उद्धरण-योग्य पंक्ति
“यही SIR की मूल संरचनागत खामी है, क्योंकि यह नामांकन का दायित्व शासन से हटाकर निर्वाचक पर डाल देता है, उन पर भी जो पहले मतदान कर चुके हैं, और पते के मामूली बदलाव को भी नाम हटाने का आधार मान लेता है।” (संपादकीय, द हिंदू, 30 अक्टूबर 2026)
यह संपादकीय आपकी परीक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है
चर्चा में: 28 अक्टूबर 2026 की सुनवाई में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची भी थे, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से सवाल किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में दिल्ली की मसौदा नामावली से हटाए गए लोगों से नए मतदाताओं वाले फ़ॉर्म 6 पर आवेदन क्यों कराया जा रहा है। न्यायालय ने कहा कि वह मामले को दो सप्ताह बाद लेगा। द हिंदू का संपादकीय “Deemed ineligible” (अयोग्य मान लिए गए) इस सुनवाई के सहारे तर्क देता है कि खोट केवल SIR के अमल में नहीं, उसकी संरचना में ही है।
इस पृष्ठ पर केवल नई बातें हैं: 28 अक्टूबर की सुनवाई और संपादकीय का तर्क। पृष्ठभूमि के लिए इस साइट के पहले के लेख देखें:
- 15 अक्टूबर का राउंडअप (अंग्रेज़ी): याचिकाकर्ताओं का आवेदन और फ़ॉर्म 6 पर विवाद क्यों है।
- 13 अक्टूबर का राउंडअप (अंग्रेज़ी): न्यायालय की यह टिप्पणी कि मई के उसके निर्णय ने बदले हुए फ़ॉर्म 6 को स्वीकृति नहीं दी थी।
- 4 अक्टूबर का राउंडअप (अंग्रेज़ी): फ़ॉर्म 6, 7 और 8 की व्याख्या।
- Flawed by design (अंग्रेज़ी) (9 अक्टूबर): SIR की संरचना और नाम हटाने की दरें।
- The Special Summary Revision (अंग्रेज़ी) (17 अक्टूबर): सामान्य पुनरीक्षण SIR से कैसे अलग है।
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचक नामावली; संवैधानिक निकाय और उनकी शक्तियाँ (निर्वाचन आयोग, अनुच्छेद 324); सर्वोच्च न्यायालय और मतदान का अधिकार। निबंध और साक्षात्कार: मतदान का अधिकार, समावेशन और संस्थाओं की विश्वसनीयता।
60 शब्दों में सार
कोई विद्यमान मतदाता गणना प्रपत्र नहीं भर पाया, तो SIR उसका नाम हटा देता है और लौटने का एक ही रास्ता देता है: फ़ॉर्म 6, जो नए मतदाताओं का है। द हिंदू इसे पुनरीक्षण की मूल खामी मानता है: नामांकन का बोझ शासन से नागरिक पर आ जाता है और पता बदलना नाम कटने की वजह बन जाता है। अख़बार प्रबंधकीय लीपापोती नहीं, ग़लत ढंग से हटाए गए मतदाताओं की बहाली चाहता है।
द हिंदू का तर्क है कि SIR की मूल संरचनागत खामी यह है कि वह नामांकन का दायित्व शासन से हटाकर निर्वाचक पर डाल देता है; इसीलिए गणना प्रपत्र न लौटाने पर हटाए गए विद्यमान मतदाताओं से फ़ॉर्म 6 पर ऐसे दोबारा आवेदन कराया जाता है मानो वे नए मतदाता हों, और ग़लत ढंग से हटाए गए मतदाताओं को बहाल किया जाना चाहिए।
- दिल्ली SIR पर 28 अक्टूबर 2026 की सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई में पीठ ने पूछा कि 2026 की नामावली में दर्ज व्यक्तियों को फ़ॉर्म 6 क्यों भरना पड़े, जो न्यायालय के अनुसार पहली बार के मतदाताओं के लिए है, जबकि उन्हें विलंबित गणना प्रपत्र या फ़ॉर्म 8 का रास्ता दिया जा सकता था।
- जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने पूछा कि क्या किसी मतदाता का जवाब न देना मतदान का अधिकार हमेशा के लिए छीन लेने का आधार हो सकता है; द हिंदू पीठ की टिप्पणी को इस रूप में पढ़ता है कि फ़ॉर्म 6 वाला रास्ता एक ‘त्रुटि’ है।
- कर्नाटक में 27 अक्टूबर 2026 की अंतिम नामावली से पहले गणना के चरण में लगभग 84 लाख प्रविष्टियाँ स्थानांतरित और अनुपस्थित श्रेणियों में गई थीं, जबकि दावों के चरण में शुद्ध वृद्धि लगभग 8.2 लाख की ही रही; ये आँकड़े मुख्य निर्वाचन अधिकारी के आँकड़ों के हवाले से रिपोर्ट हुए हैं।
- संपादकीय के अनुसार मसौदा नामावली से हटाए गए नामों में ‘स्थानांतरित’ या ‘अनुपस्थित’ दर्ज नामों का अंश बिहार के 55 प्रतिशत से बढ़कर चरण 3 में 72 प्रतिशत हो गया, और तार्किक विसंगति की जाँचें (परिवार का आकार, माता-पिता से आयु का अंतर) किसी अधिनियम या नियम पर आधारित नहीं हैं।
पुनरीक्षण का उद्देश्य ही नामावली की सफ़ाई है: कर्नाटक की गणना में लगभग 16.4 लाख मृत और 7.1 लाख दोहरी या कहीं और दर्ज प्रविष्टियाँ भी मिलीं; निर्वाचन आयोग कह चुका है कि वह एक अलग फ़ॉर्म और लंबी समय-सीमा पर विचार करेगा; और अनुच्छेद 324 नामावली तैयार करने का नियंत्रण आयोग में निहित करता है, न्यायालय में नहीं।
SIR में मिली मृत और दोहरी प्रविष्टियाँ हटाई जाएँ, नए पात्र निर्वाचक जोड़े जाएँ, ग़लत ढंग से हटाए गए मतदाताओं को ऐसे रास्ते से बहाल किया जाए जिसमें उनसे यह घोषणा न कराई जाए कि वे कभी नामांकित नहीं थे (विलंबित गणना प्रपत्र, फ़ॉर्म 8 या कोई अवशिष्ट श्रेणी), और SIR के संचालन तथा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति की पद्धति से जुड़े बड़े प्रश्नों का निपटारा हो।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
मामला। LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार 28 अक्टूबर की सुनवाई दिल्ली SIR पर अंजलि भारद्वाज और अमृता जौहरी की रिट याचिका में दायर एक आवेदन पर थी। LawChakra के अनुसार 14 अक्टूबर को पीठ ने सुनवाई 30 अक्टूबर से पहले कर दी थी, क्योंकि वकीलों ने ध्यान दिलाया कि 30 अक्टूबर ही हटाए गए नामों में सुधार की अंतिम तिथि भी है।
न्यायालय में रखे गए आँकड़े। LiveLaw के अनुसार ECI से सवाल करते हुए पीठ ने दिल्ली की नामावली 1.45 करोड़ मतदाताओं की बताई, जिनमें से 97 लाख ने गणना में जवाब दिया और 47 लाख ने नहीं। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि “हटाए गए 47 लाख मतदाताओं में से 43 लाख को स्थायी रूप से स्थानांतरित या अनुपस्थित दिखाया गया है”; 43 लाख का आँकड़ा याचिकाकर्ताओं का है। जैसा हमारे पिछले राउंडअप में बताया गया था, आवेदन में अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरी श्रेणी में बाहर किए गए निर्वाचकों की संख्या 47,56,722 बताई गई थी, जो SIR से पहले की नामावली का 32.78 प्रतिशत है।
