UPSC प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास
UPSC प्रारंभिक परीक्षा क्विज़ 30 अक्टूबर 2026: करेंट अफेयर्स MCQ
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आज के करेंट अफेयर्स पर आधारित 10 प्रश्न
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प्रश्न 1 / 10
1. भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत प्रतिरूपण द्वारा छल धारा 319 के अंतर्गत अपराध है।
2. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66D संचार उपकरण या कंप्यूटर संसाधन के माध्यम से प्रतिरूपण द्वारा छल को दंडनीय बनाती है।
3. भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का संबद्ध कार्यालय है।
4. भारतीय क़ानून में 'डिजिटल अरेस्ट' का प्रावधान है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल के ज़रिए हिरासत में रखा जा सकता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: BNS की धारा 319 किसी अन्य वास्तविक या काल्पनिक व्यक्ति होने का स्वांग रचकर किए गए छल से संबंधित है; इसमें पाँच वर्ष तक की सज़ा, या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। साधारण छल धारा 318 में आता है।
कथन 2 सही है: धारा 66D संचार उपकरण या कंप्यूटर संसाधन के ज़रिए प्रतिरूपण द्वारा छल से संबंधित है, और धारा 66C पहचान की चोरी से; दोनों में तीन वर्ष तक की सज़ा और एक लाख रुपये तक का जुर्माना है।
कथन 3 गलत है: I4C गृह मंत्रालय का संबद्ध कार्यालय है, MeitY का नहीं।
कथन 4 गलत है: ‘डिजिटल अरेस्ट’ एक घोटाले का नाम है, कोई शक्ति नहीं; भारत में डिजिटल अरेस्ट का कोई विधिक प्रावधान नहीं है।
विश्लेषण: डिजिटल अरेस्ट घोटालों पर स्वतः संज्ञान मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने RBI से कहा कि जहाँ धोखाधड़ी बैंक की समुचित सावधानी (due diligence) में चूक से हुई हो, वहाँ वह वित्तीय संस्थाओं से पीड़ितों की क्षतिपूर्ति करवाए। यह नियामक से न्यायालय की अपेक्षा है, अभी किसी बैंक पर बाध्यकारी नियम नहीं।
अवधारणा नोट
डिजिटल अरेस्ट घोटाले प्रतिरूपण पर टिके होते हैं: फ़ोन करने वाले ख़ुद को पुलिस, जाँच अधिकारी या कोई अन्य अधिकारी बताते हैं और पीड़ितों को डराकर पैसे ट्रांसफ़र करवा लेते हैं। इनसे निपटने के लिए दो क़ानून हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 (2023 का अधिनियम 45) छल को परिभाषित करती है: किसी व्यक्ति को धोखा देकर कपटपूर्वक या बेईमानी से उसे संपत्ति सौंपने के लिए उत्प्रेरित करना। संपत्ति सौंपने के लिए उत्प्रेरित करने वाले छल में सात वर्ष तक की सज़ा और जुर्माना है (धारा 318(4)), और प्रतिरूपण द्वारा छल में पाँच वर्ष तक (धारा 319)। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 इसमें धारा 66C (पहचान की चोरी, यानी इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, पासवर्ड या किसी अन्य विशिष्ट पहचान चिह्न का दुरुपयोग) और धारा 66D (कंप्यूटर संसाधन के ज़रिए प्रतिरूपण द्वारा छल) जोड़ता है। कार्रवाई के स्तर पर गृह मंत्रालय का संबद्ध कार्यालय भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) हर तरह के साइबर अपराध के ख़िलाफ़ कार्रवाई का समन्वय करता है; शिकायतें राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) और टोल-फ़्री हेल्पलाइन 1930 पर दर्ज होती हैं। सर्वोच्च न्यायालय का स्वतः संज्ञान मामला अब एक और सवाल उठाता है: नुक़सान पीड़ित की जगह बैंक कब उठाए?
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 में संचार नेटवर्क के ज़रिए आंतरिक सुरक्षा को चुनौतियाँ और साइबर सुरक्षा की मूल बातें; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 में न्यायपालिका और नियामक निकायों (RBI) की कार्यप्रणाली।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: समुचित सावधानी (due diligence), क्षतिपूर्ति (indemnity), साझा दायित्व, मनी म्यूल खाते।
सामान्य भूल: I4C को MeitY के अधीन मान लेना; यह गृह मंत्रालय का संबद्ध कार्यालय है।
परीक्षा सुझाव: धाराओं को जोड़ियों में याद रखें: BNS 318 (छल), BNS 319 (प्रतिरूपण), IT अधिनियम 66C (पहचान की चोरी), IT अधिनियम 66D (कंप्यूटर संसाधन के ज़रिए प्रतिरूपण)।
साक्षात्कार का कोण: अगर किसी पीड़ित को झाँसा देकर ट्रांसफ़र की मंज़ूरी दिलवाई गई और बैंक की अपनी प्रणालियाँ उसे पकड़ नहीं पाईं, तो क्या बैंक को उसकी भरपाई करनी चाहिए?
प्रश्न 2 / 10
कथन-I: विधायिका किसी भर्ती को रद्द करने वाले न्यायालय के निर्णय को केवल ऐसा क़ानून बनाकर निष्प्रभावी नहीं कर सकती जो न्यायालय द्वारा पाए गए दोष को दूर किए बिना चयन को 'किसी भी निर्णय में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी' वैध घोषित कर दे।
कथन-II: किसी क़ानून को भूतलक्षी प्रभाव से विधिमान्य करते समय विधायिका किसी पूर्व निर्णय के मूल आधार को बदल सकती है, लेकिन बाद के विधान से किसी अंतिम निर्णय को सीधे निरस्त नहीं कर सकती।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही है?
