🗞️ चर्चा में क्यों सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को कर्नाटक सिविल सेवा (2011 बैच के राजपत्रित परिवीक्षाधीनों के चयन और नियुक्ति का विधिमान्यकरण) अधिनियम, 2022 (Karnataka Civil Services (Validation of Selection and Appointment of 2011 Batch Gazetted Probationers) Act, 2022) को असंवैधानिक ठहराकर रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि विधायिका किसी फ़ैसले का आधार तो हटा सकती है, लेकिन क़ानून बनाकर किसी अंतिम फ़ैसले को निष्प्रभावी नहीं कर सकती। पीठ ने यह भी कहा कि इस अधिनियम के तहत की गई नियुक्तियाँ समाप्त हो जाएँगी।
यह मामला उस सवाल पर टिका है, जिसका सामना शक्तियों के पृथक्करण पर GS2 का हर उत्तर देर-सबेर करता है: जब अदालत किसी विवाद का निपटारा कर चुकी हो, तो क्या विधायिका क़ानून बनाकर उस नतीजे को पलट सकती है? कर्नाटक ने यही कोशिश की, एक ऐसी भर्ती के लिए जिसे उसकी अपनी सरकार रद्द कर चुकी थी और जिसे अदालतें दूषित पा चुकी थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने इसका जवाब ‘नहीं’ में दिया।
2011 की भर्ती और उसके बिखरने की कहानी
3 नवंबर 2011 को कर्नाटक सरकार ने कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) के ज़रिए समूह ‘क’ और ‘ख’ अधिकारियों के 362 पदों पर भर्ती अधिसूचित की। यह भर्ती कर्नाटक राजपत्रित परिवीक्षाधीनों की भर्ती (प्रतियोगी परीक्षाओं द्वारा नियुक्ति) नियम, 1997 (Karnataka Recruitment of Gazetted Probationers (Appointment by Competitive Examinations) Rules, 1997) के तहत हुई।
| चरण | उम्मीदवार (फ़ैसले में दर्ज संख्या) |
|---|---|
| आवेदन किया | 1,38,307 |
| प्रारंभिक परीक्षा में बैठे | 91,667 |
| मुख्य परीक्षा के लिए योग्य ठहरे | 6,211 |
| साक्षात्कार के लिए बुलाए गए | 1,090 |
फ़ैसले में दर्ज ब्योरे के मुताबिक़ इसके बाद यह हुआ:
- 2013: महाधिवक्ता की सलाह पर राज्य ने राज्य CID की जाँच पूरी होने तक अंतिम चयन सूची रोक दी। जाँच में KPSC के अधिकारियों का “व्यापक भ्रष्टाचार और खुले भाई-भतीजावाद के उदाहरण” सामने आए। इसके बाद राज्य ने पूरी भर्ती रद्द कर दी।
- अदालतें: चयनित उम्मीदवार कर्नाटक प्रशासनिक अधिकरण (KAT) में जीत गए और KAT ने सरकारी आदेश रद्द कर दिया। लेकिन KAT के आदेश के ख़िलाफ़ दायर जनहित याचिकाएँ सफल रहीं। उच्च न्यायालय ने 21 मार्च 2014 की चयन सूची रद्द करने के फ़ैसले को सही ठहराया, और सर्वोच्च न्यायालय ने अविनाश सी. एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य मामले में इसके ख़िलाफ़ चुनौती ख़ारिज कर दी।
- ये निष्कर्ष आधार बने: उम्मीदवारों और KPSC सदस्यों के बीच कॉल का ब्योरा; “कम से कम 566 उम्मीदवारों के मामले में” साक्षात्कार में एक जैसे अंक; और KPSC भवन का एक डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर, जिसे “सबूत नष्ट करने के लिए बदल दिया गया था”।
- दूसरी कोशिश भी नाकाम: लिखित परीक्षा के परिणामों वाले चरण से भर्ती दोबारा शुरू करने की याचिका उच्च न्यायालय ने ख़ारिज कर दी। इसके ख़िलाफ़ चुनौती भी सर्वोच्च न्यायालय में नहीं टिकी।
2022 का अधिनियम: क़ानून बनाकर अदालतों का फ़ैसला पलटना