ECI का आधार। LiveLaw के अनुसार जब पूछा गया कि मतदाता के नाम का मतलब 2003 की सूची का नाम है या नवीनतम नामावली का, तो ECI के वकील नायडू ने उत्तर दिया: “SIR से पहले की नवीनतम सूची को आधार माना जाएगा (2026)”। इस उत्तर से न्यायालय का सवाल और धारदार हो जाता है: जो व्यक्ति 2026 की नामावली में था, वह किसी भी अर्थ में पहली बार का मतदाता नहीं है।
विश्लेषण
1. फ़ॉर्म 6 की समस्या। LiveLaw के अनुसार “न्यायालय ने ध्यान दिलाया कि फ़ॉर्म 6 पहली बार के मतदाताओं के लिए है, जिसमें आवेदकों को घोषणा करनी होती है कि उन्होंने पहले मतदान नहीं किया है”। सामान्य फ़ॉर्म 6 में यह घोषणा होती है: “मैं पहली बार निर्वाचक नामावली में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर रहा/रही हूँ”। जस्टिस बागची ने कठिनाई एक पंक्ति में रख दी: “आप उस व्यक्ति से फ़ॉर्म 6 भरने को कहते हैं, यह घोषणा करते हुए कि मेरा नाम सूची में कभी था ही नहीं। यह एक त्रुटि है।” द हिंदू पीठ की बात को इस रूप में पढ़ता है कि ऐसे मतदाताओं को नए मतदाता की तरह दोबारा आवेदन के लिए मजबूर करना ECI की “त्रुटि” थी। स्थिति पर ध्यान दें: यह सुनवाई के दौरान ECI के वकील से पूछा गया सवाल था, कोई निष्कर्ष या आदेश नहीं। दाँव केवल प्रक्रिया का नहीं है। जैसा याचिकाकर्ताओं ने अपने आवेदन में तर्क दिया (हमारा पिछला राउंडअप देखें), पहले से नामांकित जो मतदाता पहली बार वाली घोषणा पर हस्ताक्षर करता है, वह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के दायरे में आ सकता है, जो मिथ्या घोषणा को “कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से” दंडनीय बनाती है।
2. चूक का मतलब अधिकार खोना नहीं। LiveLaw के अनुसार जस्टिस बागची ने पूछा: “मतदान का अधिकार एक महत्वपूर्ण अधिकार है। आपने अपना काम पूरी सावधानी से किया। मान लीजिए मतदाता से चूक हुई। उसने जवाब नहीं दिया, तो क्या यह उस अधिकार को हमेशा के लिए छीन लेने का आधार होगा?” संपादकीय अपना पूरा तर्क इसी सवाल पर खड़ा करता है। उसके अनुसार SIR “नामांकन का दायित्व शासन से हटाकर निर्वाचक पर डाल देता है, उन पर भी जो पहले मतदान कर चुके हैं, और पते के मामूली बदलाव को भी नाम हटाने का आधार मान लेता है”। शासन इन निर्वाचकों को पहले से जानता था; पुनरीक्षण ने उनसे फिर से ख़ुद को साबित करने को कहा, और एक छूटा हुआ प्रपत्र सूची से ग़ायब नाम बन गया।
3. पीठ के सुझाए विकल्प। LiveLaw के अनुसार न्यायालय ने पूछा कि ऐसे लोगों को फ़ॉर्म 6 के बजाय गणना प्रपत्र भरने या (पते में बदलाव दिखाने के लिए) फ़ॉर्म 8 दाख़िल करने का अवसर क्यों नहीं दिया जा सकता। पीठ ने अस्थायी रूप से कहीं और गए लोगों के लिए एक “अवशिष्ट श्रेणी” का सुझाव भी दिया। जस्टिस बागची ने कहा कि फ़ॉर्म 6, 7 और 8 “पत्थर की लकीर” हैं और बदले नहीं जा सकते, हालाँकि SIR में ECI के पास घोषणाएँ माँगकर उनमें जोड़ने की अवशिष्ट शक्ति है। मुख्य न्यायाधीश ने प्रस्ताव रखा कि हटाए गए लोगों की सूची प्रकाशित की जाए और उनसे कहा जाए कि वे फ़ॉर्म 8 भरने के लिए निकटतम बूथ स्तरीय अधिकारी से संपर्क करें: “बताइए कि फ़ॉर्म 6 और 8 अब भी स्वीकार किए जा रहे हैं। लोगों को समझाते रहिए।” उन्होंने यह सुझाव भी दिया कि ECI जल्दबाज़ी न करे, क्योंकि दिल्ली में निकट भविष्य में चुनाव नहीं होने हैं। ये सुझाव थे, निर्देश नहीं।
