उद्धरण-योग्य पंक्ति

“सरकारें आमतौर पर निवेश के लिए उन चीज़ों के बल पर प्रतिस्पर्धा करती हैं जो उनके नियंत्रण में होती हैं, जैसे भूमि, बिजली, कर की शर्तें और स्वीकृतियाँ।” (अमित कुमार, “What Piyush Goyal and Harsh Goenka didn’t say: India is putting its employees’ evenings up for sale” [आशय: पीयूष गोयल और हर्ष गोयनका ने जो नहीं कहा: भारत अपने कर्मचारियों की शामें बिक्री पर लगा रहा है], द इंडियन एक्सप्रेस, 31 अक्टूबर 2026)

यह संपादकीय आपकी परीक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है

चर्चा में: 31 अक्टूबर 2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक स्तंभ में अमित कुमार ने, जो (स्तंभ की अंतिम पंक्ति के अनुसार) कॉर्पोरेट क्षेत्र में कार्यरत हैं, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की उस टिप्पणी पर सवाल उठाया है जो उन्होंने नीदरलैंड्स में उद्योग जगत के नेताओं के सामने की थी कि भारत में कोई “आपसे यह नहीं कहेगा कि 5 बज गए”, और RPG समूह के चेयरमैन हर्ष गोयनका द्वारा किए गए उसके बचाव पर भी। स्तंभ में इस दावे को काम के घंटों, ओवरटाइम और डिस्कनेक्ट करने के अधिकार से जुड़े भारत के श्रम क़ानून की कसौटी पर परखा गया है।

श्रम संहिताएँ इस साइट पर पहले भी चर्चा में रही हैं: राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड और गिग कामगारों पर 30 अक्टूबर का डीप डाइव (सामाजिक सुरक्षा संहिता), कौशल वर्गीकरण और न्यूनतम मजदूरी पर संपादकीय (अंग्रेज़ी), जो मजदूरी संहिता से जुड़ा है, और आवक निवेश और श्रम संहिताओं पर संपादकीय (अंग्रेज़ी)। यह स्तंभ सीधे काम के घंटों पर केंद्रित है: 48 घंटे का सप्ताह, सहमति-आधारित ओवरटाइम, नियत अवधि अनुबंध और डिस्कनेक्ट करने के अधिकार का अभाव।

UPSC प्रासंगिकता:

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3: भारतीय अर्थव्यवस्था और रोज़गार; श्रम सुधार; निवेश का माहौल।
  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2: कमज़ोर वर्गों का कल्याण; कामगारों के संरक्षण के तंत्र; संसद में गैर-सरकारी सदस्य विधेयक।
  • प्रारंभिक परीक्षा: चारों श्रम संहिताएँ और उनकी तिथियाँ; OSH संहिता की धारा 25 से 27; OSH (केंद्रीय) नियम, 2026; “समुचित सरकार”; IR संहिता में “कर्मकार” और “नियत अवधि नियोजन” की परिभाषाएँ; समवर्ती सूची की प्रविष्टि 22 और 24।
  • निबंध और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 4: कार्य-नैतिकता और कार्य-जीवन संतुलन; असमान शक्ति की स्थिति में सहमति; नियोक्ता का कर्तव्य।

60 शब्दों में सार

एक मंत्री ने भारतीय कामगारों की पाँच बजे के बाद भी काम करने की तत्परता को निवेश की बढ़त के रूप में पेश किया। अमित कुमार का तर्क है कि यह ऐसी चीज़ बेचना है जिसका स्वामी राज्य नहीं: उन कर्मचारियों की शामें, जो मना करने की स्थिति में नहीं हैं। कागज़ पर सीमाएँ हैं, पर केंद्रीय नियम कम दफ़्तरों तक पहुँचते हैं, ओवरटाइम “सहमति” पर टिका है और डिस्कनेक्ट करने का अधिकार नहीं है।

मुख्य तर्क: एक दृष्टि में

अमित कुमार का तर्क है कि निवेशकों के सामने मंत्री की यह प्रस्तुति कि भारत में कोई ‘आपसे यह नहीं कहेगा कि 5 बज गए’, ऐसी चीज़ बेचने की पेशकश है जिसका स्वामी राज्य है ही नहीं: उन कर्मचारियों की शामें, जो मना करने की स्थिति में सबसे कम हैं।

