उद्धरण-योग्य पंक्ति

“हितधारकों को एक ऐसे परस्पर स्वीकार्य ढाँचे पर सहमति बनानी चाहिए, जिसमें लोक पदाधिकारी और सार्वजनिक धन संभालने वाले लोग निजता की आड़ में जाँच-पड़ताल से सुरक्षित न रहें।” (संपादकीय, द हिंदू, 30 अक्टूबर 2026)

यह संपादकीय आपकी परीक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है

चर्चा में: सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2026 को डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) और पत्रकार युक्ता मुद्गल की रिट याचिका पर नोटिस जारी किया। याचिका में डिजिटल वैयक्तिक डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 और उसकी नियमावली के प्रावधानों को चुनौती दी गई है। नोटिस और स्थगन का आवेदन, दोनों पर 17 नवंबर को सुनवाई होगी। किसी भी प्रावधान पर रोक नहीं लगाई गई है। द हिंदू का संपादकीय “Open to investigation” (जाँच के लिए खुला) तर्क देता है कि यह क़ानून प्रेस पर भयकारी प्रभाव (चिलिंग इफ़ेक्ट) डाल सकता है।

पाठकों के लिए एक स्पष्टीकरण: DNPA 21 मीडिया प्रकाशकों का प्रतिनिधित्व करता है, और उसके सदस्यों में द हिंदू और द इंडियन एक्सप्रेस भी हैं। यही दो अख़बार हैं जिनके संपादकीयों का अध्ययन यह साइट करती है। इसलिए इस संपादकीय को मामले में हित रखने वाले एक पक्ष की राय के रूप में पढ़ें।

यह पृष्ठ संपादकीय के तर्क को समझाता है और यह भी बताता है कि धारा 44(3) से पहले और बाद में क़ानून क्या कहता है। पृष्ठभूमि के लिए इस साइट के पिछले लेख:

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2: मूल अधिकार (अनुच्छेद 19 और 21); पारदर्शिता और जवाबदेही, सूचना का अधिकार; सांविधिक निकाय (भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड); मीडिया की भूमिका। सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 4: शासन में ईमानदारी, सूचना का अधिकार। निबंध: निजता और जनता का जानने का अधिकार।

60 शब्दों में सार

DPDP अधिनियम पत्रकारिता को अपनी अलग छूट नहीं देता, जबकि शोध और सांख्यिकी को ऐसी छूट हासिल है। साथ ही इसने RTI अधिनियम के वैयक्तिक सूचना वाले प्रावधान को संकुचित कर दिया है। द हिंदू को डर है कि रिपोर्टरों को उन्हीं लोगों से सहमति लेनी पड़ सकती है जिनकी वे पड़ताल कर रहे हैं, और संपत्ति व निविदा रिकॉर्ड उनकी पहुँच से बाहर हो सकते हैं। संपादकीय संतुलन की न्यायालय की बात का स्वागत करता है और ऐसी सहमति माँगता है जिसमें अधिकारी जाँच के दायरे में रहें।

मुख्य तर्क: एक दृष्टि में

द हिंदू का तर्क है कि DPDP अधिनियम पत्रकारिता को कोई विशिष्ट छूट नहीं देता और RTI अधिनियम के वैयक्तिक सूचना वाले प्रावधान को संकुचित कर देता है। इससे मीडिया पर गंभीर भयकारी प्रभाव पड़ने का ख़तरा है। इसलिए सभी हितधारकों को ऐसी सहमति बनानी चाहिए जिसमें लोक पदाधिकारी और सार्वजनिक धन संभालने वाले लोग निजता की आड़ लेकर जाँच-पड़ताल से बच न सकें।