4. ECI का जवाब। LiveLaw के अनुसार ECI के वकील ने कहा कि अधिकारी इन मुद्दों की जाँच करेंगे और सुधारात्मक कदम उठाएँगे, और ECI समय-सीमा बढ़ाने पर विचार करेगा। उन्होंने कहा कि ECI इन श्रेणियों के लिए एक ऐसा फ़ॉर्म देने को तैयार है “जिसे ‘फ़ॉर्म 6’ नहीं कहा जाएगा”, कि अवशिष्ट श्रेणी के सुझाव पर विचार होगा, और ECI पीठ के सुझावों पर चर्चा करेगा। मामले पर दो सप्ताह बाद विचार होगा।
5. कर्नाटक का साक्ष्य। संदर्भ के लिए, संपादकीय का दूसरा उदाहरण कर्नाटक है, जिसकी अंतिम नामावली 27 अक्टूबर को प्रकाशित हुई। मुख्य निर्वाचन अधिकारी की प्रेस वार्ता की रिपोर्ट (The News Minute) के अनुसार SIR से पहले नामावली में दर्ज लगभग 5.54 करोड़ निर्वाचकों में से 1,07,96,339 की गणना नहीं हुई: 65,45,679 को स्थायी रूप से स्थानांतरित, 19,00,926 को अनुपस्थित, 16,39,864 को मृत और 7,09,870 को कहीं और पहले से नामांकित या दोहरी प्रविष्टि की श्रेणी में रखा गया। स्थानांतरित और अनुपस्थित प्रविष्टियाँ मिलाकर लगभग 84 लाख होती हैं, जो संपादकीय का आँकड़ा है। दावों के चरण में 10,08,038 नाम जुड़े और 1,88,324 हटे, यानी नए निर्वाचकों समेत शुद्ध वृद्धि लगभग 8.2 लाख की रही। संपादकीय यह भी कहता है कि अंतिम नामावली “अनुमानित वयस्क जनसंख्या से 64.5 लाख कम” है; यह अनुमान अख़बार की अपनी गणना है, और दूसरे अनुमान अलग हैं।
6. अख़बार को दिखती प्रवृत्ति। संपादकीय के अनुसार मसौदा नामावली से हटाए गए नामों में “स्थानांतरित” या “अनुपस्थित” दर्ज नामों का अंश बिहार के 55 प्रतिशत से बढ़कर चरण 3 के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 72 प्रतिशत हो गया। यह आँकड़ा द हिंदू का है। उसकी व्याख्या यह है कि पते का बदलना नामावली से बाहर होने का मुख्य रास्ता बन गया है, जबकि उसके अनुसार 2002-03 के गहन पुनरीक्षण में इसका उल्टा हुआ था: “गणनाकारों ने स्थानांतरित मतदाताओं को उनके नए घरों पर नामांकित किया और मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने पुरानी प्रविष्टियों का मिलान किया”।
7. तार्किक विसंगति और बिहार का निर्णय। संपादकीय के अनुसार जस्टिस बागची ने उल्लेख किया कि बिहार का निर्णय “बाध्यकारी पूर्व-निर्णय” नहीं था, और “तार्किक विसंगति” की जाँचों की वैधता, जिन्हें पश्चिम बंगाल में केवल “अंतरिम व्यवस्था” के रूप में अनुमति मिली थी, पर अंतिम न्यायिक निर्णय नहीं हुआ है। LawChakra की सुनवाई-रिपोर्ट में उनका कथन यह है कि बिहार के आदेश SIR के हर प्रश्न पर अंतिम निर्णय नहीं थे और तार्किक विसंगति की प्रक्रिया की वैधता का प्रश्न अभी खुला है। संपादकीय अपनी ओर से इससे आगे जाता है: “कोई भी अधिनियम या नियम परिवार के आकार या मतदाता और माता-पिता के बीच आयु के अंतर के आधार पर मतदाता की पात्रता परखने का प्रावधान नहीं करता”, और इन दोनों जाँचों को वह “एल्गोरिदम-आधारित” कहता है। वह जोड़ता है कि पश्चिम बंगाल में इन जाँचों से “बड़े पैमाने पर मताधिकार छिना” और द हिंदू के विश्लेषण में पाया गया कि दिल्ली में मुसलमानों को अनुपात से कहीं अधिक चिह्नित किया गया। ये दोनों दावे अख़बार के हैं।
