🗞️ चर्चा में क्यों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल और न्यायमूर्ति संजय धर की खंडपीठ ने जम्मू और कश्मीर जल संसाधन (विनियमन और प्रबंधन) अधिनियम, 2010 के तहत जलविद्युत परियोजनाओं पर लगाए गए जल उपयोग प्रभार निरस्त कर दिए हैं। यह जानकारी क़ानूनी समाचार पोर्टलों की रिपोर्टों से मिली है। Law Chakra के अनुसार फ़ैसला 29 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया। LiveLaw की रिपोर्ट के मुताबिक़ अदालत ने माना कि यह उद्ग्रहण सार और प्रभाव में बिजली उत्पादन पर कर है, और इसे लगाने की सक्षमता राज्य विधानमंडल के पास नहीं थी। बिजली उत्पादकों को जारी मांग नोटिस भी रद्द कर दिए गए।
यह फ़ैसला एक ऐसे सवाल पर टिका है, जिसे प्रारंभिक परीक्षा एक पंक्ति में पूछ सकती है: क्या राज्य सूची किसी राज्य को बिजली उत्पादन पर कर लगाने की अनुमति देती है? राज्य सूची में बिजली के उपभोग या विक्रय पर कर की प्रविष्टि है, और जल तथा जल शक्ति की एक विषय-प्रविष्टि भी है, लेकिन उत्पादन पर कर की कोई प्रविष्टि नहीं है। खंडपीठ ने माना कि जो “उपयोग प्रभार” कर की तरह काम करता है, उसे किसी कराधान प्रविष्टि का आधार चाहिए, और इस प्रभार को ऐसा आधार नहीं मिला।
मामला और उद्ग्रहण
याचिकाओं में मुख्य मामला WP(C) No. 3008/2024 था। इसे मेसर्स मास एन एनर्जी प्रा. लि. (M/s Mass N Energy Pvt. Ltd.), हिमालयन मस्क पावर प्रा. लि. और खारी हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट प्रा. लि. समेत 11 कंपनियों ने दायर किया था। इसके साथ मैगपाई हाइडल कंस्ट्रक्शन ऑपरेशन इंडस्ट्रीज़ प्रा. लि. और चौधरी पावर प्रोजेक्ट्स प्रा. लि. की दो याचिकाओं पर भी सुनवाई हुई। Bar & Bench के अनुसार याचिकाकर्ता स्वतंत्र विद्युत उत्पादक हैं, जो “नदी आधारित जलविद्युत परियोजनाएँ चला रहे हैं”। फ़ैसला न्यायमूर्ति संजय धर ने लिखा; इसे सितंबर में सुरक्षित रखा गया था।
- क़ानून। LiveLaw के मुताबिक़ अदालत ने दर्ज किया: “वर्ष 2010 में तत्कालीन राज्य के विधानमंडल ने जम्मू और कश्मीर जल संसाधन (विनियमन और प्रबंधन) अधिनियम, 2010 बनाया, और उसके अनुसरण में 2011 के नियम बनाए गए।” इस अधिनियम (2010 का अधिनियम संख्यांक XXI) को 23 अक्टूबर 2010 को राज्यपाल की स्वीकृति मिली थी।
- प्रभार कौन तय करता है। अधिनियम “जल उपयोग प्रभार” की परिभाषा यह देता है: “जल के उपयोग के लिए उद्गृहीत या प्रभारित दर, जो धारा 128 के अधीन नियत की गई हो”। धारा 128 के तहत ये प्रभार अधिनियम से गठित प्राधिकरण तय करता है; अधिनियम में ख़ुद कोई दर नहीं लिखी है।
- प्रभार कैसे वसूला गया। LiveLaw के अनुसार दर “हेड की ऊँचाई पर आधारित थी, यानी पानी जितनी ऊँचाई से गिरता है उसी अनुपात में प्रति घन मीटर दर बढ़ती जाती थी, न कि आपूर्ति किए गए पानी की मात्रा के आधार पर”।
- मांग। अधिकारियों ने याचिकाकर्ताओं को “वर्ष 2010 से आगे बिजली उत्पादन के लिए” जल उपयोग प्रभार के मांग नोटिस जारी किए।
न्यायालय का तर्क
जलविद्युत पर जल उपयोग प्रभार क्यों रद्द हुआ
लेवी, संघ राज्यक्षेत्र की दलील और न्यायालय का तर्क, क्रम से, जैसा रिपोर्ट हुआ।
अदालत का तर्क कई चरणों में आगे बढ़ा। रिपोर्टों में हर चरण अदालत के अपने शब्दों में या उनके क़रीब दर्ज है।