तथ्य: कथन-I सही है: कर्नाटक के 2022 के विधिमान्यकरण अधिनियम को रद्द करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जहाँ किसी रद्दीकरण को उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने सही ठहराया हो, वहाँ ‘विधायिका के पास यह शक्ति नहीं है कि वह विधान बनाकर भी उस रद्दीकरण को निरस्त करे और इस तरह संवैधानिक न्यायालयों के निर्णयों को निष्प्रभावी कर दे’।
कथन-II सही है और कथन-I की व्याख्या करता है: एस.टी. सादिक बनाम केरल राज्य (2015) के आधार पर न्यायालय ने दोहराया कि ‘किसी पूर्व निर्णय के मूल आधार को बदलना अनुमेय है, किंतु बाद के विधान से अंतिम निर्णय को सीधे निरस्त नहीं किया जा सकता’। इसलिए जो क़ानून आधार को जस का तस छोड़कर केवल परिणाम को पलटता है, वह निरस्तीकरण है, और इसी वजह से टिक नहीं पाता।
विश्लेषण: कर्नाटक के अधिनियम ने लोक सेवा आयोग के 2011 के उस चयन को विधिमान्य किया था जिसे न्यायालयों ने दूषित पाया था; दो न्यायाधीशों की पीठ ने इसे असंवैधानिक ठहराया, और ख़ुद कर्नाटक ने न्यायालय से कहा कि इस क़ानून का बचाव नहीं किया जा सकता।
अवधारणा नोट
विधिमान्यकरण अधिनियम किसी क़ानून में भूतलक्षी संशोधन करता है और न्यायालय के निर्णय के बावजूद पिछली कार्रवाई को विधिमान्य बनाता है; इसके लिए वह उस दोष को दूर करता है जो न्यायालय ने पाया था। सर्वोच्च न्यायालय की स्थापित राय है कि विधायिका ‘किसी पूर्व निर्णय के मूल आधार को बदल’ सकती है, लेकिन ‘अंतिम निर्णय को सीधे निरस्त नहीं कर सकती’। इसका कारण शक्तियों का पृथक्करण है: ‘विधायी कार्य क़ानून बनाना है, यह घोषित करना नहीं कि क़ानून क्या होगा’, जबकि पक्षकारों के बीच विवाद का फ़ैसला करना न्यायालयों का काम है। अनुच्छेद 141 के तहत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है। कर्नाटक का मामला भर्ती के संवैधानिक ढाँचे को भी छूता है: अनुच्छेद 309 समुचित विधानमंडल को संघ या किसी राज्य के अधीन पदों पर नियुक्त व्यक्तियों की भर्ती और सेवा-शर्तों का विनियमन करने देता है; अनुच्छेद 315 संघ के लिए एक और हर राज्य के लिए एक लोक सेवा आयोग का प्रावधान करता है; और अनुच्छेद 320 नियुक्तियों के लिए परीक्षाएँ कराना उनका कर्तव्य बनाता है। निर्णय ने लोक सेवा आयोग को ऐसा संवैधानिक निकाय कहा जिसका काम ‘बिना किसी दाग़ के’ भर्ती करना है। जिन मामलों का सहारा लिया गया, उनमें जनपद सभा, छिंदवाड़ा (1970) और कावेरी जल विवाद अधिकरण संदर्भ (1993) शामिल हैं।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 में विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, न्यायपालिका और विधायिका की कार्यप्रणाली, और संवैधानिक निकाय (राज्य लोक सेवा आयोग)।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: विधिमान्यकरण अधिनियम, विधायी अधिभावन, विधि का शासन, लोक सेवा आयोग की शुचिता।
सामान्य भूल: ‘किसी भी निर्णय के होते हुए भी’ वाले हर खंड को अमान्य मान लेना; अगर विधायिका न्यायालय द्वारा पाए गए दोष को दूर कर दे, तो वह भूतलक्षी प्रभाव से विधिमान्य कर सकती है।
परीक्षा सुझाव: सूत्र याद रखें: आधार हटाना, हाँ; निर्णय निरस्त करना, नहीं (एस.टी. सादिक, 2015; कावेरी संदर्भ, 1993)।
साक्षात्कार का कोण: जिन अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से दोषी नहीं पाया गया, क्या उनका पद केवल इसलिए छिन जाना न्यायसंगत है कि पूरा चयन ही शून्य था?