8. अख़बार की माँग। “समय-सीमा बढ़ाने या ब्लॉकों में छपी सूचियाँ लगाने जैसे प्रबंधकीय उपाय” नहीं, बल्कि नामावली का ही सुधार: SIR में मिली मृत और दोहरी प्रविष्टियाँ हटाई जाएँ, नए पात्र निर्वाचक जोड़े जाएँ, और मसौदा नामावली से ग़लत ढंग से हटाए गए मतदाताओं को फिर शामिल किया जाए। संपादकीय कहता है, “SIR की अंतिम नामावलियाँ त्रुटिपूर्ण हैं, क्योंकि नाम केवल ECI की चूकों से नहीं, एक दोषपूर्ण संरचना से हटे”, और वह चाहता है कि आयोग द्वारा SIR के संचालन तथा उसके सदस्यों की नियुक्ति की पद्धति से जुड़े बड़े प्रश्नों का निपटारा हो।
आँकड़े और संस्थाएँ
प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य:
संवैधानिक और विधिक ढाँचा:
- अनुच्छेद 326: वयस्क मताधिकार; अर्हता तिथि पर कम से कम 18 वर्ष का नागरिक, जो अयोग्य न हो, मतदाता के रूप में रजिस्ट्रीकृत होने का हकदार है।
- अनुच्छेद 324(1): निर्वाचक नामावली तैयार कराने का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित है।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950, धारा 21(1): नामावली अर्हता तिथि के प्रति निर्देश से तैयार होती है; धारा 21(3): ECI “ऐसी रीति से जो वह ठीक समझे” विशेष पुनरीक्षण का निदेश दे सकता है।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950, धारा 13B: नामावली निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी तैयार और पुनरीक्षित करता है।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950, धारा 31: मिथ्या घोषणा; एक वर्ष तक का कारावास, या जुर्माना, या दोनों।
- अर्हता तिथियाँ: 1 अगस्त 2022 से साल में चार: 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई, 1 अक्टूबर।
फ़ॉर्म (निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960):
- फ़ॉर्म 6: नए मतदाताओं का आवेदन (नियम 13(1) और 26); इसमें नाम “पहली बार” शामिल कराने की घोषणा होती है।
- फ़ॉर्म 7: किसी नाम के प्रस्तावित समावेश पर आपत्ति या नाम हटाना (नियम 13(2) और 26)।
- फ़ॉर्म 8: निवास बदलना, प्रविष्टियों का सुधार, मतदाता फ़ोटो पहचान पत्र (EPIC) का प्रतिस्थापन, दिव्यांगजन (PwD) के रूप में चिह्नांकन (नियम 13(3) और 26)।
सुनवाई, 28 अक्टूबर 2026 (दिल्ली SIR):
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता में, जस्टिस जॉयमाल्य बागची सहित।
- याचिकाकर्ता: अंजलि भारद्वाज और अमृता जौहरी।
- परिणाम: कोई आदेश नहीं; केवल प्रश्न और सुझाव; मामला दो सप्ताह बाद।
- “विद्यमान मतदाता” के लिए ECI का आधार: SIR से पहले की नवीनतम नामावली (2026), 2003 की सूची नहीं।
कर्नाटक की अंतिम नामावली (27 अक्टूबर 2026, मुख्य निर्वाचन अधिकारी के आँकड़ों के हवाले से):
- गणना नहीं हुई: लगभग 5.54 करोड़ में से 1,07,96,339।
- श्रेणियाँ: स्थायी रूप से स्थानांतरित 65,45,679; अनुपस्थित 19,00,926; मृत 16,39,864; कहीं और नामांकित या दोहरी प्रविष्टि 7,09,870।