समर्थन में
  • पाँच बजे की चुप्पी उत्साह नहीं, मोलभाव की ताकत को दर्शाती है: नियत अवधि का अनुबंध बस समाप्त हो जाता है और औद्योगिक संबंध संहिता के तहत यह छंटनी नहीं है, इसलिए ऐसे अनुबंध पर काम कर रहे लोगों, परिवीक्षा पर चल रहे कर्मचारियों और करियर की शुरुआत करने वालों के लिए ‘ना’ कहना सबसे कठिन होता है।
  • कागज़ पर क़ानून घंटों की सीमा तय करता है, लेकिन मई 2026 के केंद्रीय नियम केवल केंद्रीय क्षेत्र के प्रतिष्ठानों पर लागू होते हैं, ओवरटाइम का भुगतान उन कामगारों को होता है जो इसके लिए सहमति दें, IR संहिता की ‘कर्मकार’ की परिभाषा से प्रबंधक और ऊँचे वेतन वाले पर्यवेक्षक बाहर हैं, और डिस्कनेक्ट करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।
  • उपलब्धता बेचने के लिए एक कमज़ोर चीज़ है: WHO के अनुमान 55 घंटे या उससे अधिक के कार्य-सप्ताह को स्ट्रोक के 35 प्रतिशत अधिक जोखिम और इस्कीमिक हृदय रोग से मृत्यु के 17 प्रतिशत अधिक जोखिम से जोड़ते हैं, और जो नियोक्ता मौजूदा कर्मचारियों से ही ज़्यादा काम ले सकता है, उसके पास नई भर्ती का कारण कम रह जाता है।
  • लेखक के अनुसार श्रोताओं को देखें तो यह प्रस्तुति और भी अजीब लगती है: लेख में दिए गए यूरोस्टेट के आँकड़े के अनुसार नीदरलैंड्स में यूरोपीय संघ का सबसे छोटा औसत कार्य-सप्ताह है और वह फिर भी समृद्ध है, जबकि भारत की ‘बढ़त’ वह कामगार है जो भारतीय कार्यदिवस के ऊपर एक डच ग्राहक की घड़ी का बोझ भी उठाता है।
प्रतिवाद

हर्ष गोयनका का बचाव, जैसा स्तंभ में बताया गया है: मंत्री शायद मज़ाक कर रहे थे, लेकिन इसमें एक गंभीर बात है, क्योंकि काम की माँग होने पर भारतीय देर रात तक और सप्ताहांत में भी काम करते हैं, और यही बढ़त है। OSH संहिता के तहत ओवरटाइम का भुगतान पहले से ही दोगुनी दर पर होता है, और वह भी केवल कामगार की सहमति से।

आगे की राह

लेखक का प्रस्ताव है कि वाणिज्य मंत्रालय अपनी निवेशक-सामग्री में वैधानिक कार्य-सप्ताह, ओवरटाइम की दोगुनी दर और साप्ताहिक अवकाश को शामिल करे; सरकार राइट टू डिस्कनेक्ट विधेयक को अपनाए; कंपनियाँ सार्वजनिक करें कि वे कार्य-समय के बाद कितना काम माँगती हैं और उसका कितना भुगतान करती हैं; और श्रम विभाग शिकायतों का इंतज़ार किए बिना ओवरटाइम रजिस्टरों की जाँच करें।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

टिप्पणी

26 अक्टूबर 2026 को पीयूष गोयल की नीदरलैंड्स यात्रा में भारत-नीदरलैंड्स बिज़नेस फ़ोरम शामिल था, जिसकी सह-अध्यक्षता उन्होंने नीदरलैंड्स के विदेश व्यापार और विकास सहयोग मंत्री स्यूर्ड स्यूर्ड्समा (Sjoerd Sjoerdsma) के साथ की; वाणिज्य मंत्रालय की विज्ञप्ति के अनुसार इसमें “लगभग 200 लोग” शामिल हुए। विज्ञप्ति में यह टिप्पणी उद्धृत नहीं है। बिज़नेस साइट trak.in की एक रिपोर्ट के अनुसार गोयल ने यह बात “द हेग में भारत-नीदरलैंड्स बिज़नेस फ़ोरम में भारत को निवेश गंतव्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए” कही, और उनके शब्द थे: “भारतीय कड़ी मेहनत करना चाहते हैं। भारत में कोई आपसे यह नहीं कहेगा कि पाँच बज गए। और निश्चित रूप से कोई भारतीय आपको कभी याद नहीं दिलाएगा कि सप्ताहांत है।”

इसके बाद हर्ष गोयनका ने इस पंक्ति का बचाव किया। स्तंभ के अनुसार उन्होंने लिखा कि मंत्री शायद मज़ाक कर रहे थे, लेकिन इसमें एक गंभीर बात छिपी है: यूरोप के बड़े हिस्से में सप्ताह की आख़िरी बैठक शुक्रवार को शाम 4 बजे तक ख़त्म हो जाती है, जबकि काम की माँग हो तो भारतीय देर रात तक और सप्ताहांत में भी काम करते हैं, और यही बढ़त है।