प्रश्न 3 / 10
1. गिग कामगार को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जो पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध से बाहर काम करके कमाता है।
2. एग्रीगेटर का अंशदान उसके वार्षिक टर्नओवर के एक से दो प्रतिशत के बीच की दर पर होगा, लेकिन यह एग्रीगेटर द्वारा गिग और प्लेटफ़ॉर्म कामगारों को दी गई या देय राशि के पाँच प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।
3. राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड की अध्यक्षता केंद्रीय श्रम और रोज़गार मंत्री करते हैं।
4. राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड गिग और प्लेटफ़ॉर्म कामगारों के लिए कल्याण योजनाएँ बनाता और चलाता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: धारा 2(35) गिग कामगार को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करती है जो काम करता है या किसी कार्य-व्यवस्था में भाग लेता है और पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध से बाहर उससे कमाई करता है।
कथन 2 सही है: धारा 114(4) वार्षिक टर्नओवर की ‘दो प्रतिशत से अनधिक, किंतु एक प्रतिशत से अन्यून’ दर तय करती है, जिसे केंद्र अधिसूचित करेगा; इसके परंतुक में यह सीमा गिग और प्लेटफ़ॉर्म कामगारों को दी गई या देय राशि के पाँच प्रतिशत पर बाँधी गई है।
कथन 3 सही है: धारा 6(2) के तहत केंद्रीय श्रम और रोज़गार मंत्री अध्यक्ष हैं और मंत्रालय के सचिव उपाध्यक्ष।
कथन 4 गलत है: धारा 6(7) के तहत बोर्ड का काम सिफ़ारिश करना, सलाह देना, निगरानी और समीक्षा करना है; वह केंद्र सरकार से ‘उपयुक्त स्कीमें बनाने के लिए’ सिफ़ारिश करता है, और स्कीमें केंद्र बनाता है।
विश्लेषण: PIB के अनुसार श्रम मंत्रालय ने असंगठित, गिग और प्लेटफ़ॉर्म कामगारों के लिए बोर्ड के गठन को अधिसूचित कर दिया है; एग्रीगेटरों के अंशदान की दर केंद्र धारा 114(4) के तहत अधिसूचित करेगा।
अवधारणा नोट
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (2020 का अधिनियम संख्यांक 36) उन चार श्रम संहिताओं में से एक है जिन्हें 21 नवंबर 2025 से प्रभावी किया गया और जिन्होंने 29 मौजूदा श्रम क़ानूनों को युक्तिसंगत बनाया; सरकार के मुताबिक़ ‘गिग कार्य’, ‘प्लेटफ़ॉर्म कार्य’ और ‘एग्रीगेटर’ पहली बार परिभाषित किए गए। धारा 6(1) केंद्र से अपेक्षा करती है कि वह अधिसूचना जारी कर असंगठित कामगारों के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड गठित करे; इसका कार्यकाल तीन वर्ष का होगा और साल में कम से कम तीन बैठकें होंगी। धारा 114(6) इसी बोर्ड को गिग और प्लेटफ़ॉर्म कामगारों का बोर्ड भी बनाती है, लेकिन इन मामलों के लिए सदस्यों का अलग समूह होगा: अन्य के साथ एग्रीगेटरों के पाँच प्रतिनिधि, गिग और प्लेटफ़ॉर्म कामगारों के पाँच, और बारी-बारी से राज्य सरकारों के पाँच। पैसा धारा 141 की सामाजिक सुरक्षा निधि और धारा 114(4) के एग्रीगेटर अंशदान से आता है; सातवीं अनुसूची में राइड शेयरिंग से लेकर फ़ूड डिलीवरी तक एग्रीगेटरों की नौ श्रेणियाँ दी गई हैं। लाभ केवल पंजीकृत कामगारों को मिलते हैं; धारा 113 के तहत पंजीकरण के लिए 16 वर्ष की आयु (या जो विहित हो) और स्व-घोषणा ज़रूरी है। 26 अगस्त 2021 को शुरू हुआ ई-श्रम पोर्टल असंगठित कामगारों का राष्ट्रीय डेटाबेस है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 में कमज़ोर वर्गों का कल्याण और सांविधिक निकाय; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 में रोज़गार, गिग अर्थव्यवस्था और अनौपचारिक क्षेत्र।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: सामाजिक सुरक्षा का अंतराल, एग्रीगेटर अंशदान, सामाजिक सुरक्षा निधि, ई-श्रम।
सामान्य भूल: 5% के आँकड़े को टर्नओवर का हिस्सा समझना; 1 से 2% की सीमा टर्नओवर पर है, और 5% की अधिकतम सीमा गिग और प्लेटफ़ॉर्म कामगारों को किए गए भुगतान पर।
परीक्षा सुझाव: सलाहकार बोर्ड सिफ़ारिश करता है; स्कीमें केंद्र सरकार बनाती है।
साक्षात्कार का कोण: जिन कामगारों को प्लेटफ़ॉर्म अपना कर्मचारी नहीं मानते, क्या उनकी सामाजिक सुरक्षा का ख़र्च प्लेटफ़ॉर्मों को उठाना चाहिए?
प्रश्न 4 / 10
1. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत किसी निर्वाचन क्षेत्र की निर्वाचक नामावली निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी तैयार और पुनरीक्षित करता है।
2. निर्वाचक नामावली के विशेष पुनरीक्षण का निर्देश देने की निर्वाचन आयोग की शक्ति लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 21(3) में है।
3. निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत प्ररूप 8 नए मतदाता द्वारा नाम शामिल कराने का आवेदन है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13B के अनुसार नामावली निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) तैयार और पुनरीक्षित करता है।
कथन 2 गलत है: ‘ऐसी रीति से जो वह ठीक समझे’ विशेष पुनरीक्षण का निर्देश देने की शक्ति 1950 के अधिनियम की धारा 21(3) में है, जो निर्वाचक नामावलियों का अधिनियम है; 1951 का अधिनियम चुनाव कराने से संबंधित है।
कथन 3 गलत है: नए मतदाताओं का आवेदन प्ररूप 6 है; प्ररूप 8 निवास बदलने, प्रविष्टियों में सुधार, EPIC बदलवाने और दिव्यांगजन के रूप में चिह्नित कराने के लिए है, और प्ररूप 7 किसी नाम को शामिल करने पर आपत्ति या नाम हटवाने के लिए।
विश्लेषण: दिल्ली के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग (ECI) से सवाल किया कि मसौदा नामावली से हटाए गए लोगों से नए मतदाताओं वाले प्ररूप 6 पर आवेदन करने को क्यों कहा गया; कोई आदेश पारित नहीं हुआ। द हिंदू का संपादकीय ‘Deemed ineligible’ (अपात्र मान लिए गए) तर्क देता है कि दोष केवल SIR के अमल में नहीं, उसकी बनावट में ही है।