- दावों का चरण: 10,08,038 नाम जुड़े, 1,88,324 हटे (शुद्ध वृद्धि लगभग 8.2 लाख)।
⚠️ संभावित भ्रामक बिंदु: फ़ॉर्म 6 नए मतदाताओं के लिए है; फ़ॉर्म 8 निवास-परिवर्तन और सुधार के लिए; फ़ॉर्म 7 आपत्तियों और नाम हटाने के लिए। 28 अक्टूबर को न्यायालय ने प्रश्न पूछे और सुझाव दिए; कोई आदेश नहीं दिया। विशेष पुनरीक्षण का निदेश देने की शक्ति निर्वाचक नामावली से जुड़े लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) में है। “55 प्रतिशत से 72 प्रतिशत” और “64.5 लाख कम” संपादकीय के आँकड़े हैं, ECI के नहीं।
वाद-विवाद
फ़ॉर्म 6 वाले रास्ते के विरुद्ध पक्ष (संपादकीय की दलील)। 2026 की नामावली में दर्ज निर्वाचकों को शासन पहले से जानता था। एक छूटे प्रपत्र पर उनका नाम काटना और फिर उनसे यह घोषणा कराना कि वे पहली बार आवेदन कर रहे हैं, पुनरीक्षण की क़ीमत नागरिक पर डालता है और एक ईमानदार मतदाता को मिथ्या घोषणा के अपराध के जोखिम में डालता है। कर्नाटक का हिसाब बताता है कि हटाए गए लोगों में से कम ही वापस लौट पाए। संपादकीय की दृष्टि में जो संरचना पते के बदलाव को नाम कटने में बदल दे, वह उसी मताधिकार के विरुद्ध काम करती है जिसके विस्तार के लिए आयोग बना है।
पुनरीक्षण के पक्ष में। नामावली पूरी ही नहीं, साफ़ भी होनी चाहिए। कर्नाटक की इसी प्रक्रिया में मृत और दोहरी प्रविष्टियाँ भी मिलीं, जिन्हें हटाने की बात ख़ुद संपादकीय करता है। अनुच्छेद 324 नामावली का नियंत्रण आयोग को देता है, और धारा 21(3) उसे “ऐसी रीति से जो वह ठीक समझे” विशेष पुनरीक्षण चलाने की छूट देती है। ECI अपनी बात पर अड़ा भी नहीं रहा: उसने कहा कि वह एक अलग फ़ॉर्म, जिसे फ़ॉर्म 6 नहीं कहा जाएगा, एक अवशिष्ट श्रेणी और लंबी समय-सीमा पर विचार करेगा। और सुनवाई में कोई निष्कर्ष नहीं निकला; पीठ ने जो कहा वे प्रश्न थे।
संतुलित निष्कर्ष। सीमित बिंदु मज़बूत लगता है: 2026 की नामावली में दर्ज व्यक्ति को उसमें लौटने के लिए पहली बार वाली घोषणा पर हस्ताक्षर नहीं करने पड़ने चाहिए, और पीठ के प्रश्न भी इसी ओर इशारा करते हैं। बड़े दावे (55 से 72 प्रतिशत की प्रवृत्ति, अनुमानित कमी, तार्किक विसंगति के नतीजे) संपादकीय के हैं और आधिकारिक आँकड़ों या किसी न्यायिक निर्णय की प्रतीक्षा में हैं। दो सप्ताह बाद की अगली सुनवाई बताएगी कि ECI का प्रस्तावित फ़ॉर्म और अवशिष्ट श्रेणी न्यायालय की चिंता दूर करते हैं या नहीं।
इस विषय पर कैसे सोचें
नामावली, कल्याण-सूचियों या पहचान-जाँच के किसी भी प्रश्न पर “बोझ किस पर है” की कसौटी लगाएँ:
- डिफ़ॉल्ट स्थिति: क्या व्यक्ति को भीतर माना गया है (अपात्रता शासन को सिद्ध करनी है) या बाहर (पात्रता व्यक्ति को सिद्ध करनी है)? छूटा हुआ प्रपत्र अपात्रता का प्रमाण नहीं है।
- वापसी का रास्ता: क्या उपाय आनुपातिक है? लौटने वाले मतदाता को ऐसी घोषणा नहीं करनी पड़नी चाहिए जो उसके मामले में असत्य हो।
- शक्ति का स्रोत: क्या हर जाँच अधिनियम या नियमों (धारा 21, 1960 के नियम) में है, या केवल किसी प्रशासनिक मैनुअल या एल्गोरिदम में?