वह क़ानून जिसका स्तंभ में हवाला है

OSH संहिता दिन की सीमा (आठ घंटे, धारा 25) तय करती है और कार्यदिवस के फैलाव को समुचित सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाने के लिए छोड़ देती है। संदर्भ के लिए, साप्ताहिक सीमा OSH (केंद्रीय) नियम, 2026 में है, जिन्हें श्रम और रोज़गार मंत्रालय ने 8 मई 2026 को G.S.R. 345(E) के रूप में अधिसूचित किया और जो राजपत्र में प्रकाशन की तिथि से लागू हैं। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 छंटनी और विवादों को नियंत्रित करती है, और नियत अवधि कामगार को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करती है जो “किसी निश्चित अवधि के लिए नियोजन के लिखित अनुबंध के आधार पर” नियुक्त हो, और जिसके काम के घंटे, मजदूरी और लाभ “वही काम करने वाले स्थायी कर्मकार से कम न हों”।

विश्लेषण

स्तंभ अपना तर्क पाँच चरणों में खड़ा करता है।

1. चुप्पी उत्साह नहीं है। स्तंभ में लिखा है, “पाँच बजे किसी कर्मचारी की चुप्पी से उसके उत्साह के बारे में बहुत कम पता चलता है।” मना करने की स्थिति में सबसे कम वे होते हैं जिनके पास मोलभाव की ताकत सबसे कम है: करियर की शुरुआत करने वाले, परिवीक्षा पर चल रहे या नियत अवधि अनुबंध पर काम करने वाले लोग। नियत अवधि का अनुबंध “अपनी अवधि पूरी होने पर बस समाप्त हो जाता है और औद्योगिक संबंध संहिता के तहत यह छंटनी नहीं है”, इसलिए छंटनी की सूचना और मुआवज़े के प्रावधान लागू नहीं होते। PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च के हवाले से लेख में आगे कहा गया है कि चूँकि नवीनीकरण नियोक्ता के हाथ में है, ऐसे कामगार “लंबे कार्य-घंटों जैसे मुद्दे उठाने से कतरा सकते हैं”। लेखक का तर्क है कि ना कहने की सज़ा का “फटकार होना शायद ही कभी ज़रूरी होता है”: वह “एक फीका मूल्यांकन, किसी सहकर्मी को सौंपा गया अच्छा प्रोजेक्ट, रवैये पर की गई कोई टिप्पणी” भी हो सकती है। लेखक के शब्दों में, लचीलापन “हमेशा एक ही दिशा में चला है।”

2. कागज़ पर क़ानून। क़ानूनी पाठ की कसौटी पर स्तंभ के विधिक दावे खरे उतरते हैं:

स्तंभ का कथन क़ानून क्या कहता है
समाप्त हुआ नियत अवधि अनुबंध छंटनी नहीं है IR संहिता, धारा 2(zh)(iv): छंटनी में “नियत अवधि नियोजन की अवधि पूरी होने के परिणामस्वरूप कर्मकार की सेवा की समाप्ति” शामिल नहीं है
मई 2026 के केंद्रीय नियम 48 घंटे का सप्ताह और दोगुना ओवरटाइम तय करते हैं OSH (केंद्रीय) नियम, 2026: नियम 64(1), कोई कर्मकार “एक सप्ताह में अड़तालीस घंटे से अधिक” काम नहीं करेगा; नियम 69, ओवरटाइम “उनकी मजदूरी की दर से दोगुनी दर पर”; नियम 69(4) का एक परंतुक: “किसी तिमाही में एक सौ चौवालीस घंटे से अधिक” ओवरटाइम नहीं
ये नियम केवल केंद्रीय क्षेत्र के प्रतिष्ठानों पर लागू होते हैं OSH संहिता, धारा 2(1)(d): केंद्र अपने प्रतिष्ठानों, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, रेलवे, खानों, तेल क्षेत्रों, महापत्तनों, हवाई परिवहन, दूरसंचार, बैंकों और बीमा कंपनियों आदि के लिए समुचित सरकार है; कारखानों और अन्य प्रतिष्ठानों के लिए राज्य
सीमा से आगे स्वेच्छा से काम करने वाले कामगारों को दोगुना भुगतान देय है OSH संहिता, धारा 27: दोगुनी दर पर ओवरटाइम, “ऐसे काम के लिए ऐसे कर्मकार की सहमति के अधीन”
“कर्मकार” में प्रबंधकीय भूमिकाएँ और एक वेतन-सीमा से ऊपर के पर्यवेक्षक शामिल नहीं IR संहिता, धारा 2(zr): उस व्यक्ति को बाहर रखती है जो “मुख्यतः प्रबंधकीय या प्रशासनिक हैसियत में” नियोजित है, या पर्यवेक्षी हैसियत में 18,000 रुपये प्रति माह (या अधिसूचित राशि) से अधिक मजदूरी पाता है
राइट टू डिस्कनेक्ट विधेयक गैर-सरकारी सदस्य विधेयक के रूप में लंबित है PRS की सूची में सुप्रिया सुले का “The Right to Disconnect Bill, 2025 (Amendment of article 43A)”, जो 5 दिसंबर 2025 को पेश हुआ, लंबित है