अवधारणा नोट
निर्वाचक नामावलियाँ तीन परतों पर टिकी हैं। संविधान: अनुच्छेद 324(1) निर्वाचक नामावलियाँ तैयार कराने का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित करता है, और अनुच्छेद 326 के तहत हर वह नागरिक मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का हक़दार है जिसकी आयु अर्हता तिथि पर 18 वर्ष से कम न हो और जो अन्यथा निरर्हित न हो। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950: नामावली ‘अर्हता तिथि के संदर्भ में’ तैयार होती है (धारा 21(1)), आयोग ‘ऐसी रीति से जो वह ठीक समझे’ विशेष पुनरीक्षण का निर्देश दे सकता है (धारा 21(3)), ERO नामावली तैयार और पुनरीक्षित करता है (धारा 13B), और झूठी घोषणा पर एक वर्ष तक का कारावास, या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं (धारा 31)। निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960: नए मतदाताओं के लिए प्ररूप 6, आपत्ति और नाम हटाने के लिए प्ररूप 7, निवास बदलने और सुधार के लिए प्ररूप 8। 1 अगस्त 2022 से साल में चार अर्हता तिथियाँ हैं: 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर। दिल्ली का मामला यह सवाल उठाता है कि जो व्यक्ति 2026 की नामावली में था, उसे पहली बार आवेदन करने वाला कैसे माना जा सकता है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, निर्वाचक नामावलियाँ और निर्वाचन आयोग; निबंध में समावेशन और मताधिकार।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: विशेष गहन पुनरीक्षण, अर्हता तिथि, सबूत का भार, बहिष्करण त्रुटि।
सामान्य भूल: निर्वाचक नामावली के प्रावधानों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का मान लेना; नामावलियाँ 1950 के अधिनियम के तहत हैं, चुनाव कराना 1951 के अधिनियम के तहत।
परीक्षा सुझाव: प्ररूप 6 नया मतदाता, प्ररूप 7 आपत्ति या नाम हटाना, प्ररूप 8 निवास बदलना या सुधार।
साक्षात्कार का कोण: नामावली के पुनरीक्षण में पात्रता साबित करने का भार मतदाता पर होना चाहिए या राज्य पर?
प्रश्न 5 / 10
1. अधिनियम के तहत डेटा फ़िड्युसरी वह व्यक्ति है जिससे वैयक्तिक डेटा संबंधित है।
2. अधिनियम की अनुसूची में सबसे ऊँची अर्थदंड सीमा वैयक्तिक डेटा की सुरक्षा के लिए सुरक्षा उपाय न करने पर है।
3. अधिनियम शर्तों के अधीन, अनुसंधान, अभिलेखन या सांख्यिकीय प्रयोजनों के लिए वैयक्तिक डेटा के प्रसंस्करण को छूट देता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
तथ्य: कथन 1 गलत है: जिस व्यक्ति से वैयक्तिक डेटा संबंधित है, वह डेटा प्रिंसिपल है; डेटा फ़िड्युसरी वह है जो उसके प्रसंस्करण का प्रयोजन और साधन तय करता है।
कथन 2 सही है: अनुसूची में सबसे ऊँची सीमा, ₹250 करोड़ तक, सुरक्षा उपाय न करने पर है (धारा 8(5)), जबकि भंग की सूचना न देने पर ₹200 करोड़ तक (धारा 8(6))।
कथन 3 सही है: धारा 17(2)(b) शर्तों के साथ अनुसंधान, अभिलेखन या सांख्यिकीय प्रयोजनों के लिए प्रसंस्करण को छूट देती है।
विश्लेषण: सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन और पत्रकार युक्ता मुद्गल की उस याचिका पर नोटिस जारी किया है जिसमें अधिनियम और उसकी नियमावली के प्रावधानों को चुनौती दी गई है, इनमें RTI संशोधन वाली धारा 44(3) भी है; किसी पर रोक नहीं लगी है। द हिंदू का संपादकीय ‘Open to investigation’ (जाँच के लिए खुला) तर्क देता है कि इस क़ानून से प्रेस पर भयकारी प्रभाव (chilling effect) का ख़तरा है। ध्यान रहे कि DNPA के सदस्यों में द हिंदू और द इंडियन एक्सप्रेस भी हैं।
अवधारणा नोट
डिजिटल वैयक्तिक डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (2023 का अधिनियम संख्यांक 22, दिनांक 11 अगस्त 2023) डिजिटल वैयक्तिक डेटा पर भारत का क़ानून है। इसकी दो मुख्य भूमिकाएँ हैं: डेटा प्रिंसिपल, यानी वह व्यक्ति जिससे डेटा संबंधित है, और डेटा फ़िड्युसरी, जो प्रसंस्करण का प्रयोजन और साधन तय करता है। धारा 18 भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड की स्थापना करती है, और अनुसूची अर्थदंड की सीमाएँ तय करती है: वैयक्तिक डेटा सुरक्षित न रखने पर ₹250 करोड़ तक (धारा 8(5)) और भंग की सूचना न देने पर ₹200 करोड़ तक (धारा 8(6))। धारा 17(2)(b) शर्तों के अधीन अनुसंधान, अभिलेखन और सांख्यिकीय प्रसंस्करण को छूट देती है। धारा 44(3) सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1) के खंड (j) की जगह ‘ऐसी सूचना जो वैयक्तिक सूचना से संबंधित है’ रखती है, और पहले का व्यापक लोकहित वाला परीक्षण हटा देती है। DPDP नियमावली, 2025 नवंबर 2025 में अधिसूचित हुई, जिसमें अनुपालन के लिए 18 महीने की चरणबद्ध समय-सीमा है। संवैधानिक ढाँचे में दो अधिकार आमने-सामने हैं: अनुच्छेद 21 के हिस्से के रूप में संरक्षित निजता (के.एस. पुट्टस्वामी, 2017, नौ न्यायाधीश), और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 में मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19 और 21), पारदर्शिता और सूचना का अधिकार, मीडिया की भूमिका; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 4 में शासन में ईमानदारी।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: भयकारी प्रभाव (chilling effect), लोकहित परीक्षण, आनुपातिकता, डेटा संरक्षण।
सामान्य भूल: डेटा प्रिंसिपल (व्यक्ति) और डेटा फ़िड्युसरी (प्रयोजन और साधन तय करने वाली इकाई) को आपस में बदल देना।
परीक्षा सुझाव: सबसे ऊँचा अर्थदंड (₹250 करोड़) कमज़ोर सुरक्षा उपायों के लिए है, किसी प्रकाशन के लिए नहीं।
साक्षात्कार का कोण: क्या डेटा संरक्षण क़ानून में पत्रकारिता के लिए विशिष्ट छूट होनी चाहिए, और पत्रकारिता किसे माना जाए, यह कौन तय करे?