- नुक़सान बनाम उपचार: हटाए गए नामों की तुलना दावों के चरण में बहाल हुए नामों से करें।
- स्थिति: न्यायालय ने क्या पूछा और क्या आदेश दिया, तथा कौन से आँकड़े संपादकीय के हैं और कौन से आयोग के, इन्हें अलग रखें।
आरेख में समझें
गणना प्रपत्र नहीं लौटाया → मसौदा नामावली से नाम स्थानांतरित या अनुपस्थित मानकर हटा → लौटने का एकमात्र रास्ता: फ़ॉर्म 6, पहली बार वाली घोषणा के साथ → पीठ पूछती है कि विलंबित गणना प्रपत्र या फ़ॉर्म 8 क्यों नहीं → ECI अलग फ़ॉर्म, अवशिष्ट श्रेणी और लंबी समय-सीमा पर विचार करेगा; सुनवाई दो सप्ताह बाद।
इस कड़ी को बाएँ से दाएँ पढ़ें: संपादकीय की आपत्ति तीसरे चरण पर है, जहाँ एक विद्यमान मतदाता को नया मतदाता मान लिया जाता है।
निर्वाचक नामावली के पुनरीक्षण को अपात्र नामों को बाहर रखना होता है, पर पात्र नागरिकों का रास्ता बंद किए बिना। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के आलोक में चर्चा कीजिए कि नामांकन का दायित्व किस पर होना चाहिए, और गणना के दौरान हटाए गए मतदाताओं के लिए सुरक्षा उपाय सुझाइए। (250 शब्द)
अनुच्छेद 326 के अनुसार अर्हता तिथि पर 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का हर नागरिक, जो अयोग्य न हो, मतदाता के रूप में रजिस्ट्रीकृत होने का हकदार है, और अनुच्छेद 324(1) निर्वाचक नामावली तैयार कराने का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित करता है। इसलिए किसी भी पुनरीक्षण के दो दायित्व एक साथ होते हैं: अपात्र को हटाना और हर पात्र निर्वाचक को नामावली में बनाए रखना। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ने इसी संतुलन की परीक्षा ली है।
दायित्व का प्रश्न। गणना-आधारित पुनरीक्षण में जो निर्वाचक प्रपत्र नहीं लौटाता, उसका नाम स्थानांतरित या अनुपस्थित मानकर हटाया जा सकता है। दिल्ली SIR पर 28 अक्टूबर 2026 की सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई में पीठ ने पूछा कि 2026 की नामावली में पहले से दर्ज ऐसे व्यक्तियों से फ़ॉर्म 6 क्यों भरवाया गया, जो न्यायालय के अनुसार पहली बार के मतदाताओं के लिए है, और उन्हें विलंबित गणना प्रपत्र या निवास-परिवर्तन वाला फ़ॉर्म 8 क्यों नहीं दिया गया। फ़ॉर्म 6 में यह घोषणा होती है कि ‘मैं पहली बार निर्वाचक नामावली में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर रहा/रही हूँ’, और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 मिथ्या घोषणा पर एक वर्ष तक के कारावास, या जुर्माने, या दोनों का दंड देती है। पैमाना। कर्नाटक में गणना के चरण में लगभग 84 लाख प्रविष्टियाँ स्थानांतरित और अनुपस्थित श्रेणियों में डाली गईं, जबकि दावों के चरण में शुद्ध वृद्धि लगभग 8.2 लाख की रही; ये आँकड़े मुख्य निर्वाचन अधिकारी के आँकड़ों के हवाले से रिपोर्ट हुए हैं। दूसरा पक्ष। इसी प्रक्रिया में लगभग 16.4 लाख मृत और 7.1 लाख दोहरी प्रविष्टियाँ भी मिलीं; नामावली की शुद्धता भी एक संवैधानिक मूल्य है, और आयोग ने न्यायालय से कहा कि वह एक अलग फ़ॉर्म, एक अवशिष्ट श्रेणी और लंबी समय-सीमा पर विचार करेगा। विधिक आधार। धारा 21(3) विशेष पुनरीक्षण ‘ऐसी रीति से जो वह ठीक समझे’ कराने की अनुमति देती है, लेकिन निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के अंतर्गत निर्धारित प्रपत्रों को मनमाने ढंग से नहीं मोड़ा जा सकता; जस्टिस बागची ने फ़ॉर्म 6, 7 और 8 को पत्थर की लकीर बताया, जिनमें आयोग के पास केवल घोषणाएँ माँगने की अवशिष्ट शक्ति है।