समर्थन में
  • पत्रकारिता के लिए छूट न होने पर कदाचार की पड़ताल करने वाले रिपोर्टर पर डेटा फ़िड्युसरी के दायित्व आ सकते हैं, जिनमें सूचना देना और सहमति लेना शामिल है। ये दायित्व उन्हीं लोगों के प्रति होंगे जो जाँच के घेरे में हैं।
  • अधिनियम की धारा 17(2)(b) शोध, अभिलेखन और सांख्यिकीय प्रयोजनों के लिए किए जाने वाले प्रसंस्करण को पहले से छूट देती है। संपादकीय के अनुसार इसके बाद पत्रकारों को वैसी ही छूट न देना उचित ठहराना कठिन है।
  • धारा 44(3) RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) के स्थान पर ‘वैयक्तिक सूचना से संबंधित सूचना’ रखती है और पहले वाला लोकहित का अपवाद हटा देती है। भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग अक्सर संपत्ति की घोषणाओं और निविदा दस्तावेज़ों पर टिकी होती है।
  • संपादकीय के अनुसार अधिनियम में जुर्माने की ऊँची अधिकतम सीमाएँ छोटे और स्वतंत्र न्यूज़रूम के अस्तित्व के लिए ही ख़तरा हैं।
प्रतिवाद

निजता अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मूल अधिकार है (पुट्टस्वामी, 2017)। ख़बरें अब स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटरों और सोशल मीडिया की ओर जा रही हैं, ऐसे में ख़ुद को पत्रकार कहने वाले हर व्यक्ति को व्यापक छूट देना एक चोर-दरवाज़ा बन सकता है। केंद्रीय मंत्री कह चुके हैं कि ये प्रावधान प्रेस की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करते।

आगे की राह

लोकहित में की जाने वाली पत्रकारिता के लिए सीमित, प्रयोजन-आधारित छूट दी जाए। लोक पदाधिकारियों और सार्वजनिक धन से जुड़ी सूचना के लिए लोकहित का अपवाद हो। साथ ही बातचीत से एक ढाँचा बने, और 17 नवंबर 2026 को मामला दोबारा आने पर न्यायालय संतुलन को परखे।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

याचिका। LiveLaw ने DNPA को “21 प्रमुख समाचार संगठनों की डिजिटल शाखा” और युक्ता मुद्गल को “नई दिल्ली की एक स्वतंत्र खोजी पत्रकार” बताया है। इन्हीं ने अनुच्छेद 32 के तहत यह याचिका दायर की। इसमें DPDP अधिनियम की धाराओं 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37 और 44(3) तथा DPDP नियमावली, 2025 के नियम 16, 17 और 23 को चुनौती दी गई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस पर सुनवाई की। DNPA की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान पेश हुईं। ThePrint के अनुसार न्यायालय ने सरकार का पक्ष सुने बिना अधिनियम पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

न्यायालय तक पहुँचने से पहले (पृष्ठभूमि)। याचिका के अनुसार DNPA ने 10 अगस्त 2026 को दो मंत्रालयों, सूचना एवं प्रसारण तथा इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी, को एक विस्तृत अभ्यावेदन भेजा था। इसके बाद 25 अगस्त 2026 को एक बैठक हुई, जो मामले की पृष्ठभूमि का हिस्सा है। दीवान ने पीठ को यह भी बताया कि RTI संशोधन को चुनौती देने वाली दूसरी याचिकाएँ भी लंबित हैं। LiveLaw लिखता है कि फ़रवरी में न्यायालय ने उन याचिकाओं को तीन न्यायाधीशों की पीठ के पास भेज दिया था।

क़ानून की कालरेखा (पृष्ठभूमि)। अधिनियम 11 अगस्त 2023 को बना। DPDP नियमावली, 2025 नवंबर 2025 में अधिसूचित हुई (PIB, 13 और 14 नवंबर), और PIB के शब्दों में इसके साथ “18 महीने की चरणबद्ध अनुपालन समय-सीमा” तय की गई। यानी इसके दायित्व अभी चरणों में लागू हो रहे हैं।

विश्लेषण

1. छूट जो है ही नहीं। संपादकीय की पहली चिंता यह है कि “पत्रकारिता गतिविधि के लिए विशिष्ट छूट” के बिना, सरकारी कदाचार या भ्रष्टाचार की पड़ताल करने वाले रिपोर्टरों पर “डेटा फ़िड्युसरी” के दायित्व आ सकते हैं, “जिसके तहत उन्हें उन्हीं व्यक्तियों को सूचित करना होगा और उनसे सहमति लेनी होगी जिनकी वे जाँच कर रहे हैं”। याचिका भी यही कहती है: उसके अनुसार सूचना, सहमति और डेटा मिटाने के दायित्व “प्रेस के सामान्य कामकाज से असंगत” हैं। अदालत में दीवान ने बात दो टूक रखी: “इससे न्यूज़रूम बंद हो जाएगा। अगर मुझे अनुमति और सहमति माँगनी पड़े तो फिर मतलब ही क्या रह जाता है?” संपादकीय यह भी जोड़ता है कि रोज़ की ख़बर जुटाने का काम भी इससे प्रभावित होगा, क्योंकि वैयक्तिक सूचना रिपोर्टिंग का अभिन्न अंग है।