प्रश्न 6 / 10
1. औषध (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के तहत जारी किया गया है।
2. राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की स्थापना संसद के अधिनियम के तहत हुई थी।
3. औषध (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 का पैरा 20 असाधारण परिस्थितियों में लोकहित में हस्तक्षेप की अनुमति देता है।
4. राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची की दवाएँ औषध (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 के तहत 'अनुसूचित फ़ॉर्मूलेशन' हैं और उन पर अधिकतम मूल्य सीमा लागू होती है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: DPCO, 2013 आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के तहत जारी किया गया है।
कथन 2 गलत है: NPPA की स्थापना 29 अगस्त 1997 के भारत सरकार के संकल्प से रसायन और उर्वरक मंत्रालय के औषध विभाग के संबद्ध कार्यालय के रूप में हुई थी; यह किसी अधिनियम से बना सांविधिक निकाय नहीं है।
कथन 3 गलत है: असाधारण परिस्थितियों में लोकहित वाली शक्ति पैरा 19 में है; पैरा 20 गैर-अनुसूचित दवाओं के MRP में सालाना बढ़ोतरी को सीमित करता है।
कथन 4 सही है: DPCO, 2013 की पहली अनुसूची NLEM से ली गई है, इसलिए उसकी दवाएँ ‘अनुसूचित फ़ॉर्मूलेशन’ हैं और NPPA उनकी अधिकतम मूल्य सीमा तय करता है।
विश्लेषण: NPPA की संशोधित MRP की 28 अक्टूबर की पहली सूची में GST को छोड़कर MRP के 30% की सीमा के तहत कैंसर-रोधी 543 ब्रांड हैं, और निर्माताओं के मूल्य जमा करने के साथ इसे अद्यतन किया जाना है। द इंडियन एक्सप्रेस में अपने लेख में वाई के गुप्ता का सवाल है कि क्या मरीज़ों के बिल सचमुच घटेंगे; इसका जवाब अकेली मूल्य सूची नहीं दे सकती।
अवधारणा नोट
भारत दवाओं के मूल्य एक वस्तु-क़ानून के तहत बने आदेश से नियंत्रित करता है। औषध (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के तहत जारी हुआ है, और NPPA को शक्तियाँ उसी अधिनियम की धारा 3 और 5 के तहत 30 मई 2013 के S.O. 1349(E) से प्रत्यायोजित की गईं। ख़ुद NPPA कार्यकारी संकल्प (29 अगस्त 1997) से औषध विभाग के संबद्ध कार्यालय के रूप में बना; यह मूल्य तय और संशोधित करता है, अनुपालन और उपलब्धता पर नज़र रखता है, और नीति पर सलाह देता है। राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची की दवाएँ ‘अनुसूचित’ हैं और उन पर अधिकतम मूल्य सीमा लागू है; बाक़ी सभी ‘गैर-अनुसूचित’ हैं, और उनके MRP में केवल सालाना बढ़ोतरी सीमित है (पैरा 20)। पैरा 19 असाधारण परिस्थितियों के लिए अपवाद है: NPPA ने इसका इस्तेमाल 106 मधुमेह-रोधी और हृदय रोग की दवाओं, कोरोनरी स्टेंट और घुटना प्रत्यारोपण के लिए किया है। फ़रवरी 2019 में इसने 42 गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं पर व्यापार मार्जिन की सीमा तय की, जिससे 526 ब्रांडों के MRP 90% तक घटे। अक्टूबर 2026 का आदेश (S.O. 5690(E)) 137 गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं पर व्यापार मार्जिन, यानी स्टॉकिस्ट को दिए गए मूल्य और GST को छोड़कर MRP के बीच के अंतर, की सीमा 30% तय करता है। उपभोक्ता संशोधित मूल्य फार्मा सही दाम ऐप पर देख सकते हैं।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 में स्वास्थ्य और सस्ती दवाओं तक पहुँच; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 में औषध उद्योग और मूल्य विनियमन।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: व्यापार मार्जिन का युक्तिकरण, जेब से होने वाला ख़र्च, अधिकतम मूल्य सीमा, प्रवर्तन।
सामान्य भूल: NPPA को सांविधिक निकाय कहना; इसकी स्थापना सरकारी संकल्प से हुई, जबकि DPCO आवश्यक वस्तु अधिनियम पर आधारित है।
परीक्षा सुझाव: पैरा 19 आपात शक्ति है; पैरा 20 गैर-अनुसूचित दवाओं के MRP में सालाना बढ़ोतरी की सीमा तय करता है।
साक्षात्कार का कोण: क्या व्यापार मार्जिन की सीमा से दवाओं की किल्लत या ब्रांड बंद होने का ख़तरा है, और नियामक को इस पर कैसे नज़र रखनी चाहिए?