“स्वेच्छा से” शब्द पर स्तंभ की टिप्पणी है: “सब कुछ इसी शब्द पर टिका है, क्योंकि जब इनकार की कीमत भारी हो, तो इच्छा को साबित करना कठिन होता है।” लेख में आगे कहा गया है कि IR संहिता “प्रबंधक” या “पर्यवेक्षक” को परिभाषित नहीं करती, इसलिए किसी वेतनभोगी पेशेवर के लिए “यह अस्पष्ट रह सकता है कि क़ानून उस पर लागू भी होता है या नहीं”, और यह भी कि भारत में काम के घंटों के बाद कार्य-संदेशों से “डिस्कनेक्ट करने का कोई सामान्य वैधानिक अधिकार नहीं है”। गैर-सरकारी सदस्य विधेयकों के बारे में दिसंबर 2025 के एक फैक्टली व्याख्यात्मक लेख में बताया गया है कि 1952 से अब तक “केवल 14 गैर-सरकारी सदस्य विधेयक ही क़ानून बन पाए हैं”।

3. व्यवहार क़ानून से आगे निकल गया है। लेखक ने सरकारी सर्वेक्षण के आँकड़ों का हवाला दिया है, जिनके अनुसार महामारी के वर्षों को छोड़कर 2018-19 से हर वर्ष भारत में वेतनभोगी पुरुष सप्ताह में 50 घंटे से अधिक काम करते रहे हैं। लेख के अनुसार कर्नाटक ने 2024 में और फिर 2025 में IT कर्मचारियों के लिए लंबे कार्यदिवस का विचार सामने रखा, और राज्य के IT कर्मचारी संघ के अभियान के बाद दूसरा प्रस्ताव छोड़ दिया। ये आँकड़े और प्रसंग लेखक के हैं।

4. उपलब्धता बेचने के लिए सबसे कमज़ोर चीज़ है। लेखक ने अर्थशास्त्री जॉन पेनकेवल (John Pencavel) के उस अध्ययन का हवाला दिया है जो एक सदी पहले के ब्रिटिश युद्ध-सामग्री कामगारों पर था और जिसमें पाया गया कि उत्पादन एक सीमा तक ही घंटों के साथ बढ़ता है। स्वास्थ्य से जुड़े प्रमाण और ठोस हैं, और 2021 से दर्ज हैं: विश्व स्वास्थ्य संगठन की 17 मई 2021 की विज्ञप्ति के अनुसार सप्ताह में 55 या अधिक घंटे काम करना “सप्ताह में 35-40 घंटे काम करने की तुलना में स्ट्रोक के अनुमानित 35% अधिक जोखिम और इस्कीमिक हृदय रोग से मृत्यु के 17% अधिक जोखिम से जुड़ा है”। विज्ञप्ति लंबे कामकाजी घंटों से जुड़े इन दो कारणों से 2016 में हुई मौतों को 745,000 आँकती है, जो “2000 के बाद से 29 प्रतिशत की वृद्धि” है। लेखक ने रोज़गार से जुड़ा एक तर्क भी जोड़ा है: “जो नियोक्ता मौजूदा कर्मचारियों से ही ज़्यादा काम ले सकता है, उसके पास किसी और को भर्ती करने का कारण कम होता है।”

