उद्धरण-योग्य पंक्ति
“एक बार पुलिस किसी दीवानी मामले में शामिल हो जाए, तो प्रक्रिया तबाह कर देने वाली तेज़ी से चलती है।” (अभिनव चंद्रचूड़, द इंडियन एक्सप्रेस)
यह संपादकीय आपकी परीक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है
चर्चा में: 26 अक्टूबर 2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में बॉम्बे उच्च न्यायालय के अधिवक्ता अभिनव चंद्रचूड़ का तर्क है कि सुस्त दीवानी अदालतें उन वादियों को पुलिस की ओर धकेलती हैं जिनका पैसा दूसरों पर बकाया है, और वहाँ “प्रारंभिक जाँच” के दौरान गिरफ़्तारी का डर देनदारों को समझौते के लिए मजबूर करता है। लेखक के शब्दों में इसका नतीजा है “दीवानी न्याय देने का एक समानांतर तंत्र”।
FIR दर्ज करने के क़ानून के लिए हमारा FIR और लोक सेवकों के लिए BNSS के सुरक्षा उपायों पर व्याख्यात्मक लेख (अंग्रेज़ी) देखें; सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों के लिए विशेष अनुमति याचिकाओं की छँटाई पर हमारा संपादकीय।
UPSC प्रासंगिकता:
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2: न्यायपालिका की कार्यप्रणाली; पुलिस और आपराधिक न्याय सुधार; न्याय तक पहुँच।
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 4 (संबंध): सार्वजनिक संस्थाओं में ईमानदारी; लोक सेवकों द्वारा शक्ति का दुरुपयोग।
- प्रारंभिक परीक्षा: संज्ञेय और असंज्ञेय अपराध; FIR और प्रारंभिक जाँच (ललिता कुमारी, 2013); BNSS की धाराएँ 35 और 173; BNS में छल और आपराधिक न्यासभंग; न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात और विधि आयोग की 120वीं रिपोर्ट।
- निबंध: “देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है” (Justice delayed is justice denied); विधि का शासन और व्यवहार में उसका पालन।
60 शब्दों में सार
अभिनव चंद्रचूड़ का तर्क है कि भारत की सुस्त दीवानी अदालतें उन रसूख़ वाले वादियों को पुलिस की ओर धकेलती हैं, जिनका पैसा दूसरों पर बकाया है। छल या न्यासभंग का आरोप लगाकर वे क़र्ज़ को आपराधिक शिकायत में बदल देते हैं; फिर समन, “प्रारंभिक जाँच” और गिरफ़्तारी की धमकियाँ जल्द समझौते के लिए मजबूर कर देती हैं। लेखक के अनुसार इसका नतीजा दीवानी न्याय का एक समानांतर तंत्र है, जिसे संरचनात्मक और सांस्कृतिक सुधार की ज़रूरत है।
जब दीवानी अदालतें सुस्त होती हैं, तो रसूख़ वाले वादी, जिनका पैसा दूसरों पर बकाया है, छल या न्यासभंग का आरोप लगाकर पुलिस के पास जाते हैं, और ‘प्रारंभिक जाँच’ के दौरान गिरफ़्तारी का डर समझौते के लिए मजबूर कर देता है: व्यवहार में यह दीवानी न्याय देने का एक समानांतर तंत्र बन जाता है।
- न्यायाधीश बहुत कम हैं: लेखक के अनुसार महाराष्ट्र में प्रति मिलियन आबादी पर 15 न्यायाधीश हैं और बॉम्बे उच्च न्यायालय में 1.9, जबकि न्यूयॉर्क राज्य में लगभग 157।
- पैसा चुकाने के अनुबंध का मात्र उल्लंघन न तो छल है और न न्यासभंग, फिर भी पुलिस ऐसी शिकायतें हाथ में लेती है; लेख ‘कमीशन के आधार’ पर रिश्वत की एक अफ़वाह का ज़िक्र करता है।