प्रश्न 7 / 10
1. पार्टी की राष्ट्रीय कांग्रेस हर पाँच वर्ष में एक बार होती है।
2. पोलित ब्यूरो, उसकी स्थायी समिति और महासचिव का निर्वाचन केंद्रीय समिति के पूर्ण अधिवेशन में होता है।
3. जब केंद्रीय समिति का पूर्ण अधिवेशन न चल रहा हो, तब पोलित ब्यूरो पहले किसी केंद्रीय समिति सदस्य के निष्कासन का निर्णय ले सकता है, जो अगले पूर्ण अधिवेशन की पुष्टि के अधीन होगा।
4. केंद्रीय सैन्य आयोग के सदस्यों का निर्णय केंद्रीय समिति करती है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: राष्ट्रीय कांग्रेस हर पाँच वर्ष में एक बार होती है और उसे केंद्रीय समिति बुलाती है (2022 में संशोधित पार्टी संविधान का अनुच्छेद 19)।
कथन 2 सही है: पोलित ब्यूरो, उसकी स्थायी समिति और महासचिव का निर्वाचन केंद्रीय समिति के पूर्ण अधिवेशन में होता है (अनुच्छेद 23), सीधे कांग्रेस द्वारा नहीं।
कथन 3 सही है: अनुच्छेद 42 के तहत किसी केंद्रीय समिति सदस्य को हटाने, परिवीक्षा पर रखने या निष्कासित करने के लिए पूर्ण अधिवेशन में दो-तिहाई मत चाहिए, लेकिन अधिवेशन न चल रहा हो तो पोलित ब्यूरो पहले निर्णय ले सकता है, जो अधिवेशन की पुष्टि के अधीन होगा; गंभीर आपराधिक उल्लंघन पर निष्कासन का निर्णय पोलित ब्यूरो ख़ुद करता है।
कथन 4 सही है: केंद्रीय सैन्य आयोग के सदस्यों का निर्णय केंद्रीय समिति करती है, और CMC सशस्त्र बलों में पार्टी और राजनीतिक कार्य के लिए ज़िम्मेदार है।
विश्लेषण: 20वीं केंद्रीय समिति के पाँचवें पूर्ण अधिवेशन ने उन 33 लोगों के निष्कासन की पुष्टि की जिनका फ़ैसला पोलित ब्यूरो पहले ही कर चुका था; द इंडियन एक्सप्रेस के एक संपादकीय का तर्क था कि यह अधिवेशन ध्यान को भीतर की ओर, शुद्धीकरण और अनुशासन पर ले जाता है।
अवधारणा नोट
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अंगों के एक पदानुक्रम के ज़रिए काम करती है। राष्ट्रीय कांग्रेस हर पाँच वर्ष में एक बार बैठती है; उसके द्वारा चुनी गई केंद्रीय समिति का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है और उसके पूर्ण अधिवेशन (प्लेनम) होते हैं, जिन्हें पोलित ब्यूरो साल में कम से कम एक बार बुलाता है। दो अधिवेशनों के बीच केंद्रीय समिति की शक्तियों का प्रयोग पोलित ब्यूरो और उसकी स्थायी समिति करते हैं। केंद्रीय अनुशासन निरीक्षण आयोग (CCDI) पार्टी का अनुशासन निकाय है, जबकि केंद्रीय सैन्य आयोग (CMC) उसका सैन्य आयोग; दोनों को अक्सर एक समझ लिया जाता है। 20वीं केंद्रीय समिति का पाँचवाँ पूर्ण अधिवेशन 26 से 29 अक्टूबर 2026 तक बीजिंग में हुआ, जिसमें 162 सदस्य और 117 वैकल्पिक सदस्य शामिल हुए। इसने पार्टी के पूर्ण और कठोर स्व-शासन पर डटे रहने का संकल्प पारित किया, झांग शेंगमिन को पोलित ब्यूरो में चुना, दस वैकल्पिक सदस्यों से केंद्रीय समिति की सीटें भरीं, 18 लोगों पर CCDI की और 16 पर CMC की रिपोर्टें स्वीकार कीं, और 33 निष्कासनों की पुष्टि की (अक्टूबर 2025 के चौथे अधिवेशन ने 14 की पुष्टि की थी)। 21वीं राष्ट्रीय कांग्रेस 2027 की दूसरी छमाही में बीजिंग में होनी है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 में भारत और उसका पड़ोस, चीन की राजनीतिक व्यवस्था और भारत-चीन सीमा पर उसका असर।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: पार्टी-राज्य, अनुशासन निरीक्षण, नागरिक-सैन्य संबंध, सत्ता का केंद्रीकरण।
सामान्य भूल: CCDI (अनुशासन) को CMC (सेना) समझ लेना, या 20वीं केंद्रीय समिति के पाँचवें पूर्ण अधिवेशन को 21वीं पार्टी कांग्रेस समझ लेना।
परीक्षा सुझाव: पूर्ण अधिवेशन उन निष्कासनों की पुष्टि करता है जिनका फ़ैसला पोलित ब्यूरो पहले कर चुका है; वह उनकी शुरुआत नहीं करता।
साक्षात्कार का कोण: पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में हो रहे शुद्धीकरण से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन का रुख़ ज़्यादा अनुमान-योग्य होता है या कम?
प्रश्न 8 / 10
कथन-I: भारत के राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य 2030 तक प्रति वर्ष कम से कम 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMTPA) हरित हाइड्रोजन का उत्पादन है।
कथन-II: भारतीय कंपनियों द्वारा किए गए हरित हाइड्रोजन ऑफ़टेक समझौते भारत में पहले से उत्पादित हरित हाइड्रोजन की मात्रा को मापते हैं।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही है?