5. ग़लत श्रोता, और उपाय। यह दावा डच श्रोताओं के सामने किया गया था। लेखक ने यूरोस्टेट के हवाले से बताया है कि नीदरलैंड्स में यूरोपीय संघ का सबसे छोटा औसत कार्य-सप्ताह है, अंशकालिक कामगारों को मिलाकर 2025 में 31.9 घंटे, और स्टैटिस्टिक्स नीदरलैंड्स के हवाले से कि 2024 में प्रति व्यक्ति GDP में वह यूरोपीय संघ में चौथे स्थान पर रहा; ये आँकड़े लेखक के हैं। लेख ध्यान दिलाता है कि डच शीतकालीन समय में एम्सटर्डम में शुक्रवार शाम चार बजे बेंगलुरु में रात के साढ़े आठ बजे होते हैं। लेखक के सुझाए उपाय: वाणिज्य मंत्रालय “वैधानिक कार्य-सप्ताह, ओवरटाइम की दोगुनी दर और साप्ताहिक अवकाश को अपनी निवेशक-सामग्री में शामिल कर सकता है, ताकि अनुपालन ही प्रस्तुति बन जाए”; सरकार राइट टू डिस्कनेक्ट विधेयक को अपना सकती है; कॉर्पोरेट जगत के नेता सार्वजनिक कर सकते हैं कि उनकी कंपनियाँ कार्य-समय के बाद कितना काम माँगती हैं और उसका कितना भुगतान करती हैं; और श्रम विभाग “शिकायतों का इंतज़ार किए बिना” ओवरटाइम रजिस्टरों की जाँच कर सकते हैं।

आँकड़े और संस्थाएँ

प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य:

चारों श्रम संहिताएँ:

  • संहिताएँ: मजदूरी संहिता, 2019; औद्योगिक संबंध संहिता, 2020; सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020; OSH संहिता, 2020।
  • लागू: 21 नवंबर 2025 से प्रभावी, 29 श्रम क़ानूनों को युक्तिसंगत बनाते हुए।
  • OSH संहिता, 2020: 2020 का अधिनियम संख्यांक 37; धारा 143 जिन 13 अधिनियमों को निरस्त करती है, उनमें कारखाना अधिनियम, 1948 भी है।

काम के घंटे और ओवरटाइम:

  • OSH संहिता धारा 25: दिन में आठ घंटे से अधिक नहीं।
  • OSH संहिता धारा 26: सप्ताह में छह दिन से अधिक नहीं।
  • OSH संहिता धारा 27: कामगार की सहमति के अधीन, सामान्य दर से दोगुनी दर पर ओवरटाइम।
  • OSH (केंद्रीय) नियम, 2026: G.S.R. 345(E), 8 मई 2026, श्रम और रोज़गार मंत्रालय।
  • नियम 64(1): सप्ताह में 48 घंटे से अधिक नहीं।
  • नियम 69: मजदूरी दर से दोगुनी दर पर ओवरटाइम; नियम 69(4) का एक परंतुक इसकी सीमा एक तिमाही में 144 घंटे रखता है।

दायरे में कौन:

  • समवर्ती सूची: प्रविष्टि 22 (व्यापार संघ; औद्योगिक और श्रम विवाद) और प्रविष्टि 24 (श्रम कल्याण, जिसमें काम की दशाएँ शामिल हैं)।
  • “समुचित सरकार” (OSH संहिता धारा 2(1)(d)), केंद्र: रेलवे, खानें, तेल क्षेत्र, महापत्तन, हवाई परिवहन, दूरसंचार, बैंक, बीमा कंपनियाँ।
  • “समुचित सरकार”, राज्य: कारखाने और अधिकांश अन्य प्रतिष्ठान।
  • IR संहिता धारा 2(zr), “कर्मकार”: प्रबंधकीय या प्रशासनिक कर्मचारी और 18,000 रुपये प्रति माह (या केंद्र द्वारा अधिसूचित राशि) से अधिक कमाने वाले पर्यवेक्षक बाहर।
  • IR संहिता धारा 2(zh)(iv): नियत अवधि अनुबंध की समाप्ति छंटनी नहीं है।
  • IR संहिता धारा 2(o), नियत अवधि कामगार: एक वर्ष की सेवा के बाद ग्रेच्युटी।

डिस्कनेक्ट करने का अधिकार और स्वास्थ्य:

  • राइट टू डिस्कनेक्ट विधेयक, 2025: गैर-सरकारी सदस्य विधेयक, सुप्रिया सुले, 5 दिसंबर 2025 को पेश; लंबित।
  • WHO (17 मई 2021): सप्ताह में 55+ घंटे काम स्ट्रोक के 35% अधिक जोखिम और इस्कीमिक हृदय रोग से मृत्यु के 17% अधिक जोखिम से जुड़ा।
  • WHO का अनुमान: 2016 में स्ट्रोक और इस्कीमिक हृदय रोग से हुई 745,000 मौतें लंबे कामकाजी घंटों से जुड़ी।