फ़ैसले के शब्दों में, “भर्ती के चरण से एक दशक से भी अधिक समय बाद, जब ज़ाहिर है कि राजनीतिक हवाएँ बदलती रहीं”, 2022 में यह विधिमान्यकरण अधिनियम पारित हुआ। यह 2022 का कर्नाटक अधिनियम संख्यांक 14 है। इसे 12 मार्च 2022 को राज्यपाल की अनुमति मिली और यह पहली बार 14 मार्च 2022 को कर्नाटक राजपत्र असाधारण में प्रकाशित हुआ। इसमें सातवीं अनुसूची की सूची II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 41 का हवाला दिया गया है।
इसकी धारा 3 इन शब्दों से शुरू होती है: “किसी न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकरण के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश में इसके विपरीत अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी”। आगे यह धारा KPSC के 2011 के चयन को “विधि के अनुसार विधिमान्य” घोषित करती थी। उसने राज्य के 15 अक्टूबर 2013 और 14 अगस्त 2014 के वे आदेश रद्द किए, जिनसे भर्ती वापस ली गई थी, नियुक्ति आदेश जारी करने का प्रावधान किया, और नियुक्तियों की समीक्षा का निर्देश देने वाले किसी भी वाद या न्यायालय-आदेश पर रोक लगा दी।
अधिनियम के उद्देश्यों के कथन में तर्क दिया गया था कि “उच्च न्यायालय के निर्णय से भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन होता है”।
फ़ैसले में दर्ज है कि अधिनियम के तहत “चयनित 362 उम्मीदवारों में से 46 दाग़ी पाए गए। 191 उम्मीदवारों को नियुक्ति दी गई, जिनमें से 14 दाग़ी हैं।”
अपील की पृष्ठभूमि यह है कि मार्च 2022 में अधिनियम के ख़िलाफ़ KAT और उच्च न्यायालय में याचिकाएँ दायर हुईं। उच्च न्यायालय ने 21 अप्रैल 2022 के आदेश से रिट याचिका ख़ारिज कर दी; सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश को “अस्पष्ट” (cryptic) कहा। KAT ने अंतरिम राहत देने से इनकार किया था, और बाद में उच्च न्यायालय ने उस इनकार को भी सही ठहराया।
सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा
विधिमान्यकरण क़ानून: विधायिका क्या कर सकती है और क्या नहीं
न्यायालय ने कौन-सा नियम लागू किया, कर्नाटक अधिनियम उस कसौटी पर कैसा उतरा, और न्यायालय ने राहत को किस तरह ढाला।
फ़ैसला: “हमारे मन में कोई संदेह नहीं है कि विचाराधीन विधान असंवैधानिक है। हम उसे अपास्त करते हैं, और साथ ही यहाँ चुनौती दिए गए उन निर्णयों को भी, जो जनहित याचिका में और KAT के आदेश के विरुद्ध दायर रिट याचिका में, दोनों में दिए गए थे।” फ़ैसला न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने लिखा।
सिद्धांत: एस.टी. सादिक बनाम केरल राज्य (2015) के फ़ैसले के आधार पर न्यायालय ने कहा कि किसी न्यायालय के निर्णय के बावजूद किसी क़ानून को भूतलक्षी प्रभाव से विधिमान्य करते समय “किसी पूर्व निर्णय का मूल आधार ही बदलना अनुमेय है, लेकिन बाद के किसी विधान से अंतिम निर्णय को सीधे निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता; विधायिका का ऐसा कृत्य असंवैधानिक घोषित किया जाएगा।” LiveLaw के सारांश के मुताबिक़, फ़ैसले का मूल आधार हटाया ही नहीं गया, इसलिए यह अधिनियम अंतिम फ़ैसले को निष्प्रभावी करने की प्रवृत्ति रखता है, जो अनुमेय नहीं है।