तथ्य: कथन-I सही है: नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के अनुसार 2029-30 तक ₹19,744 करोड़ के आरंभिक परिव्यय के साथ स्वीकृत राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य 2030 तक कम से कम 5 MMTPA हरित हाइड्रोजन का उत्पादन है।
कथन-II गलत है: ऑफ़टेक समझौता भविष्य की आपूर्ति ख़रीदने की हस्ताक्षरित प्रतिबद्धता है, उत्पादित हाइड्रोजन नहीं; ख़ुद MNRE का कहना है कि इन समझौतों को पूरा करने के लिए कुल ₹90,000 करोड़ से अधिक के पूंजी निवेश की ज़रूरत होगी।
विश्लेषण: MNRE के मुताबिक़ पक्की और हस्ताक्षरित ऑफ़टेक प्रतिबद्धताएँ कुल 5,55,610 MTPA हैं, यानी मिशन के लक्ष्य का लगभग 11%, और मंत्रालय इन्हें दुनिया में सबसे बड़ी बताता है; 2023 से हुए 23 अनुबंधों में से 70% से अधिक निर्यात के लिए तय हैं। प्रतिबद्धता और उत्पादन के बीच का फ़र्क़ ही परीक्षा का जाल है।
अवधारणा नोट
हरित हाइड्रोजन वह हाइड्रोजन है जो नवीकरणीय ऊर्जा से बनाई जाती है। 2023 में शुरू हुए भारत के राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन ने 2029-30 तक ₹19,744 करोड़ के आरंभिक परिव्यय के साथ 2030 तक कम से कम 5 MMTPA उत्पादन का लक्ष्य रखा है। किसी भी नए ईंधन में सबसे मुश्किल हिस्सा माँग है: उत्पादकों को निवेश से पहले पक्के ख़रीदार चाहिए। ऑफ़टेक समझौते यही देते हैं। MNRE के मुताबिक़ अक्टूबर 2026 तक भारतीय कंपनियाँ कुल 5,55,610 MTPA की ऑफ़टेक प्रतिबद्धताओं पर हस्ताक्षर कर चुकी थीं, यानी मिशन के लक्ष्य का लगभग 11%; इनमें अकेले 2026 में 4 लाख MTPA से अधिक के 18 नए समझौते हुए। 2023 से 23 ऑफ़टेक अनुबंध हुए हैं, जिनमें से 70% से अधिक निर्यात के लिए हैं, और इन परियोजनाओं से लगभग ₹90,000 करोड़ (लगभग USD 9.5 बिलियन) का निवेश आने की उम्मीद है। ये आँकड़े मंत्रालय के हैं और ख़रीद की प्रतिबद्धताएँ बताते हैं, चालू संयंत्र या बना हुआ हाइड्रोजन नहीं। ऊर्जा संक्रमण पर उत्तर लिखते समय तीन चरणों का फ़र्क़ काम आता है: लक्ष्य (मिशन), प्रतिबद्धता (ऑफ़टेक) और वास्तविक उत्पादन, जो अब भी निवेश होने पर निर्भर है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 में ऊर्जा, अवसंरचना और पर्यावरण (कार्बन उत्सर्जन में कमी); सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 में सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: ऑफ़टेक समझौता, ऊर्जा संक्रमण, निर्यात-उन्मुखता, कठिन-से-कम-होने वाले (hard-to-abate) क्षेत्र।
सामान्य भूल: ऑफ़टेक प्रतिबद्धताओं को स्थापित या उत्पादित क्षमता मान लेना।
परीक्षा सुझाव: NGHM: 2030 तक कम से कम 5 MMTPA; 2029-30 तक ₹19,744 करोड़ का आरंभिक परिव्यय; 2023 में शुरू।
साक्षात्कार का कोण: भारत का शुरुआती हरित हाइड्रोजन उत्पादन पहले निर्यात में जाए या घरेलू उद्योग को कार्बन-मुक्त करने में?
प्रश्न 9 / 10
1. यह हर पात्र भूमिधारक किसान परिवार को ₹2,000 की तीन समान किस्तों में सालाना ₹6,000 देती है।
2. राशि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण प्रणाली के ज़रिए आधार से जुड़े बैंक खातों में भेजी जाती है।
3. योजना 2019 में शुरू की गई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: PIB के अनुसार PM-KISAN हर पात्र भूमिधारक किसान परिवार को सालाना ₹6,000 देती है, जो ‘उनके आधार से जुड़े बैंक खातों में ₹2,000 की तीन समान किस्तों में वितरित’ किए जाते हैं।
कथन 2 सही है: राशि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) प्रणाली से जाती है, और लाभ तब मिलता है जब किसान के भू-अभिलेख PM-KISAN पोर्टल पर दर्ज हों, बैंक खाता आधार से जुड़ा हो और e-KYC पूरा हो।
कथन 3 सही है: योजना 24 फ़रवरी 2019 को शुरू की गई थी।
विश्लेषण: PIB के मुताबिक़ 24वीं किस्त, यानी 9.34 करोड़ से अधिक किसानों को लगभग ₹18,690 करोड़, गुजरात के बनासकांठा में जारी की गई। लुभाने वाला भ्रामक विकल्प यह मान लेना है कि योजना सभी ग्रामीण परिवारों के लिए है; यह भूमिधारक किसान परिवारों के लिए है, इसीलिए भू-अभिलेखों का दर्ज होना तय करता है कि कौन इसके दायरे में है।
अवधारणा नोट
PM-KISAN किसानों को सीधे दी जाने वाली आय सहायता है, कोई मूल्य या इनपुट सब्सिडी नहीं। 24 फ़रवरी 2019 को शुरू हुई यह योजना हर पात्र भूमिधारक किसान परिवार को सालाना ₹6,000 देती है, जो ₹2,000 की तीन समान किस्तों में DBT के ज़रिए आधार से जुड़े बैंक खातों में जमा होते हैं। पात्रता रिकॉर्ड से तय होती है: किसान के भू-अभिलेख PM-KISAN पोर्टल पर दर्ज होने चाहिए, बैंक खाता आधार से जुड़ा होना चाहिए और e-KYC पूरा होना चाहिए। PIB के मुताबिक़ 24 किस्तों में ₹4.64 लाख करोड़ से अधिक बाँटे जा चुके हैं; केंद्रीय बजट 2026-27 में योजना को ₹60,000 करोड़ आवंटित हुए, और जुलाई 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹3.15 लाख करोड़ के कुल परिव्यय के साथ 2026-27 से 2030-31 तक इसे जारी रखने को मंज़ूरी दी। उन्नत एग्री वेलफ़ेयर पोर्टल PM-KISAN, एग्रीस्टैक और PMFBY को एक ही खिड़की पर ले आता है। मुख्य परीक्षा के लिए यह योजना DBT से बिचौलियों को हटाने का मानक उदाहरण है, और ज़मीन पर आधारित लक्ष्यीकरण की सीमाओं का भी, क्योंकि दायरा इस पर निर्भर है कि रिकॉर्ड में ज़मीन किसके नाम है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कृषि सब्सिडी और कृषि आय; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 में कल्याण योजनाएँ और ई-गवर्नेंस (DBT)।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, आय सहायता, भू-अभिलेख, लक्ष्यीकरण।
सामान्य भूल: PM-KISAN को सभी ग्रामीण परिवारों की योजना मान लेना; यह पात्र भूमिधारक किसान परिवारों के लिए है।
परीक्षा सुझाव: सालाना ₹6,000, ₹2,000 की तीन किस्तें, 24 फ़रवरी 2019 को शुरू, भुगतान DBT से।
साक्षात्कार का कोण: क्या आय सहायता उन बटाईदार किसानों तक पहुँचनी चाहिए जिनके नाम रिकॉर्ड में ज़मीन नहीं है, और यह कैसे हो सकता है?