⚠️ संभावित भ्रामक बिंदु: OSH संहिता दिन में आठ घंटे और सप्ताह में छह दिन तय करती है; 48 घंटे का सप्ताह और 144 घंटे की तिमाही ओवरटाइम सीमा 8 मई 2026 के केंद्रीय नियमों से आती हैं, जो केवल केंद्र के दायरे पर बाध्यकारी हैं। श्रम समवर्ती सूची का विषय है, संघ सूची का नहीं। राइट टू डिस्कनेक्ट विधेयक एक गैर-सरकारी सदस्य विधेयक है, सरकारी विधेयक नहीं, और यह क़ानून नहीं बना है।

वाद-विवाद

स्तंभ का पक्ष। जिस उपलब्धता से कामगार इनकार न कर सके, वह गुण नहीं, निर्भरता का लक्षण है, और जो मंत्री उसे बेचता है, वह किसी और की चीज़ की पेशकश कर रहा है। क़ानून सीमाएँ तो तय करता है, लेकिन वे बहुत कम निजी दफ़्तरों तक पहुँचती हैं, एक ऐसी सहमति पर टिकी हैं जिसे रोक पाना कठिन है, और कई पेशेवरों को इस असमंजस में छोड़ देती हैं कि वे “कर्मकार” हैं भी या नहीं। लंबे कामकाजी घंटों की स्वास्थ्य पर एक दर्ज कीमत है और इनसे भर्ती भी घट सकती है।

दूसरा पक्ष। भारत के सेवा-निर्यात मॉडल में गोयनका की बात में दम है: अलग-अलग समय क्षेत्रों के ग्राहकों को सेवा देने वाली कंपनियाँ आंशिक रूप से तत्परता के बल पर प्रतिस्पर्धा करती हैं, और बहुत-से कर्मचारी वेतन या तरक़्क़ी के लिए अतिरिक्त घंटे ख़ुद चुन सकते हैं। OSH संहिता पहले से ही ओवरटाइम को दोगुनी दर पर सवेतन और सहमति-आधारित बनाती है, इसलिए समस्या क़ानून से ज़्यादा उसके क्रियान्वयन में हो सकती है। डिस्कनेक्ट करने का एक कठोर वैधानिक अधिकार बहुत भिन्न कार्यस्थलों पर लागू करना भी कठिन हो सकता है, और संसद में लंबित विधेयक एक गैर-सरकारी सदस्य विधेयक है, सरकारी प्रस्ताव नहीं।

संतुलित निष्कर्ष। स्तंभ इस बात में सही है कि “कभी घड़ी न देखना” उस देश के लिए निवेश की कमज़ोर प्रस्तुति है जो कौशल और भरोसेमंद संस्थाएँ बेचना चाहता है, और क़ानून के लिखित पाठ के बारे में भी सही है। लेकिन उपाय मुख्यतः राज्यों के हाथ में है, जो अधिकांश निजी दफ़्तरों को नियंत्रित करते हैं, और क्रियान्वयन में है: काम के घंटों पर राज्यों के स्पष्ट नियम, ओवरटाइम रजिस्टरों की वास्तविक जाँच, और कार्य-समय के बाद के काम का ईमानदार रिकॉर्ड। डिस्कनेक्ट करने का अधिकार बहस का एक उचित विषय है, अभी कोई तय उत्तर नहीं।

इस विषय पर कैसे सोचें

श्रम-अधिकार से जुड़े किसी भी प्रश्न के लिए “कौन-सा क़ानून, कौन-सी सरकार, कौन-सा कामगार” की दृष्टि अपनाइए:

  1. कौन-सा क़ानून? संहिता या नियम, और कौन-सी धारा? (दिन की सीमा संहिता में है; 48 घंटे का सप्ताह केंद्रीय नियमों में।)
  2. कौन-सी सरकार? इस प्रतिष्ठान के लिए केंद्र “समुचित सरकार” है या राज्य? (बैंक और दूरसंचार: केंद्र; अधिकांश निजी दफ़्तर: राज्य।)
  3. कौन-सा व्यक्ति? क्या क़ानून की “कर्मकार” की परिभाषा उस पर लागू होती है? (IR संहिता के तहत प्रबंधक और ऊँचे वेतन वाले पर्यवेक्षक बाहर हैं।)
  4. वास्तविक अधिकार या कागज़ी? क्या वह सहमति पर टिका है, और क्या सहमति से बिना जोखिम इनकार किया जा सकता है? (नियत अवधि अनुबंध का नवीनीकरण नियोक्ता के हाथ में है।)
  5. क़ानून या प्रस्ताव? क्या वह लागू है, मसौदा है, या गैर-सरकारी सदस्य विधेयक? (राइट टू डिस्कनेक्ट विधेयक एक लंबित गैर-सरकारी सदस्य विधेयक है।)