2. कुछ को छूट, कुछ को नहीं। अधिनियम कुछ तरह के प्रसंस्करण को छूट देता भी है। धारा 17(2)(b) उस प्रसंस्करण पर लागू होती है जो “शोध, अभिलेखन या सांख्यिकीय प्रयोजनों के लिए आवश्यक है, बशर्ते वैयक्तिक डेटा का उपयोग किसी डेटा प्रिंसिपल से विशिष्ट रूप से जुड़ा कोई निर्णय लेने के लिए न किया जाए और ऐसा प्रसंस्करण विहित मानकों के अनुसार किया जाए”। संपादकीय के अनुसार इसके चलते “पत्रकारों को वैसा ही संरक्षण न देना उचित ठहराना कठिन है”। याचिका भी इसी आधार पर धारा 17(2) को मनमाना बताती है। शोध वाली छूट की शर्तों पर ध्यान दीजिए: व्यक्ति के बारे में कोई निर्णय नहीं, और विहित मानकों का पालन। पत्रकारिता के लिए कोई भी छूट आए, उसके सामने यह प्रश्न होगा कि उस पर कौन-सी शर्तें लगें।

3. एक संरक्षण जो छोड़ दिया गया। संपादकीय कहता है कि “2018, 2019 और 2021 के मसौदों में पत्रकारिता के लिए छूट थी”। LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार याचिका कहती है कि वैयक्तिक डेटा संरक्षण विधेयक, 2018 की धारा 47 में ऐसी छूट थी, 2019 के विधेयक और डेटा संरक्षण विधेयक, 2021 में भी पत्रकारिता गतिविधियों को छूट मिली थी, और 2022 के मसौदे में “पत्रकारिता के लिए विशिष्ट छूट बरक़रार नहीं रखी गई”। मसौदों का यह ब्योरा याचिका और संपादकीय का है।

4. जुर्माने का ख़तरा। संपादकीय कहता है, “अनुपालन न करने पर ₹250 करोड़ तक का जुर्माना लग सकता है, जो छोटे और स्वतंत्र न्यूज़रूम के अस्तित्व के लिए ख़तरा है।” सटीक स्थिति यह है: अधिनियम की अनुसूची ₹250 करोड़ की अधिकतम सीमा उस स्थिति के लिए रखती है जब कोई डेटा फ़िड्युसरी वैयक्तिक डेटा उल्लंघन रोकने के लिए उचित सुरक्षा उपाय करने में विफल रहे (धारा 8(5))। उल्लंघन की सूचना न देने पर यह सीमा ₹200 करोड़ है (धारा 8(6))। यह सीमा सबसे गंभीर उल्लंघनों के लिए है, पत्रकारिता पर विशेष रूप से नहीं। फिर भी संपादकीय की बात यह है कि छोटा न्यूज़रूम इसका जोखिम तक नहीं उठा सकता।