प्रश्न 10 / 10
चर्चित स्थान : स्थित है
1. बनासकांठा : गुजरात
2. गजपति : आंध्र प्रदेश
3. डॉ. बी.आर. आंबेडकर कोनसीमा : ओडिशा
4. सेबू : इंडोनेशिया
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
तथ्य: युग्म 1 सही सुमेलित है: बनासकांठा गुजरात में है, जहाँ PM-KISAN की 24वीं किस्त जारी की गई।
युग्म 2 सही सुमेलित नहीं है: गजपति ओडिशा का ज़िला है, जहाँ चक्रवात अर्णब से हुई बारिश ने गंजाम, गजपति और कंधमाल ज़िलों को प्रभावित किया।
युग्म 3 सही सुमेलित नहीं है: डॉ. बी.आर. आंबेडकर कोनसीमा आंध्र प्रदेश का ज़िला है, जहाँ पश्चिम गोदावरी के साथ एक केंद्रीय दल को चक्रवात से हुए नुक़सान का आकलन करना था।
युग्म 4 सही सुमेलित नहीं है: सेबू फ़िलीपींस में है, जहाँ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 13वीं ADMM-प्लस बैठक को संबोधित किया।
विश्लेषण: चक्रवात अर्णब ने आंध्र प्रदेश और यानम के तट पार किए, और उसकी बारिश ने ओडिशा के गंजाम, गजपति और कंधमाल ज़िलों को प्रभावित किया; यानी पूर्वी तट पर उसका नुक़सान दो राज्यों में फैला। आंध्र प्रदेश-ओडिशा सीमा के दोनों ओर के ज़िलों को सही जगह रखना मानचित्र का पुराना जाल है।
अवधारणा नोट
प्रारंभिक परीक्षा में मानचित्र के प्रश्न अक्सर ख़बरों में आए स्थानों को लेकर जाँचते हैं कि अभ्यर्थी उन्हें सही जगह रख पाते हैं या नहीं। बनासकांठा गुजरात का ज़िला है। भारत के पूर्वी तट पर चक्रवात अर्णब ने आंध्र प्रदेश और यानम के तट पार किए और फिर कमज़ोर होकर गंभीर चक्रवाती तूफ़ान बन गया। आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री के मुताबिक़ एक केंद्रीय दल डॉ. बी.आर. आंबेडकर कोनसीमा और पश्चिम गोदावरी ज़िलों का दौरा करेगा; उनके प्रारंभिक अनुमान में राज्य का नुक़सान ₹4,600 करोड़ है। ओडिशा में गंजाम, गजपति और कंधमाल ज़िलों में भारी बारिश हुई; भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 29 अक्टूबर को सुबह 8.30 बजे तक के 24 घंटों में गंजाम के पात्रपुर में 546 mm वर्षा दर्ज की, और गंजाम व गजपति के 22 ब्लॉकों के 200 से अधिक गाँव बुरी तरह प्रभावित हुए। यानम, जहाँ से भी चक्रवात ने तट पार किया, आंध्र प्रदेश के तट पर स्थित होने के बावजूद पुदुचेरी केंद्रशासित प्रदेश का हिस्सा है। 13वीं ADMM-प्लस बैठक का स्थल सेबू फ़िलीपींस में है, जो आसियान का सदस्य और दक्षिण चीन सागर का तटवर्ती देश है।
🎯 अवधारणा किट खोलने के लिए टैप करें
प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 में भारत का भौतिक और राजनीतिक भूगोल, पूर्वी तट के चक्रवात; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 में आपदा प्रबंधन; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 में आसियान-भारत संबंध।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: पूर्वी तट के चक्रवात, ज़िला-स्तरीय क्षति आकलन, अंतरराज्यीय प्रभाव।
सामान्य भूल: गजपति को आंध्र प्रदेश से सटा होने के कारण आंध्र प्रदेश में रख देना; गजपति और गंजाम ओडिशा के ज़िले हैं।
परीक्षा सुझाव: आंध्र प्रदेश-ओडिशा के तटीय ज़िलों को यानम (पुदुचेरी) के साथ ख़ाली मानचित्र पर चिह्नित करें।
साक्षात्कार का कोण: क्या चक्रवात राहत की योजना राज्य की सीमाओं के बजाय नदी घाटियों और तटरेखाओं के आधार पर बननी चाहिए?