- पुलिस की प्रक्रिया तेज़ और दबाव भरी है: कम समय की सूचना पर समन, घंटों का इंतज़ार और देनदार या उसके परिवार को गिरफ़्तार करने की धमकियाँ, इसलिए ज़्यादातर लोग FIR के बिना ही समझौता कर लेते हैं।
- लेखक के अनुसार असली जड़ पुरानी पड़ चुकी दीवानी प्रक्रिया है, जो प्रतिवादी को डिक्री टालने का हर मौक़ा देती है।
पैसे के विवाद में छल की हर शिकायत झूठी नहीं होती: जहाँ लेन-देन की शुरुआत से ही बेईमान आशय मौजूद हो, वहाँ अपराध बनता है और पुलिस को कार्रवाई करनी ही चाहिए। लेख यह भी मानता है कि सभी पुलिस अधिकारी प्रलोभन के आगे नहीं झुकते।
लेख दीवानी न्याय में संरचनात्मक और सांस्कृतिक सुधार की माँग करता है। हमारा विश्लेषण इसमें जोड़ता है: प्रारंभिक जाँच को उसके सीमित उद्देश्य और समय-सीमा तक रखा जाए, गिरफ़्तारी के बजाय नोटिस का इस्तेमाल हो, और न्यायाधीशों की संख्या विधि आयोग के मानक की ओर बढ़ाई जाए।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
लेखक के आँकड़ों में न्यायाधीशों की कमी
लेख की शुरुआत क्षमता के सवाल से होती है: “बहुत कम न्यायाधीशों पर बहुत ज़्यादा काम एक बड़ा कारण लगता है”। लेखक के आँकड़े ये हैं:
- महाराष्ट्र: 2011 की जनगणना में 112 मिलियन आबादी, और प्रति मिलियन आबादी पर 15 न्यायाधीश।
- बॉम्बे उच्च न्यायालय: प्रति मिलियन आबादी पर 1.9 न्यायाधीश; लेखक द्वारा उद्धृत राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार 648,725 मामले लंबित, जिनमें से 9,454 दीवानी वाद हैं। लेख इस गणना की कोई तारीख़ नहीं देता।
- न्यूयॉर्क राज्य: प्रति मिलियन आबादी पर लगभग 157 न्यायाधीश।
ये लेखक के आँकड़े हैं। पूरे देश के आधिकारिक पैमाने नीचे दिए गए हैं।
| पैमाना | आँकड़ा | स्रोत |
|---|---|---|
| राष्ट्रीय न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात | प्रति मिलियन लगभग 21 न्यायाधीश: 2024 में स्वीकृत संख्या, 2011 की जनगणना की 1,210.19 मिलियन आबादी के आधार पर | विधि राज्य मंत्री, राज्यसभा में उत्तर (द न्यूज़ मिनट की रिपोर्ट के अनुसार) |
| विधि आयोग, 120वीं रिपोर्ट, “Manpower Planning in Judiciary: A Blue Print” (न्यायपालिका में जनशक्ति नियोजन: एक रूपरेखा), जुलाई 1987 | संख्या को चरणबद्ध तरीक़े से 10.5 से बढ़ाकर प्रति मिलियन 50 न्यायाधीश करना | PIB, विधि और न्याय मंत्रालय, 10 दिसंबर 2002 |
| सर्वोच्च न्यायालय, ऑल इंडिया जजेज़ एसोसिएशन (All India Judges Association), 21 मार्च 2002 | पाँच वर्ष के भीतर प्रति 10 लाख आबादी पर 13 से बढ़ाकर 50 न्यायाधीश | PIB, 10 दिसंबर 2002 |
| दिसंबर 2002 में बताया गया अनुपात | प्रति मिलियन 14.7 न्यायाधीश | PIB, 10 दिसंबर 2002 |
लेख में बताई गई प्रथा