1. जिस प्रभार के बदले सेवा न हो, वह कर है। LiveLaw ने जो कसौटी बताई है, उसके अनुसार कर सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए की गई अनिवार्य वसूली है, जबकि उपयोग प्रभार आपूर्ति या उपभोग का प्रतिफल होते हैं। इसलिए उपयोग प्रभार के लिए ज़रूरी है कि वसूली गई रक़म और दी गई सेवाओं के बीच संबंध हो। धारा 145(1) के परंतुक के तहत इन प्रभारों का मक़सद परियोजनाओं की लागत और उनके संचालन का ख़र्च वसूलना है। लेकिन अदालत ने ध्यान दिलाया कि जलविद्युत परियोजनाओं के मामले में केंद्र शासित प्रदेश या उसके अधिकारियों पर कोई ख़र्च करने का दायित्व ही नहीं है। यह पैसा धारा 185-A के तहत बने एक कोष में भी जाता है, जिससे बिजली परियोजनाएँ और पारेषण नेटवर्क बनाए और ख़रीदे जाते हैं। Bar & Bench के सार के मुताबिक़ इसमें quid pro quo (यानी सेवा के बदले प्रतिफल) का कोई तत्व नहीं था; उसने अदालत के शब्द उद्धृत किए हैं: ये प्रभार “कर के सिवा कुछ नहीं हैं”।
2. कर उत्पादन पर पड़ता है। जलविद्युत संयंत्र पानी को अपनी टर्बाइनों से गुज़ारकर वापस नदी में छोड़ देता है; LiveLaw इसे “गैर-उपभोगात्मक उपयोग” कहता है। Bar & Bench के अनुसार अदालत ने माना कि पानी का उपभोग किए बिना उसका उपयोग “उत्पादन प्रक्रिया का अभिन्न और अपरिहार्य पहलू” है। इसलिए “बिजली उत्पादन से पहले या उसके दौरान” किसी भी चरण पर लगाया गया उद्ग्रहण सार में “स्वयं बिजली उत्पादन पर” कर है।
3. प्रविष्टि 53 उत्पादन तक नहीं पहुँचती। रिपोर्टों के अनुसार सूची II की प्रविष्टि 53 राज्य को बिजली के उपभोग या विक्रय पर कर लगाने का अधिकार देती थी, “लेकिन उसके उत्पादन पर नहीं”। LiveLaw के मुताबिक़ अदालत ने यह भी कहा कि सूची II की कोई भी प्रविष्टि राज्य को बिजली उत्पादन पर कर लगाने की शक्ति नहीं देती। भारत संघ ने भी खंडपीठ के सामने यही रुख़ रखा।
4. प्रविष्टि 17 से भी बचाव नहीं होता। केंद्र शासित प्रदेश की दलील थी कि सूची II की प्रविष्टि 17 में जल का नाम है, जिसमें जल शक्ति भी शामिल है, इसलिए राज्य जल का विनियमन कर सकता था और जल प्रभार लगा सकता था। उसने यह भी कहा कि जल को “भूमि” या “खनिज” के रूप में पढ़ा जा सकता है। LiveLaw के अनुसार अदालत ने यह दलील ख़ारिज कर दी और माना कि राज्य सूची में जल के संबंध में कोई कराधान प्रविष्टि नहीं है। प्रविष्टि 17 एक विषय-प्रविष्टि है। भूमि पर कर की प्रविष्टि 49 है और खनिज अधिकारों पर कर की प्रविष्टि 50, लेकिन जल के लिए ऐसी कोई प्रविष्टि नहीं है।
5. 2019 में अंगीकरण से दोष दूर नहीं होता। अदालत ने सक्षमता को “अधिनियमन के समय लागू विधि के संदर्भ में” परखा, यानी 2010 के संदर्भ में, “जब तत्कालीन राज्य को अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा प्राप्त था”। केंद्र शासित प्रदेश की दलील थी कि संसद ने जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के ज़रिए इस अधिनियम को अंगीकार किया था, इसलिए उसे संसद की स्वीकृति प्राप्त है। अदालत इससे सहमत नहीं हुई: “केवल इसलिए कि (2019 का) अधिनियम राज्य के अधिनियमों के अंगीकरण का प्रावधान करता है और जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख केंद्र शासित प्रदेशों पर उनके लागू होने को बचाए रखता है, वे अधिनियम संसद द्वारा पारित अधिनियम नहीं बन जाते।” अदालत ने यह भी कहा: “जो विधान अपने अधिनियमन के समय संविधान के अधिकारातीत (ultra vires) है, उसे बाद में संसद द्वारा अंगीकार किए जाने से वैध नहीं ठहराया जा सकता।” Law Chakra की रिपोर्ट के अनुसार खंडपीठ ने इस दलील को “विवादित विधान को बचाने का हताशा में किया गया प्रयास” कहा।