नाम अपात्रता के प्रमाण पर हटे, किसी छूटे हुए प्रपत्र पर नहीं। ग़लत ढंग से हटाए गए निर्वाचकों को ऐसे रास्ते से बहाल करना जो उन्हें किसी अपराध में न फँसाए, हटाए गए नामों की सूचियाँ बूथ-स्तर पर संपर्क के साथ प्रकाशित करना, और एल्गोरिदम से लगाए गए चिह्नों को अधिनियम की कसौटी पर परखना: इन उपायों से नामावली साफ़ भी रहेगी और समावेशी भी, जो सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की भावना के अनुरूप है।
साक्षात्कार का कोण
"पिछले वर्ष की नामावली में दर्ज एक मतदाता ने गणना प्रपत्र नहीं लौटाया और उसका नाम 'स्थानांतरित' मानकर हटा दिया गया। निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के रूप में आप नामावली की शुद्धता को कमज़ोर किए बिना एक पात्र निर्वाचक का नाम कैसे बहाल करेंगे?"
मुख्य निष्कर्ष
- उद्धरण-योग्य पंक्ति: “यही SIR की मूल संरचनागत खामी है, क्योंकि यह नामांकन का दायित्व शासन से हटाकर निर्वाचक पर डाल देता है।”
- मूल विचार: गणना के समय की चूक मताधिकार के छिनने में नहीं बदलनी चाहिए; ग़लत ढंग से हटाए गए लोगों को ऐसे रास्ते से बहाल करें जिसमें उनसे यह न कहलवाया जाए कि वे कभी नामांकित नहीं थे।
- प्रारंभिक परीक्षा के सूत्र: अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार, 18 वर्ष); अनुच्छेद 324(1) (नामावली ECI के अधीन); लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धाराएँ 13B, 21(3) और 31; फ़ॉर्म 6 (नए मतदाता), फ़ॉर्म 7 (आपत्ति, नाम हटाना), फ़ॉर्म 8 (निवास-परिवर्तन, सुधार); चार अर्हता तिथियाँ।
- नीतिशास्त्र और साक्षात्कार का कोण: प्रशासनिक सुविधा बनाम नागरिक अधिकार: जिस अधिकारी पर दायित्व है, उसे कोई नागरिक सूची से नदारद मिले तो नाम काटने से पहले उसे खोजना चाहिए।
- संभावित प्रश्न: “निर्वाचक नामावली की शुद्धता और समावेशिता में अंतर स्पष्ट कीजिए। विशेष पुनरीक्षण को इन दोनों के बीच संतुलन कैसे साधना चाहिए?” (सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2, 150 शब्द)
स्रोत:
- “Deemed ineligible: On the Supreme Court and SIR”, संपादकीय, The Hindu, 30 अक्टूबर 2026
- LiveLaw, दिल्ली SIR पर सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई की रिपोर्ट, 28 अक्टूबर 2026; LawChakra, उसी सुनवाई की रिपोर्ट, 28 अक्टूबर 2026
- The News Minute, अंतिम नामावली पर कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की प्रेस वार्ता की रिपोर्ट, 27 अक्टूबर 2026
- Constitution of India, अनुच्छेद 324 और 326; Representation of the People Act, 1950, धाराएँ 13B, 21 और 31; Registration of Electors Rules, 1960 के अंतर्गत Forms 6, 7 और 8 (ECI); चार अर्हता तिथियों पर CEO Delhi की प्रेस विज्ञप्ति, 1 अगस्त 2022
- टिप्पणी: उद्धरण-चिह्नों में दिए गए विधिक और आधिकारिक अंश अंग्रेज़ी पाठ के हिंदी अनुवाद हैं।