलत है: इस संगम से लगभग 195 किमी नीचे सुबनसिरी ब्रह्मपुत्र में उसके दाएँ तट पर मिलती है (केंद्रीय जल आयोग के लिए 2013 का एक अध्ययन)।
विश्लेषण: अपर सुबनसिरी ज़िले में प्रस्तावित सुबनसिरी अपर जलविद्युत परियोजना के विरोध में बंद, और सियांग घाटी में प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना के विरोध-प्रदर्शनों ने दोनों नदियों को चर्चा में ला दिया है। कोई सहायक नदी किस तट पर मिलती है, यह मानचित्र से जुड़ा एक आम जाल है।
अवधारणा नोट
केंद्रीय जल आयोग के अनुसार ब्रह्मपुत्र हिमालय की कैलाश श्रेणियों में लगभग 5,150 मीटर की ऊँचाई से निकलती है और गंगा से मिलने से पहले तिब्बत (चीन), भारत और बांग्लादेश से होकर लगभग 2,900 किमी बहती है। तिब्बत में यह यारलुंग त्सांगपो है। यह अरुणाचल प्रदेश में सियांग के रूप में प्रवेश करती है, जिसे दिहांग भी कहते हैं, और दिबांग और लोहित से मिलकर ब्रह्मपुत्र बनाती है। CWC भारत में इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ दिबांग, लोहित, सुबनसिरी, मानस, तीस्ता, धनसिरी और चंपामती बताता है। CWC के लिए 2013 के एक अध्ययन के अनुसार भारत में सियांग बेसिन के उत्तर में पूर्वी हिमालय, पश्चिम में सुबनसिरी बेसिन और पूर्व में दिबांग बेसिन है। इसी अध्ययन ने सियांग उप-बेसिन की जलविद्युत क्षमता 18,000 MW से अधिक आँकी थी, जिसका दोहन 44 परियोजनाओं के ज़रिए किया जाना था। दोनों घाटियों में अब बड़े बांधों के प्रस्ताव हैं, और EIA लोक सुनवाई स्थानीय लोगों से परामर्श का क़ानूनी माध्यम है। पूर्वोत्तर पर मुख्य परीक्षा के उत्तर में यह नदी भौतिक भूगोल, ऊर्जा और उसके किनारे रहने वाले लोगों की सहमति को आपस में जोड़ती है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS1 अपवाह तंत्र और जल संसाधनों का वितरण; GS3 जलविद्युत और अवसंरचना; GS2 सीमा-पार नदियाँ।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: सीमा-पार नदी, जलविद्युत क्षमता, नदी बेसिन नियोजन, स्थानीय समुदायों से परामर्श।
सामान्य भूल: सुबनसिरी को बाएँ तट पर रखना; यह सियांग, दिबांग और लोहित के संगम से नीचे ब्रह्मपुत्र में दाएँ तट पर मिलती है।
परीक्षा सुझाव: CWC की सूची के अनुसार भारत में ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियाँ याद रखें: दिबांग, लोहित, सुबनसिरी, मानस, तीस्ता, धनसिरी और चंपामती।
साक्षात्कार का कोण: क्या किसी सीमा-पार नदी से जुड़ी सामरिक चिंताओं को अरुणाचल प्रदेश में बड़े बांधों के स्थानीय विरोध से ज़्यादा वज़न मिलना चाहिए?
प्रश्न 14 / 14
तथ्य: कुडनकुलम तमिलनाडु के तिरुनेलवेली ज़िले के राधापुरम तालुक में है, और इसका संचालन भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (NPCIL) करता है। बाक़ी विकल्प संयंत्र का ज़िला नहीं हैं: उसका अपना तालुक, राधापुरम, तिरुनेलवेली ज़िले में है।
विश्लेषण: द हिंदू में ख्याति सिंह का तर्क है कि कुडनकुलम डेटा लीक दिखाता है कि भारत के साइबर नियम संचालक (ऑपरेटर) पर बाध्यकारी हैं, उन ठेकेदारों पर नहीं जिनके पास उसका डेटा रहता है। NPCIL का कहना है कि यह सामग्री केवल पारंपरिक बैलेंस ऑफ़ प्लांट (Balance of Plant) की साझा सेवा सुविधाओं से जुड़ी है।
अवधारणा नोट
तमिलनाडु के तिरुनेलवेली ज़िले के राधापुरम तालुक में स्थित कुडनकुलम का संचालन भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (NPCIL) करता है। वहाँ 1,000 MWe के दो दाबित जल रिएक्टर (PWR) चल रहे हैं: इकाई 1, 31 दिसंबर 2014 से वाणिज्यिक प्रचालन में है और इकाई 2, 31 मार्च 2017 से। NPCIL के परियोजना पृष्ठों में इकाइयाँ 3 और 4 तथा इकाइयाँ 5 और 6, हर जोड़ी 2 x 1,000 MW की, रूसी संघ के तकनीकी सहयोग से निर्माणाधीन बताई गई हैं; ऐसी छह इकाइयों से 6,000 MW होते हैं। नाभिकीय स्थलों पर मानचित्र-आधारित प्रश्न ठीक इसी तरह की जानकारी परखते हैं: संयंत्र, उसका राज्य और ज़िला, उसका संचालक और उसके रिएक्टर का प्रकार। यह संयंत्र साइबर सुरक्षा का एक केस स्टडी भी बन गया है। NPCIL के मुताबिक़, 2019 में CERT-In ने उसे इंटरनेट से जुड़े प्रशासनिक नेटवर्क के एक PC में मैलवेयर के बारे में सचेत किया था; NPCIL का कहना है कि यह नेटवर्क महत्वपूर्ण आंतरिक नेटवर्क से अलग है। शोधकर्ताओं ने इस मैलवेयर की पहचान डीट्रैक (Dtrack) के रूप में की। 2026 के लीक पर ख्याति सिंह के लेख का तर्क है कि परियोजना की जानकारी एक बार किसी ठेकेदार के पास पहुँच जाए, तो उसकी सुरक्षा काफ़ी हद तक संविदात्मक व्यवस्थाओं पर निर्भर करती है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत समुचित सरकार महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना को प्रभावित करने वाले किसी कंप्यूटर संसाधन को संरक्षित प्रणाली के रूप में अधिसूचित कर सकती है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS1 प्रमुख उद्योगों और अवसंरचना की अवस्थिति; GS3 नाभिकीय ऊर्जा और महत्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा; GS2 भारत-रूस सहयोग।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: दाबित जल रिएक्टर, नाभिकीय ऊर्जा का विस्तार, महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना, आपूर्ति-शृंखला की सुरक्षा।
सामान्य भूल: संयंत्र का ज़िला गलत बताना; कुडनकुलम तिरुनेलवेली ज़िले के राधापुरम तालुक में है।
परीक्षा सुझाव: संयंत्र को उसके संचालक (NPCIL), उसके रिएक्टर के प्रकार (इकाई 1 और 2 के लिए 1,000 MWe के PWR) और इकाई 3 से 6 के साझेदार (रूसी संघ) के साथ याद रखें।
साक्षात्कार का कोण: क्या ठेकेदारों के पास रखे किसी नाभिकीय संयंत्र के डेटा पर वही नियम लागू होने चाहिए, जो स्वयं संयंत्र पर लागू होते हैं?