2019 के अधिनियम की पाँचवीं अनुसूची की तालिका-4 में 2010 का अधिनियम दर्ज है। इस तालिका में वे “राज्य अधिनियम, जिनमें राज्यपाल के अधिनियम भी शामिल हैं, जो लागू रहेंगे” गिनाए गए हैं, जो दोनों केंद्र शासित प्रदेशों में लागू रहते हैं। धारा 96 के तहत केंद्र सरकार आदेश जारी कर ऐसे क़ानूनों का अनुकूलन कर सकती थी। अदालत के तर्क से यह निकलता है कि किसी क़ानून को बचाए रखना उसे दोबारा अधिनियमित करने के बराबर नहीं है। विधानमंडल नया क़ानून बनाकर कोई दोष दूर करे, यह अलग रास्ता है; ऐसे एक मामले के लिए देखें कर्नाटक के वैधीकरण अधिनियम पर 30 अक्टूबर का लेख।
क्या निरस्त हुआ, और क्या नहीं
- निरस्त: 2010 का अधिनियम, “उस सीमा तक जहाँ तक वह जलविद्युत परियोजनाओं पर जल उपयोग प्रभार लगाने का प्रावधान करता है”, अधिकारातीत घोषित (LiveLaw)। अधिनियम का बाक़ी हिस्सा यथावत है।
- रद्द: याचिकाकर्ताओं को जारी मांग नोटिस।
- रोक: “प्रतिवादी-राज्य को जल उपयोग प्रभार या किसी अन्य कर की आड़ में बिजली उत्पादन पर कोई भी कर लगाने से रोका जाता है” (Bar & Bench)।
- रिपोर्टों में जिन पर फ़ैसला दर्ज नहीं: याचिकाकर्ताओं ने राज्य के 12% मुफ़्त बिजली हिस्से और वचन विबंध (promissory estoppel) की दलीलें भी दी थीं; जो रिपोर्टें देखी गईं, उनमें इन दलीलों पर अदालत का जवाब दर्ज नहीं है।
अन्य राज्य और केंद्र का रुख़
हिमालयी राज्यों के लिए यह सवाल नया नहीं है, और अलग-अलग जगह नतीजे अलग रहे हैं।
| कहाँ | रिपोर्ट में क्या आया | नतीजा |
|---|---|---|
| हिमाचल प्रदेश | राज्य ने मार्च 2023 में हिमाचल प्रदेश जलविद्युत उत्पादन पर जल उपकर विधेयक (Himachal Pradesh Water Cess on Hydropower Generation Bill) पारित किया (Deccan Herald) | उच्च न्यायालय ने उपकर रद्द कर दिया और माना कि इससे “संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ” (The Tribune, 5 मार्च 2024 की रिपोर्ट) |
| उत्तराखंड | अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी लि. बनाम उत्तराखंड राज्य | उच्च न्यायालय ने “जलविद्युत परियोजनाओं पर जल कर लगाने वाले क़ानून को बरकरार रखा” (Taxscan, 11 अगस्त 2021 की रिपोर्ट) |
| केंद्र | राज्यों को विद्युत मंत्रालय का पत्र, जिसकी रिपोर्ट अप्रैल 2023 में आई | “बिजली उत्पादन पर कोई भी कर/शुल्क, जिसमें ताप, जल, पवन, सौर, परमाणु आदि सभी प्रकार का उत्पादन शामिल है, अवैध और असंवैधानिक है” |
PSU Watch और The Tribune की रिपोर्टों के अनुसार मंत्रालय के पत्र में यह भी कहा गया था कि “‘जल उपकर’ या ‘वायु उपकर’ लगाने का कोई औचित्य नहीं है”। नवंबर 2024 में Deccan Herald ने केंद्रीय विद्युत मंत्री के हवाले से लिखा: “केंद्र जल उपकर लगाने के ख़िलाफ़ है।” हिमाचल और उत्तराखंड के फ़ैसले अलग-अलग क़ानूनों से जुड़े थे, इसलिए उन्हें मुक़दमों की एक ही कड़ी के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।
इस महीने ख़बरों में रहे जलविद्युत के मुद्दे के लिए देखें सुबनसिरी और अपर सियांग बाँधों पर 27 अक्टूबर का लेख।
मुख्य परीक्षा की दृष्टि से: जल, बिजली और राज्य कराधान की सीमाएँ