लेख में बताया गया है कि दूसरी जगहों पर, जापान और वेनेज़ुएला जैसे देशों में, वादी न्यायेतर उपायों का सहारा लेते हैं, जैसे मारियो पूज़ो के द गॉडफ़ादर में अंत्येष्टि का काम करने वाला व्यक्ति माफ़िया डॉन के पास जाता है। भारत में “समृद्ध और अच्छे संपर्कों वाले वादी”, जिनका पैसा दूसरों पर बकाया है, पुलिस के पास जाते हैं और आरोप लगाते हैं कि दूसरे पक्ष ने छल या न्यासभंग जैसा कोई अपराध किया है। इसके बाद क्या होता है, लेख के अनुसार:
- शिकायत। “जो व्यक्ति पैसा चुकाने का अनुबंध मात्र तोड़ता है, वह इनमें से कोई अपराध नहीं करता।” फिर भी पुलिस कार्रवाई करती है। लेख के अनुसार कोई वादी किसी अधिकारी को यह पेशकश कर सकता है कि विरोधी पक्ष समझौता कर ले तो उसे हिस्सा मिलेगा, और “अफ़वाह है” कि पुलिस की एक शाखा ऐसे मामले हाथ में लेने के लिए “कमीशन के आधार” पर रिश्वत माँगती है। “बेशक, सभी पुलिस अधिकारी ऐसे प्रलोभनों के आगे नहीं झुकते।”
- समन। दीवानी वाद में प्रतिवादी शायद ही कभी ख़ुद पेश होता है, लेकिन यहाँ पुलिस एक अस्पष्ट-सा समन भेजकर “आरोपी” देनदार को कम समय की सूचना पर थाने बुलाती है।
- “प्रारंभिक जाँच”। घंटों का इंतज़ार, धमकाने वाले सवाल, और यह धमकी कि मामला न सुलझा तो देनदार, उसके जीवनसाथी या परिवार को गिरफ़्तार कर लिया जाएगा; फिर अगले दिन दोबारा आने का समन।
- समझौता। “कारोबारी दुनिया में समय ही पैसा है।” ज़्यादातर लोग समझौता कर लेते हैं और कोई FIR दर्ज नहीं होती। “कुछ विवरणों के अनुसार, पुलिस थाने पहुँचने वाले ऐसे 50 प्रतिशत मामले प्रारंभिक जाँच के चरण में ही ख़त्म हो जाते हैं।” बाक़ी काम गिरफ़्तारी का डर, जेलों की दयनीय हालत और प्रतिष्ठा पर ख़तरा कर देते हैं।
विश्लेषण
लेखक का तर्क, क़दम-दर-क़दम
- निदान और दूसरा रास्ता। न्यायाधीशों की कमी दीवानी अदालतों को सुस्त रखती है, इसलिए नेटवर्क तक पहुँच रखने वाले वादी दीवानी दावों को अपराध का रूप देकर पुलिस के पास ले जाते हैं, जहाँ कार्रवाई तेज़ होती है और देनदार समझौता कर लेता है।
- खाई। “विधि और समाज” (law and society) के विद्वान “किताबों में दर्ज क़ानून” (law on the books) और “व्यवहार में क़ानून” (law in action) में फ़र्क़ करते हैं। दीवानी मामलों के अपराधीकरण को “एक “प्रक्रिया का दुरुपयोग” माना जाता है, जिसकी सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार निंदा की है और जिसे हतोत्साहित किया है”, लेकिन लेखक के शब्दों में, “व्यवहार में क़ानून कुछ और ही है।”
- मूल कारण। “हमारी कम स्टाफ़ वाली और काम के बोझ से दबी अदालतों को ऐसी व्यवस्था के लिए दोष देना अनुचित होगा, जिसे संरचनात्मक और सांस्कृतिक सुधार की ज़रूरत है।” दीवानी न्याय “पुरातन प्रक्रिया की नींव” पर टिका है: “भारत में प्रतिवादी को डिक्री पाने की वादी की कोशिशों को विफल करने का हर संभव अवसर दिया जाता है।” लेख में प्रिवी काउंसिल की 1872 की यह टिप्पणी उद्धृत है कि “भारत में किसी वादी की मुश्किलें तब शुरू होती हैं जब वह डिक्री प्राप्त कर लेता है”, और लेखक के अनुसार यह बात आज भी सच है।