कर्नाटक के मामले में: रद्दीकरण को उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय, दोनों ने सही ठहराया था। इसलिए “विधायिका के पास यह शक्ति नहीं है कि वह विधान बनाकर भी रद्दीकरण को निष्प्रभावी करे और इस तरह संवैधानिक न्यायालयों के निर्णयों को शून्य कर दे।”
चयनितों के लिए साम्या नहीं: “जहाँ तक चयनित उम्मीदवारों का संबंध है, कोई साम्या (equity) नहीं हो सकती, विशेषकर तब, जब चयन ऐसी भर्ती पर आधारित है जिसे संवैधानिक न्यायालयों ने दूषित घोषित किया है, और नियुक्ति एक मृतजात विधान, यानी 2022 के अधिनियम, के आधार पर की गई है।”
राज्य का अपना रुख़: कर्नाटक की ओर से पेश कपिल सिब्बल ने “स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस विधान का किसी भी तरह समर्थन नहीं किया जा सकता”। अधिनियम का बचाव चयनित उम्मीदवारों ने किया।
उच्च न्यायालय पर टिप्पणी: पीठ ने उच्च न्यायालय के फ़ैसलों पर “थोड़ा आश्चर्य और उससे कहीं अधिक चिंता” दर्ज की, क्योंकि उनमें “एक ऐसे अधिनियम को सही ठहराया गया, जो विधि बनाने वाले प्राधिकारी को प्रदत्त शक्तियों के दायरे से स्पष्ट रूप से बाहर है और बेतुकेपन की सीमा छूता है।”
| जिस मामले को आधार बनाया गया | उससे मिला बिंदु |
|---|---|
| मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया बनाम केरल राज्य (2019) | हूबहू “वैसी ही स्थिति” |
| जनपद सभा, छिंदवाड़ा बनाम सेंट्रल प्रोविंसेज़ सिंडिकेट (1970) | विधायिका किसी निर्णय को निष्प्रभावी नहीं बना सकती, हालाँकि वह किसी क़ानून में भूतलक्षी प्रभाव से संशोधन करके उसे विधिमान्य कर सकती है |
| इन रे कावेरी जल विवाद अधिकरण (1993) | न्यायिक पुनर्विलोकन को दरकिनार करना “विधि के शासन की मौत की घंटी बजा देगा”; विधि में सामान्य रूप से बदलाव हो सकता है, लेकिन पक्षकारों के बीच (inter parties) दिए गए किसी एक निर्णय को अपास्त नहीं किया जा सकता |
| एस.टी. सादिक बनाम केरल राज्य (2015) | आधार बदला जा सकता है; अंतिम निर्णय को सीधे निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता |
यह फ़ैसला रिपोर्ट न किए जाने योग्य (non-reportable) चिह्नित है और दो न्यायाधीशों की पीठ ने दिया है। इसका वज़न इस बात में है कि इसमें एक स्थापित सिद्धांत को बेहद साफ़ तथ्यों पर लागू किया गया है।
राहत: नए सिरे से शुरुआत नहीं, ढाली गई राहत
अधिनियम रद्द करने के बाद न्यायालय ने कहा कि “दूषित भर्ती के अनुसरण में की गई नियुक्तियाँ भी समाप्त हो जाएँगी।” इनमें वे नियुक्त व्यक्ति भी शामिल हैं, जो दाग़ी नहीं पाए गए। “डेढ़ दशक बीत जाने” की वजह से न्यायालय ने 2011 का चयन उस चरण से फिर शुरू कराने से इनकार किया, जिस चरण पर वह दूषित पाया गया था। इसके बजाय:
- राज्य को मौजूदा भर्ती नियमों के तहत समूह ‘क’ और ‘ख’ के रिक्त पदों पर भर्ती अधिसूचित करनी है;
- जो नियुक्त व्यक्ति दाग़ी नहीं पाए गए, उन्हें, छह अपीलकर्ताओं को और KAT के समक्ष याचिकाकर्ताओं को एकमुश्त अवसर के रूप में आयु में छूट मिलेगी; वे अन्य पात्र उम्मीदवारों के साथ प्रतिस्पर्धा करेंगे;
- चुने जाने पर उनकी वरिष्ठता केवल नियुक्ति की तारीख़ से गिनी जाएगी, और न पिछला वेतन (back wages) मिलेगा, न आनुमानिक नियुक्ति (notional appointment);
- जो लोग अभी सेवा में हैं और फिर से चुने जाते हैं, उनकी पिछली सेवा पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों के लिए गिनी जाएगी।