- नाम नहीं, सार। अदालतें यह देखती हैं कि कोई उद्ग्रहण असल में करता क्या है, यह नहीं कि उसे कहा क्या जाता है। जिस “प्रभार” के बदले कोई सेवा नहीं मिलती, और जिसकी दर आपूर्ति किए गए पानी से नहीं बल्कि पानी गिरने की ऊँचाई से तय होती है, उसे कर माना गया।
- बिजली करों का संघीय नक़्शा। राज्य बिजली के उपभोग या विक्रय पर कर लगा सकते हैं (प्रविष्टि 53)। लेकिन जब तक संसद क़ानून बनाकर अन्यथा उपबंध न करे, अनुच्छेद 287 भारत सरकार द्वारा उपभोग की गई या उसे बेची गई बिजली पर, या रेलवे में इस्तेमाल बिजली पर यह कर भी लगाने से रोकता है। उत्पादन राज्य सूची से बाहर है; भारत संघ और विद्युत मंत्रालय, दोनों ने यह बात ज़ोर देकर रखी है।
- राज्य का पक्ष। नदियाँ और बाँध पहाड़ी राज्यों में हैं, और डूब से लेकर नाज़ुक ढलानों तक उनकी क़ीमत भी यही राज्य चुकाते हैं। जलविद्युत पर उद्ग्रहण उनके पानी से पैदा होने वाले मूल्य में हिस्सा पाने का एक तरीक़ा है। यह फ़ैसला, कम से कम जम्मू-कश्मीर में, कर के ज़रिए यह रास्ता बंद करता है, लेकिन उचित प्रतिफल का सवाल खुला छोड़ देता है।
- निवेशक और टैरिफ़। 2010 तक पीछे जाने वाली मांगें उन जलविद्युत परियोजनाओं का जोखिम बढ़ाती हैं, जिनमें पहले से ही भारी पूँजी लगती है। उद्ग्रहणों पर क़ानूनी निश्चितता का असर टैरिफ़ पर भी पड़ता है और स्वच्छ व भरोसेमंद (फ़र्म) बिजली की कोशिशों पर भी।
- पुनर्गठन और पुराने क़ानून। 2019 के अधिनियम से बचाए गए क़ानून आज भी संविधान की उसी कसौटी पर परखे जाते हैं, जो उनके बनने के समय थी। यह फ़ैसला याद दिलाता है कि किसी क़ानून के जारी रहने से उसके जन्म के समय का दोष दूर नहीं हो जाता।
किन बातों पर नज़र रखें: क्या केंद्र शासित प्रदेश इस फ़ैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देता है; क्या वह जलविद्युत के मूल्य में हिस्से के लिए कोई और वैध आधार तलाशता है; और अगर यह सवाल सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचता है, तो तीन उच्च न्यायालयों (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड) की अलग-अलग राहों में तालमेल कैसे बैठता है।
UPSC प्रासंगिकता
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2: संघीय ढाँचा; विधायी शक्तियों का बँटवारा (सातवीं अनुसूची); संघ-राज्य संबंध; जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019; न्यायिक समीक्षा।
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3: ऊर्जा: जलविद्युत, अवसंरचना में निवेश, राज्यों द्वारा संसाधन जुटाना।
प्रारंभिक परीक्षा: अनुच्छेद 246, 248, 265, 287; सूची II की प्रविष्टियाँ 17, 49, 50, 53; सूची I की प्रविष्टियाँ 56 और 97; कर बनाम फ़ीस।
मुख्य परीक्षा: “प्रभार कहलाने वाला उद्ग्रहण छद्म रूप में कर हो सकता है। जम्मू-कश्मीर में जलविद्युत पर जल उपयोग प्रभारों से जुड़े हालिया फ़ैसले के संदर्भ में, सातवीं अनुसूची के तहत बिजली पर राज्यों की कराधान शक्ति की सीमाओं का परीक्षण कीजिए।” (GS2, 250 शब्द)
📌 तथ्य सार: ज्ञानकोश
प्रारंभिक परीक्षा: कथन-योग्य तथ्य:
- फ़ैसला: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय, न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल और संजय धर; 29 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया (Law Chakra)
- मुख्य मामला: मेसर्स मास एन एनर्जी व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य (M/s Mass N Energy and Others v. Union of India and Others), WP(C) No. 3008/2024