किताबों में दर्ज क़ानून क्या कहता है
लेख किसी फ़ैसले या धारा का नाम नहीं लेता। जिस क़ानून की ओर वह इशारा करता है, वह उसकी बताई प्रथा के हर चरण पर साफ़ रेखाएँ खींचता है।
| चरण | लेखक के विवरण में | क़ानून क्या कहता है |
|---|---|---|
| क्या यह अपराध है भी? | पैसा चुकाने के अनुबंध का मात्र उल्लंघन | सर्वोच्च न्यायालय ने अशोक कुमार जैन बनाम गुजरात राज्य (Ashok Kumar Jain v. The State of Gujarat, 2025 INSC 614, निर्णय की तारीख़ 1 मई 2025) में हृदय रंजन प्रसाद वर्मा बनाम बिहार राज्य (Hridaya Ranjan Prasad Verma v. State of Bihar) को उद्धृत किया: “केवल संविदा-भंग से छल के लिए आपराधिक अभियोजन नहीं बनता, जब तक कि लेन-देन की शुरुआत में ही कपटपूर्ण या बेईमान आशय न दिखाया जाए” |
| प्रारंभिक जाँच | देनदार पर समझौते का दबाव डालने के लिए इस्तेमाल | ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh; संविधान पीठ, 12 नवंबर 2013), पैरा 111: जाँच “केवल यह सुनिश्चित करने के लिए की जा सकती है कि संज्ञेय अपराध प्रकट होता है या नहीं”; इसका दायरा “प्राप्त सूचना की सत्यता या असत्यता का सत्यापन करना नहीं है”; यह समयबद्ध होनी चाहिए और “7 दिन से अधिक नहीं होनी चाहिए” |
| BNSS का रूप | चर्चा नहीं | धारा 173(3): “तीन वर्ष या उससे अधिक किंतु सात वर्ष से कम के लिए दंडनीय” अपराध के लिए भारसाधक अधिकारी, ऐसे अधिकारी की पूर्व अनुमति से जिसका रैंक पुलिस उपाधीक्षक से नीचे न हो, “यह सुनिश्चित करने के लिए कि मामले में आगे कार्यवाही के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, चौदह दिन की अवधि के भीतर” प्रारंभिक जाँच कर सकता है |
| समन और गिरफ़्तारी | एक अस्पष्ट-सा समन और देनदार या परिवार को गिरफ़्तार करने की धमकियाँ | धारा 35(3): जहाँ गिरफ़्तारी ज़रूरी न हो, वहाँ पुलिस हाज़िर होने का नोटिस “जारी करेगी”। धारा 35(5): नोटिस का पालन करने वाले व्यक्ति को “गिरफ़्तार नहीं किया जाएगा ... जब तक कि दर्ज किए जाने वाले कारणों से पुलिस अधिकारी की यह राय न हो कि उसे गिरफ़्तार किया जाना चाहिए”। सात वर्ष तक के दंड वाले संज्ञेय अपराध में बिना वारंट गिरफ़्तारी के लिए अधिकारी का यह संतुष्ट होना ज़रूरी है कि गिरफ़्तारी आवश्यक है, जैसे “अपराध के उचित अन्वेषण के लिए”, और कारण लिखित रूप में दर्ज हों (धारा 35(1)) |
| अगर पुलिस FIR से इनकार करे | चर्चा नहीं | धारा 173(4): शिकायतकर्ता सूचना लिखित रूप में डाक से पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है, और अगर पुलिस अधीक्षक कार्रवाई न करे, तो मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर सकता है |