मुख्य परीक्षा की दृष्टि से: विधायिका, न्यायालय और भर्ती की शुचिता
- शक्तियों का पृथक्करण: विधायिका सबके लिए क़ानून बदल सकती है, लेकिन तय हो चुके मामले पर अपीलीय अदालत बनकर नहीं बैठ सकती। धारा 3 में “किसी निर्णय में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी” वाला खंड है, और अदालतों ने जो दोष पाया था, उसे दूर करने के लिए कुछ नहीं किया गया। यह विधायी अधिक्रमण (legislative overruling), यानी क़ानून बनाकर अदालत का फ़ैसला पलटने, का सबसे स्पष्ट रूप है।
- विधि का शासन: न्यायालय ने जिस कावेरी संदर्भ को आधार बनाया, उसके शब्दों में, अगर कोई राज्य क़ानून बनाकर न्यायिक पुनर्विलोकन को दरकिनार कर सके, तो यह “विधि के शासन की मौत की घंटी बजा देगा”।
- PSC की शुचिता: उच्च न्यायालय के निष्कर्षों का ज़िक्र करते हुए फ़ैसला लोक सेवा आयोग को “एक संवैधानिक निकाय कहता है, जिसका काम बिना किसी दाग़ के भर्तियाँ करके प्रशासन के कुशल और सुचारु संचालन में सहायता करना है।” दूषित चयन को विधिमान्य करने वाला क़ानून ठीक उसी आचरण को पुरस्कृत करता है, जिसे रोकने के लिए आयोग बना है।
- साम्या और उसकी सीमाएँ: जो उम्मीदवार दाग़ी नहीं थे, वे वर्षों से सेवा में हैं। न्यायालय ने उन्हें पद के मामले में साम्या का लाभ नहीं दिया, लेकिन आयु में छूट और पेंशन के लिए पिछली सेवा की गिनती देकर चोट कुछ हल्की की। यह विधि के शासन और व्यक्तिगत कठिनाई के बीच का संतुलन है।
- देरी: अधिसूचना से अंतिम फ़ैसले तक पंद्रह साल लगना अपने-आप में शासन की विफलता है। अब इन पदों को आज के नियमों के तहत फिर से भरना होगा।
आगे क्या: राज्य सरकार को रिक्त पदों पर भर्ती अधिसूचित करनी है। फ़ैसले में इसके लिए कोई तारीख़ तय नहीं की गई है।
आगे की राह
- फ़ैसला नहीं, कारण सुधारें: अगर विधायिका किसी फ़ैसले से असहमत है, तो उसे क़ानून का आधार भविष्यलक्षी रूप से या सामान्य रूप से बदलना चाहिए, किसी एक दूषित सूची को विधिमान्य नहीं करना चाहिए।
- PSC भर्ती में छेड़छाड़ छिप न सके: सुरक्षित रिकॉर्ड, साक्षात्कारों की रिकॉर्डिंग और अंकों का स्वतंत्र ऑडिट हो, ताकि 566 उम्मीदवारों को एक जैसे अंक मिलने जैसे निष्कर्षों की नौबत ही न आए।
- समयबद्ध मुक़दमेबाज़ी: भर्ती से जुड़े विवाद एक भर्ती-चक्र के भीतर निपट जाने चाहिए, डेढ़ दशक तक नहीं खिंचने चाहिए।
- जवाबदेही: जाँच में अधिकारियों के ख़िलाफ़ जो निष्कर्ष आए, उन पर केवल भर्ती रद्द करना काफ़ी नहीं; अनुशासनात्मक और आपराधिक कार्रवाई को भी अंजाम तक पहुँचाना ज़रूरी है।
लोक सेवा आयोगों के संवैधानिक ढाँचे की पृष्ठभूमि के लिए देखें हमारा 1 अक्टूबर का विस्तृत विश्लेषण: UPSC के 100 वर्ष और अनुच्छेद 315 से 323 (अंग्रेज़ी)।
UPSC प्रासंगिकता
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2: विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का पृथक्करण; न्यायपालिका और विधायिका की कार्यप्रणाली; संवैधानिक निकाय (राज्य लोक सेवा आयोग); संघ और राज्यों के अधीन सेवाएँ।
प्रारंभिक परीक्षा: अनुच्छेद 141, 309, 315 और 320; सूची II की प्रविष्टि 41; विधिमान्यकरण अधिनियमों से जुड़ा सिद्धांत; अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16।