- क़ानून: जम्मू और कश्मीर जल संसाधन (विनियमन और प्रबंधन) अधिनियम, 2010 (2010 का अधिनियम संख्यांक XXI); 2011 के नियम
- निर्णय (LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार): जलविद्युत परियोजनाओं पर जल उपयोग प्रभार सार और प्रभाव में बिजली उत्पादन पर कर हैं
- सूची II प्रविष्टि 53: “विद्युत के उपभोग या विक्रय पर कर”; राज्य सूची की कोई प्रविष्टि उत्पादन को नहीं छूती
- सूची II प्रविष्टि 17: जल, जिसमें जल भंडारण और जल शक्ति शामिल हैं; यह सूची I की प्रविष्टि 56 के अधीन है
- अनुच्छेद 248 और सूची I प्रविष्टि 97: अवशिष्ट शक्ति संसद के पास है, जिसमें राज्य या समवर्ती सूची में न दिया गया कोई भी कर शामिल है
- अनुच्छेद 265: विधि के प्राधिकार के बिना कोई कर न लगाया जाएगा, न वसूला जाएगा
- 2010 का अधिनियम J&K पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की पाँचवीं अनुसूची की तालिका-4 में है (लागू रहने वाले राज्य अधिनियम)
प्रारंभिक परीक्षा: संभावित जाल:
- पूरा 2010 का अधिनियम नहीं, केवल जलविद्युत पर लागू जल उपयोग प्रभार वाले प्रावधान निरस्त हुए
- प्रविष्टि 17 (जल) विषय-प्रविष्टि है, कराधान प्रविष्टि नहीं; भूमि और खनिज अधिकारों की कराधान प्रविष्टियाँ 49 और 50 हैं
- अदालत के अनुसार, 2019 के अधिनियम द्वारा अंगीकार कर लेने से कोई राज्य क़ानून संसद द्वारा पारित क़ानून नहीं बन जाता
- हिमाचल का जल उपकर रद्द हुआ (रिपोर्ट मार्च 2024); उत्तराखंड का जल कर बरकरार रहा (रिपोर्ट अगस्त 2021)
- अनुच्छेद 287 भारत सरकार द्वारा उपभोग की गई या उसे बेची गई बिजली पर, या भारत सरकार अथवा किसी रेल कंपनी द्वारा रेलों के संचालन में उपभोग की गई बिजली पर राज्य कर लगाने से रोकता है
- अनुच्छेद 287 वहीं तक लागू है जहाँ तक संसद क़ानून बनाकर अन्यथा उपबंध न करे
मुख्य परीक्षा: तर्क और मुख्य शब्द:
- मुख्य शब्द: विधायी सक्षमता, उद्ग्रहण का सार और तत्व (pith and substance), quid pro quo, कर बनाम फ़ीस, अधिकारातीत (ultra vires), व्यावृत्त क़ानून
- पहाड़ी राज्य जलविद्युत के मूल्य में हिस्सा चाहते हैं; इस फ़ैसले के बाद उत्पादन पर कर किसी राज्य विधानमंडल के लिए खुला रास्ता नहीं रहा
साक्षात्कार: इनके लिए तैयार रहें:
- “क्या भारत के जलविद्युत संयंत्रों को चलाने वाले पानी के लिए पहाड़ी राज्यों को भुगतान मिलना चाहिए?” निष्पक्षता के लिहाज़ से हाँ, लेकिन वैध तरीक़ों से: सेवाओं से जुड़ी फ़ीस, बातचीत से तय हिस्सा, या सक्षमता के भीतर बना क़ानून।
स्रोत: Bar & Bench, “Jammu and Kashmir High Court strikes down water usage charges on hydropower projects under 2010 law”, 31 अक्टूबर 2026। LiveLaw, फ़ैसले की रिपोर्ट, 29 अक्टूबर 2026। Law Chakra, 31 अक्टूबर 2026। Greater Kashmir, 30 अक्टूबर 2026। Kashmir Horizon (UNI), 30 अक्टूबर 2026। जम्मू और कश्मीर जल संसाधन (विनियमन और प्रबंधन) अधिनियम, 2010। जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019, धारा 96 और पाँचवीं अनुसूची। भारत का संविधान (विधायी विभाग, मई 2024 का पाठ), अनुच्छेद 246, 248, 265, 287 और सातवीं अनुसूची। The Tribune, मार्च 2024 और अप्रैल 2023। Deccan Herald, नवंबर 2024। Taxscan, अगस्त 2021। PSU Watch, अप्रैल 2023।
- टिप्पणी: उद्धरण-चिह्नों में दिए गए विधिक और आधिकारिक अंश अंग्रेज़ी पाठ के हिंदी अनुवाद हैं।