उत्तर लिखने के लिए इससे दो बातें निकलती हैं। पहली, पैसे के विवाद में प्रारंभिक जाँच अपने आप में ग़ैरक़ानूनी नहीं है: ललिता कुमारी में उन श्रेणियों में “वाणिज्यिक अपराध” भी गिनाए गए हैं जिनमें ऐसी जाँच की जा सकती है। क़ानून जिस बात पर रोक लगाता है, वह है इसका इस्तेमाल यह जाँचने से आगे किसी काम के लिए करना कि संज्ञेय अपराध प्रकट होता है या नहीं, या इसे समय में खींचते जाना। दूसरी, ललिता कुमारी का फ़ैसला दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 154 के तहत हुआ था; BNSS की धारा 173 उसकी उत्तराधिकारी है, और अपने दायरे में आने वाले अपराधों के लिए वह चौदह दिन तय करती है। अशोक कुमार जैन में न्यायालय ने माना कि “एक मात्र दीवानी विवाद को छल और आपराधिक न्यासभंग के अपराध का रंग दे दिया गया है”, और FIR को जारी रखना “विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग” था। लेख जिस “प्रक्रिया के दुरुपयोग” की बात करता है, वह यही है।
तर्क कहाँ मज़बूत है, और कहाँ रुक जाता है
- मज़बूत पक्ष: लेख उन दो संस्थाओं को जोड़ता है जिन पर आम तौर पर अलग-अलग चर्चा होती है, यानी सुस्त अदालतें और पुलिस के प्रोत्साहन, और दिखाता है कि एक, दूसरी को कैसे बढ़ावा देती है। वह एक संरचनात्मक समस्या के लिए काम के बोझ से दबे न्यायाधीशों को दोष देने से भी इनकार करता है।
- कुछ जगहों पर साक्ष्य कमज़ोर है। “50 प्रतिशत” का आधार “कुछ विवरण” हैं और कमीशन के आधार पर रिश्वत का आधार अफ़वाह; दोनों बातें लेखक के अपने शब्दों में हैं। राज्य और न्यूयॉर्क के अनुपातों को आधिकारिक राष्ट्रीय आँकड़ों के सामने नहीं रखा गया है, और NJDG की गणना की कोई तारीख़ नहीं है।
- पूरा तर्क “मात्र” शब्द पर टिका है। जिस देनदार का इरादा कभी पैसा चुकाने का नहीं था, और जिसने शुरू से ही लेनदार को धोखा दिया, उसने छल किया हो सकता है। क़ानून की कसौटी लेन-देन की शुरुआत में मौजूद आशय है, इसलिए ऐसी हर शिकायत दुरुपयोग नहीं है।
- उपाय का नाम नहीं है। निष्कर्ष “संरचनात्मक और सांस्कृतिक सुधार” है, लेकिन लेख यह नहीं बताता कि कौन-सा सुधार।
आगे की राह
- प्रारंभिक जाँच को उसके उद्देश्य तक सीमित रखें। केवल यह देखने के लिए कि संज्ञेय अपराध प्रकट होता है या नहीं, समय-सीमा के भीतर, और उस पूर्व अनुमति के साथ जो धारा 173(3) में अपेक्षित है।
- गिरफ़्तारी नहीं, नोटिस। धारा 35(3) और (5) सख़्ती से लागू हों, ताकि नोटिस का जवाब देने वाले व्यक्ति को दर्ज कारणों के बिना गिरफ़्तारी की धमकी न दी जाए।
- अदालत में दुरुपयोग पर रोक। अशोक कुमार जैन में सर्वोच्च न्यायालय की कसौटी अदालतों को ऐसी FIR रोकने का साफ़ आधार देती है जो दीवानी विवाद को छल या न्यासभंग का जामा पहनाती हैं।
- अदालतों में न्यायाधीश बढ़ाएँ। न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात को विधि आयोग के प्रति मिलियन 50 के मानक की ओर ले जाएँ, और मूल दीवानी वादों के लिए पर्याप्त न्यायाधीश हों।
- डिक्री को असरदार बनाएँ। दीवानी प्रक्रिया और डिक्री के निष्पादन को सरल करें; यही वह चरण है जिसका वर्णन लेख में उद्धृत 1872 की टिप्पणी आज भी करती है।
आँकड़े और संस्थाएँ
प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य:
न्यायाधीश और जनसंख्या:
- भारत में प्रति मिलियन आबादी पर लगभग 21 न्यायाधीश: 2024 में स्वीकृत संख्या, 2011 की जनगणना की 1,210.19 मिलियन आबादी (विधि राज्य मंत्री, राज्यसभा)
- विधि आयोग, 120वीं रिपोर्ट, “Manpower Planning in Judiciary: A Blue Print”, जुलाई 1987: प्रति मिलियन 50 न्यायाधीश, चरणबद्ध रूप से
- सर्वोच्च न्यायालय, ऑल इंडिया जजेज़ एसोसिएशन, 21 मार्च 2002: पाँच वर्ष के भीतर प्रति 10 लाख आबादी पर 13 से बढ़ाकर 50 न्यायाधीश
क़ानून:
- ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (संविधान पीठ, 12 नवंबर 2013): अगर सूचना से संज्ञेय अपराध प्रकट होता है तो FIR दर्ज करना अनिवार्य
- ललिता कुमारी: प्रारंभिक जाँच केवल यह देखती है कि संज्ञेय अपराध प्रकट होता है या नहीं, और यह 7 दिन से अधिक नहीं होनी चाहिए
- BNSS धारा 173(3): तीन वर्ष या उससे अधिक किंतु सात वर्ष से कम के लिए दंडनीय अपराधों में DSP की पूर्व अनुमति से प्रारंभिक जाँच; चौदह दिन
- BNSS धारा 173(4): पुलिस के दर्ज करने से इनकार करने पर उपाय: पुलिस अधीक्षक, और वहाँ कार्रवाई न हो तो मजिस्ट्रेट
- BNSS धारा 35(3): जहाँ गिरफ़्तारी ज़रूरी न हो, वहाँ हाज़िर होने का नोटिस
- BNS धारा 316: आपराधिक न्यासभंग, पाँच वर्ष तक का कारावास, या जुर्माना, या दोनों
- BNS धारा 318: छल; धारा 318(2) में तीन वर्ष तक का कारावास, या जुर्माना, या दोनों; धारा 318(4) में, जहाँ संपत्ति सौंपी गई हो, सात वर्ष तक का कारावास और जुर्माना
- अशोक कुमार जैन बनाम गुजरात राज्य, 2025 INSC 614: जिस FIR ने दीवानी विवाद को छल का रंग दे दिया था, उसे जारी रखना विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग था
संभावित भ्रामक बिंदु:
- प्रारंभिक जाँच की अनुमति “वाणिज्यिक अपराधों” के लिए है (ललिता कुमारी, पैरा 111); उसकी सीमाएँ उद्देश्य और समय की हैं, विषय की नहीं
- “50 प्रतिशत” और कमीशन के आधार पर रिश्वत की बात लेखक की सुनी-सुनाई बातें हैं, आँकड़े नहीं
वाद-विवाद
| यह प्रथा गंभीर दुरुपयोग है | सावधानी के कारण |
|---|---|
| पैसा चुकाने के अनुबंध का उल्लंघन अपराध नहीं है; पुलिस का दबाव एक दीवानी दावे को आपराधिक धमकी में बदल देता है | जहाँ शुरुआत में ही बेईमान आशय हो, वहाँ छल वास्तविक अपराध है, और शिकायतकर्ता को उसकी जाँच करवाने का अधिकार है |
| गिरफ़्तारी और जेल की धमकी का इस्तेमाल बिना किसी FIR या रिकॉर्ड के समझौते करवाने में होता है | सुरक्षा उपाय पहले से मौजूद हैं: जाँच पर सीमाएँ, DSP की अनुमति, गिरफ़्तारी से पहले नोटिस और धारा 173(4) का उपाय; समस्या उन्हें लागू करने की है |
| पुलिस का ऐसा इस्तेमाल केवल समृद्ध और अच्छे संपर्कों वाले लोग ही कर पाते हैं, जिससे न्याय असमान हो जाता है | यह कितनी बार होता है, इस पर लेखक के आँकड़े “कुछ विवरणों” और अफ़वाह पर टिके हैं |