फिर जाँचे गए तथ्यों को दावों से अलग कीजिए: क़ानूनों और WHO के अनुमान का हवाला दिया जा सकता है; सर्वेक्षण के आँकड़े, कर्नाटक के प्रसंग और नीदरलैंड्स के आँकड़े लेखक के हैं।

आरेख में समझें

दावा: भारत में कोई नहीं कहता “पाँच बज गए” → सबसे कम मोलभाव-शक्ति वाले कर्मचारी चुप रहते हैं → ओवरटाइम की ऐसी “सहमति” जिससे इनकार कठिन है → विधिक सीमाएँ जो केवल केंद्र के दायरे और “कर्मकारों” तक पहुँचती हैं → डिस्कनेक्ट करने का कोई अधिकार नहीं → लेखक का उपाय: अनुपालन को ही प्रस्तुति बनाइए

इसे बाएँ से दाएँ पढ़िए: हर चरण यह दायरा और सीमित करता है कि क़ानून वास्तव में किसकी रक्षा करता है, और लेखक का उपाय पहले ही चरण पर काम करता है, यानी जो बेचा जा रहा है उसे बदलकर।

✍️मुख्य परीक्षा: उत्तर का ढाँचा
प्रश्न

लंबे कामकाजी घंटों को अक्सर भारतीय कार्यबल की प्रतिस्पर्धी बढ़त के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। श्रम संहिताओं के अंतर्गत काम के घंटों और ओवरटाइम की विधिक सीमाओं का परीक्षण कीजिए, वेतनभोगी और नियत अवधि कर्मचारियों के संरक्षण में विद्यमान कमियों की पहचान कीजिए और आगे की राह सुझाइए। (250 शब्द)

भारत की चारों श्रम संहिताएँ 21 नवंबर 2025 से प्रभावी हुईं और इन्होंने 29 श्रम क़ानूनों का स्थान लिया। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता, 2020 दैनिक कार्य-घंटों की सीमा तय करती है और ओवरटाइम को सवेतन और सहमति-आधारित बनाती है, लेकिन ये सीमाएँ आधुनिक वेतनभोगी कर्मचारी की रक्षा कर पाती हैं या नहीं, यह उनकी पहुँच और ‘सहमति’ की वास्तविकता से तय होता है।

विधिक सीमाएँ। OSH संहिता की धारा 25 दिन में आठ घंटे से अधिक काम पर रोक लगाती है, धारा 26 सप्ताह में छह दिन से अधिक काम पर, और धारा 27 कामगार की सहमति के अधीन ओवरटाइम का भुगतान सामान्य दर से दोगुनी दर पर करने का प्रावधान करती है। OSH (केंद्रीय) नियम, 2026 (G.S.R. 345(E), 8 मई 2026) सप्ताह की सीमा 48 घंटे रखते हैं (नियम 64), और नियम 69(4) का एक परंतुक किसी तिमाही में 144 घंटे से अधिक ओवरटाइम पर रोक लगाता है। कमियाँ। पहली, श्रम समवर्ती सूची का विषय है (सूची III, प्रविष्टि 22 और 24), और केंद्र अपने प्रतिष्ठानों, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, रेलवे, खानों, महापत्तनों, हवाई परिवहन, दूरसंचार, बैंकों और बीमा कंपनियों आदि के लिए ‘समुचित सरकार’ है; अधिकांश निजी दफ़्तर राज्यों के नियमों के दायरे में आते हैं। दूसरी, जहाँ मोलभाव की ताकत कमज़ोर है, वहाँ सहमति भी कमज़ोर होती है: औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत नियत अवधि अनुबंध की समाप्ति छंटनी नहीं है, इसलिए अनुबंध का नवीनीकरण नियोक्ता पर निर्भर रहता है। तीसरी, IR संहिता की ‘कर्मकार’ की परिभाषा से वे लोग बाहर हैं जो मुख्यतः प्रबंधकीय या प्रशासनिक हैसियत में नियोजित हैं, और वे पर्यवेक्षक भी जो 18,000 रुपये प्रति माह से अधिक कमाते हैं; इससे बहुत-से पेशेवर इसके विवाद-निवारण तंत्र से बाहर रह जाते हैं। चौथी, डिस्कनेक्ट करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है; राइट टू डिस्कनेक्ट विधेयक, 2025 एक गैर-सरकारी सदस्य विधेयक है। कीमत। WHO के अनुमान (2021) 55 घंटे या उससे अधिक के कार्य-सप्ताह को स्ट्रोक के 35 प्रतिशत अधिक जोखिम और इस्कीमिक हृदय रोग से मृत्यु के 17 प्रतिशत अधिक जोखिम से जोड़ते हैं। आगे की राह। राज्य दफ़्तरों के लिए काम के घंटों और कार्य-विस्तार अवधि (स्प्रेड-ओवर) पर स्पष्ट नियम अधिसूचित करें; निरीक्षक ओवरटाइम रजिस्टरों की सक्रिय जाँच करें; कंपनियाँ कार्य-समय के बाद के काम का रिकॉर्ड रखें; और डिस्कनेक्ट करने के अधिकार पर एक संतुलित ढाँचे के अंग के रूप में बहस की जा सकती है।