मुख्य परीक्षा: “विधायिका किसी निर्णय का आधार हटा सकती है, लेकिन उसे निष्प्रभावी नहीं कर सकती। कर्नाटक के 2022 के विधिमान्यकरण अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के आलोक में इस सिद्धांत का परीक्षण कीजिए।” (250 शब्द)
📌 तथ्य सार: ज्ञानकोश
प्रारंभिक परीक्षा: कथन-योग्य तथ्य:
- रद्द किया गया: कर्नाटक सिविल सेवा (2011 बैच के राजपत्रित परिवीक्षाधीनों के चयन और नियुक्ति का विधिमान्यकरण) अधिनियम, 2022
- 2022 का कर्नाटक अधिनियम संख्यांक 14: राज्यपाल की अनुमति 12 मार्च 2022; राजपत्र असाधारण में पहला प्रकाशन 14 मार्च 2022
- अधिनियम में सातवीं अनुसूची की सूची II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 41 का हवाला है
- पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन; फ़ैसला न्यायमूर्ति चंद्रन ने लिखा; 29 अक्टूबर 2026
- मामला: श्रीनिवास टी. एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य; 2026 INSC 1173
- 2011 की भर्ती: अधिसूचना 3 नवंबर 2011; समूह ‘क’ और ‘ख’ के 362 पद; 1,38,307 आवेदक
- अधिनियम के तहत: 362 चयनितों में से 46 दाग़ी पाए गए; 191 नियुक्त, जिनमें से 14 दाग़ी
- अनुच्छेद 309: विधानमंडल भर्ती और सेवा-शर्तों का विनियमन करता है; अनुच्छेद 320: लोक सेवा आयोग परीक्षाएँ कराते हैं
- अनुच्छेद 315: संघ के लिए और प्रत्येक राज्य के लिए एक लोक सेवा आयोग
- नियम: विधायिका किसी निर्णय का आधार बदल सकती है, उसे सीधे निष्प्रभावी नहीं कर सकती (एस.टी. सादिक बनाम केरल राज्य, 2015)
प्रारंभिक परीक्षा: संभावित जाल:
- दो न्यायाधीशों की पीठ, रिपोर्ट न किए जाने योग्य (non-reportable) चिह्नित; संविधान पीठ नहीं
- न पूरा चयन नए सिरे से, न बहाली: नियुक्तियाँ समाप्त; रिक्त पदों पर फिर से अधिसूचना होगी
- सर्वोच्च न्यायालय में कर्नाटक ने ख़ुद अधिनियम का बचाव नहीं किया; बचाव चयनित उम्मीदवारों ने किया
मुख्य परीक्षा: तर्क और मुख्य शब्द:
- मुख्य शब्द: विधिमान्यकरण अधिनियम, शक्तियों का पृथक्करण, विधायी अधिक्रमण (legislative overruling), विधि का शासन, PSC की शुचिता, ढाली गई राहत (moulded relief)
- ढाँचा: विधायिका सामान्य रूप से क़ानून बदलती है; मामले का फ़ैसला अदालत करती है; जो क़ानून केवल फ़ैसला पलटता है, वह नहीं टिकता
साक्षात्कार: इनके लिए तैयार रहें:
- “क्या उन अधिकारियों को हटाना उचित है, जो दाग़ी नहीं थे?” चयन ही शून्य था; न्यायालय ने आयु में छूट और पेंशन के लिए पिछली सेवा की गिनती देकर कठिनाई कम की।
स्रोत: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, Srinivasa T. and Ors. v. State of Karnataka and Ors., SLP (C) Nos. 21195-21196 of 2023 से उत्पन्न सिविल अपीलें, 29 अक्टूबर 2026 का निर्णय (2026 INSC 1173)। LiveLaw, यश मित्तल, 29 अक्टूबर 2026। The Hindu, “Top court axes Karnataka law validating ‘corrupt’ hiring”, कृष्णदास राजगोपाल, 30 अक्टूबर 2026 (प्रिंट)। 2022 का कर्नाटक अधिनियम संख्यांक 14 (कर्नाटक राजपत्र असाधारण)। भारत का संविधान (विधायी विभाग का पाठ, 2024)।
- टिप्पणी: उद्धरण-चिह्नों में दिए गए विधिक और आधिकारिक अंश अंग्रेज़ी पाठ के हिंदी अनुवाद हैं।