| सुस्त दीवानी अदालतें लेनदारों के पास कोई वास्तविक उपाय नहीं छोड़तीं, इसलिए अदालतें तेज़ होने तक यह दबाव बना रहेगा | तेज़ अदालतों के लिए वर्षों तक न्यायाधीशों की भर्ती और प्रक्रियात्मक सुधार की ज़रूरत होगी; पुलिस की जवाबदेही अभी लागू की जा सकती है |
इस विषय पर कैसे सोचें
- दीवानी या आपराधिक? पूछें कि बेईमान आशय कब पैदा हुआ। लेन-देन की शुरुआत में हो तो यह छल हो सकता है; बाद में भुगतान न करना दीवानी मामला है।
- किताब बनाम व्यवहार। जाँच, नोटिस और गिरफ़्तारी के नियम पहले से लिखे हुए हैं। जो उत्तर केवल नए नियम सुझाता है, वह व्यवहार के बारे में लेख की मूल बात से चूक जाता है।
- दो संस्थाएँ, एक समस्या। न्यायिक क्षमता और पुलिस के प्रोत्साहन एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं; दूसरे के बिना केवल एक का सुधार दबाव को कहीं और खिसका देता है।
- साक्ष्य को तौलें। आधिकारिक आँकड़ों को लेखक के क़िस्सों और अनुमानों से अलग करें, और बताएँ कि कौन-सी बात किस श्रेणी की है।
आरेख में समझें
सुस्त दीवानी अदालत से पुलिस थाने तक
लेख के अनुसार पैसे का विवाद आपराधिक शिकायत कैसे बनता है, और उसी के साथ क़ानून की अपेक्षाएँ।
आरेख को ऊपर से नीचे पढ़ें: सुस्त अदालतें लेनदार को पुलिस की ओर धकेलती हैं, और जोड़ीदार पंक्ति उसी चरण पर लेखक के “व्यवहार में क़ानून” को क़ानून की अपेक्षाओं के साथ रखती है। आख़िर में लेखक का निष्कर्ष आता है।
दीवानी अदालतों में देरी कुछ वादियों को पैसे के विवादों को अपराध के रूप में पेश करने की ओर धकेलती है। इस प्रवृत्ति के कारणों और इसके विरुद्ध आपराधिक प्रक्रिया में मौजूद सुरक्षा उपायों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
दीवानी विवाद के अपराधीकरण का अर्थ है पैसे के उस दावे को, जिसकी सही जगह दीवानी अदालत है, छल या आपराधिक न्यासभंग की पुलिस शिकायत में बदल देना। सुस्त दीवानी न्याय इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है: सरकार के आँकड़ों के अनुसार 2024 में भारत में प्रति मिलियन आबादी पर लगभग 21 न्यायाधीश थे (स्वीकृत संख्या), जबकि विधि आयोग ने अपनी 120वीं रिपोर्ट (1987) में प्रति मिलियन 50 की सिफ़ारिश की थी।
कारण: न्यायाधीशों की कमी और दीवानी अदालतों में भारी संख्या में लंबित मामले; ऐसी दीवानी प्रक्रिया जो प्रतिवादियों को डिक्री टालने देती है; पुलिस कार्रवाई की तेज़ी और उसका दबाव; और गिरफ़्तारी, जेल और प्रतिष्ठा खोने का डर, जो देनदारों को समझौते की ओर धकेलता है। परिणाम: पुलिस क़र्ज़ वसूलने वाली एजेंसी बन जाती है, ग़रीब और बिना पहुँच वाले लोग न्याय तक समान पहुँच खो देते हैं, और विधि के शासन में जनता का भरोसा कमज़ोर होता है। सुरक्षा उपाय: ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013) के अनुसार, अगर सूचना से संज्ञेय अपराध प्रकट होता है तो FIR दर्ज करना अनिवार्य है; प्रारंभिक जाँच, जिसकी अनुमति वाणिज्यिक अपराधों जैसी श्रेणियों में है, केवल यह सुनिश्चित कर सकती है कि संज्ञेय अपराध प्रकट होता है या नहीं, और यह 7 दिन से अधिक नहीं होनी चाहिए। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 तीन वर्ष या उससे अधिक किंतु सात वर्ष से कम के लिए दंडनीय अपराधों में प्रारंभिक जाँच की अनुमति केवल पुलिस उपाधीक्षक की पूर्व अनुमति से और चौदह दिन के भीतर देती है (धारा 173(3)), और जहाँ गिरफ़्तारी ज़रूरी न हो वहाँ हाज़िर होने का नोटिस अनिवार्य करती है (धारा 35(3))। सर्वोच्च न्यायालय ने 2025 में माना कि जिस FIR ने एक दीवानी विवाद को छल का रंग दे दिया था, उसे जारी रखना विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग था, और दोहराया कि जब तक लेन-देन की शुरुआत में ही बेईमान आशय न हो, केवल संविदा-भंग छल नहीं है।
उपाय के दो हिस्से हैं: ज़्यादा न्यायाधीशों और सरल प्रक्रिया के ज़रिए तेज़ दीवानी न्याय, और दीवानी तथा आपराधिक क़ानून के बीच की रेखा की सख़्ती से निगरानी, ताकि गिरफ़्तारी का डर कभी क़र्ज़ वसूली का औज़ार न बने।
साक्षात्कार का कोण
"ज़िले के पुलिस प्रमुख के रूप में आप अपने थानों को निजी क़र्ज़ों की वसूली का ज़रिया बनने से कैसे रोकेंगे, और साथ ही यह कैसे सुनिश्चित करेंगे कि छल की वास्तविक शिकायतें लौटाई न जाएँ?"
मुख्य निष्कर्ष
- तर्क: सुस्त दीवानी अदालतें रसूख़ वाले लेनदारों को पुलिस की ओर धकेलती हैं, जहाँ गिरफ़्तारी का डर समझौते करवाता है: दीवानी न्याय का एक समानांतर तंत्र।
- क़ानून: शुरुआत से बेईमान आशय के बिना केवल संविदा-भंग छल नहीं है; प्रारंभिक जाँच केवल यह देख सकती है कि संज्ञेय अपराध प्रकट होता है या नहीं, और वह भी सख़्त समय-सीमा के भीतर।
- भ्रामक बिंदु: यह कितनी बार होता है, इसका लेखक का अनुमान और रिश्वत की अफ़वाह सुनी-सुनाई बातें हैं; सरकार का आँकड़ा 2024 में प्रति मिलियन लगभग 21 न्यायाधीश था (जनवरी 2026 में रिपोर्ट किए गए राज्यसभा के एक उत्तर में लगभग 22)।
- परीक्षा का ढाँचा: न्याय तक पहुँच, पुलिस की जवाबदेही और न्यायिक क्षमता, तीनों एक ही प्रश्न में।
स्रोत:
- The Indian Express, Abhinav Chandrachud, “Slow courts, swift coercion: When the police replace judges”, 26 अक्टूबर 2026
- Supreme Court of India, Lalita Kumari v. Govt. of U.P., 12 नवंबर 2013 (Indian Kanoon)
- Supreme Court of India का निर्णय, Ashok Kumar Jain v. The State of Gujarat, 2025 INSC 614
- The Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023, Gazette of India Extraordinary, 25 दिसंबर 2023
- The Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023, Gazette of India Extraordinary, 25 दिसंबर 2023
- PIB, Ministry of Law and Justice, न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात पर, 10 दिसंबर 2002
- The News Minute की रिपोर्ट: “India has 21 judges for every 10 lakh people: Govt in Parliament”
- टिप्पणी: उद्धरण-चिह्नों में दिए गए विधिक और आधिकारिक अंश अंग्रेज़ी पाठ के हिंदी अनुवाद हैं।