भारत को निवेश के लिए असीमित उपलब्धता के बल पर नहीं, बल्कि कौशल, अवसंरचना और भरोसेमंद संस्थाओं के बल पर प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। क़ानून में पहले से मौजूद सीमाओं को लागू करना और उन्हें वेतनभोगी कार्यस्थल तक फैलाना स्वास्थ्य और उत्पादकता की रक्षा करता है और भर्ती का दायरा भी बढ़ा सकता है।

साक्षात्कार का कोण

"भारत में बहुत-से युवा पेशेवर देर रात तक काम के संदेशों का जवाब देते हैं और इसके लिए उन्हें ओवरटाइम नहीं मिलता। राज्य श्रम आयुक्त के रूप में आप इस पर क्या करेंगे, और यह कैसे सुनिश्चित करेंगे कि निवेशक दूर न भागें?"

मुख्य निष्कर्ष

  • उद्धरण-योग्य पंक्ति: “सरकारें आमतौर पर निवेश के लिए उन चीज़ों के बल पर प्रतिस्पर्धा करती हैं जो उनके नियंत्रण में होती हैं, जैसे भूमि, बिजली, कर की शर्तें और स्वीकृतियाँ।”
  • मूल विचार: असीमित उपलब्धता निवेश की कमज़ोर प्रस्तुति है; क़ानून की सीमाओं की पहुँच सीमित है, वे सहमति पर टिकी हैं और डिस्कनेक्ट करने का कोई अधिकार नहीं देतीं।
  • प्रारंभिक परीक्षा के सूत्र: 21 नवंबर 2025 से चारों श्रम संहिताएँ; OSH संहिता की धारा 25 से 27; केंद्रीय नियम, G.S.R. 345(E), नियम 64 और नियम 69; सूची III की प्रविष्टि 22 और 24; IR संहिता की धारा 2(zr) और 2(zh)(iv); राइट टू डिस्कनेक्ट विधेयक, 2025 (गैर-सरकारी सदस्य विधेयक)।
  • नीतिशास्त्र और साक्षात्कार का कोण: असमान शक्ति की स्थिति में सहमति: किसी कर्मचारी की “हाँ” कब स्वतंत्र होती है, और जो व्यक्ति ना कहने की स्थिति में नहीं है, उसके प्रति नियोक्ता का क्या दायित्व है?
  • संभावित प्रश्न: “श्रम संहिताओं के आलोक में भारत के कार्यस्थलों में डिस्कनेक्ट करने के अधिकार की आवश्यकता की विवेचना कीजिए।” (सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 और 3, 150 शब्द)

स्रोत:

  • Amit Kumar, “What Piyush Goyal and Harsh Goenka didn’t say: India is putting its employees’ evenings up for sale”, The Indian Express, 31 अक्टूबर 2026
  • PIB, Ministry of Commerce and Industry, नीदरलैंड्स यात्रा पर 27 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति; trak.in की 28 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट
  • PIB, 21 नवंबर 2025 (चारों श्रम संहिताएँ प्रभावी)
  • The Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020 (धाराएँ 2(1)(d), 25, 26, 27, 143) और the OSH (Central) Rules, 2026, G.S.R. 345(E), 8 मई 2026 (नियम 64 और 69)
  • The Industrial Relations Code, 2020 (धाराएँ 2(o), 2(zh), 2(zr))
  • The Constitution of India, अनुच्छेद 246(2) और सातवीं अनुसूची, सूची III, प्रविष्टि 22 और 24
  • PRS Legislative Research, MP Track (Supriya Sule); Factly, दिसंबर 2025
  • World Health Organization, लंबे कामकाजी घंटों पर 17 मई 2021 की समाचार विज्ञप्ति
  • टिप्पणी: उद्धरण-चिह्नों में दिए गए विधिक और आधिकारिक अंश अंग्रेज़ी पाठ के हिंदी अनुवाद हैं।