5. RTI संशोधन। DPDP अधिनियम की धारा 44(3) RTI अधिनियम, 2005 की धारा 8(1) के खंड (j) के स्थान पर “वैयक्तिक सूचना से संबंधित सूचना” (information which relates to personal information) रखती है। पुराना खंड ऐसी वैयक्तिक सूचना को छूट देता था “जिसके प्रकटन का किसी लोक क्रियाकलाप या हित से कोई संबंध नहीं है, या जिससे व्यक्ति की निजता में अनावश्यक दख़ल होगा, जब तक कि, यथास्थिति, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी या अपील प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता कि ऐसी सूचना का प्रकटन बड़े लोकहित में उचित है”। नया पाठ “वैयक्तिक सूचना” के बाद का सब कुछ हटा देता है, जिसमें वह लोकहित की कसौटी भी शामिल है जिसे संपादकीय “पहले का लोकहित वाला परंतुक” कहता है। संपादकीय की पंक्ति है: “वैयक्तिक सूचना का संरक्षण निरपेक्ष नहीं होना चाहिए; प्रबल लोकहित प्रकटन का वैध आधार बना रहना चाहिए, ख़ासकर तब जब सूचना लोक प्राधिकरणों के पास हो।” संपादकीय यह भी ध्यान दिलाता है कि भ्रष्टाचार की जाँच “अक्सर वैयक्तिक डेटा वाले संपत्ति के ब्योरों और निविदा दस्तावेज़ों पर निर्भर करती है”, और इन्हें बंद कर देने से “पत्रकारिता के केवल सरकारी विज्ञप्तियाँ दोहराने तक सिमट जाने का ख़तरा है”।

6. याचिका के व्यापक आधार। संपादकीय के दो मुद्दों के अलावा याचिका यह भी तर्क देती है कि धारा 36, नियम 23 और नियमावली की सातवीं अनुसूची के साथ पढ़े जाने पर, “गोपनीय पत्रकारीय स्रोतों की पहचान करने और उन्हें निशाना बनाने” में इस्तेमाल हो सकती है; कि सूचना तक सार्वजनिक पहुँच सीमित करने की धारा 37(1) वाली शक्ति “अत्यधिक व्यापक” है; और कि डेटा संरक्षण बोर्ड के “अध्यक्ष और सदस्य कार्यपालिका द्वारा चुने जाते हैं, और क़ानून में किसी न्यायिक सदस्य को शामिल करने की अनिवार्यता नहीं है”। ये याचिका के दावे हैं, जिनकी अभी अदालत में परख नहीं हुई है।

7. पत्रकार कौन है? संपादकीय मानता है कि न्यायालय ने “प्रेस की स्वतंत्रता और निजता के अधिकार के बीच संतुलन की आवश्यकता पर उचित ही ज़ोर दिया”। मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं से कहा: “आप इस क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। आप ही सबसे अच्छी तरह केंद्र को और हमें सुझा सकते हैं कि दुरुपयोग न हो, यह आप कैसे सुनिश्चित करेंगे।” संपादकीय कठिन पक्ष भी स्वीकार करता है: “पारंपरिक मीडिया के प्रति बढ़ते अविश्वास और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटरों के उभार” के दौर में यह तय करना कठिन है कि संरक्षण किसे मिले, और उसके अनुसार केंद्र ने भी यही चिंता जताई है। संपादकीय रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की 2026 की एक रिपोर्ट का हवाला देता है, जिसके अनुसार सोशल मीडिया को ख़बरों का मुख्य स्रोत बताने वाले 18 से 24 वर्ष के युवाओं का अनुपात 2015 के 21 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 39 प्रतिशत हो गया (ये आँकड़े संपादकीय के हैं)।

8. केवल मुक़दमेबाज़ी नहीं, सहमति। संपादकीय कहता है, “इन परस्पर विरोधी चिंताओं का विशुद्ध विधिक निर्धारण शायद बहुत बोझिल साबित हो”, और सहमति से बने ढाँचे की माँग करता है। वह केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के इस संकेत का स्वागत करता है कि वे संपादकों से मिलेंगे। इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्री वैष्णव ने कैबिनेट ब्रीफ़िंग में, ThePrint की रिपोर्ट के अनुसार, कहा: “कृपया अपने संपादकों को बताइए कि मैं उन सबसे एक विधिवत तय बैठक में मिलना चाहूँगा।” उन्होंने यह भी कहा: “ये कहीं भी प्रेस, पत्रकारिता और मीडिया की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करते।” ऐसी किसी बैठक की तारीख़ अभी घोषित नहीं हुई है।

आँकड़े और संस्थाएँ

प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य:

संविधान और न्यायालय:

  • अनुच्छेद 19(1)(a): वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता; प्रेस की स्वतंत्रता इसी में निहित मानी जाती है।
  • अनुच्छेद 21: प्राण और दैहिक स्वतंत्रता; निजता इसके अभिन्न अंश के रूप में संरक्षित।
  • के.एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ: नौ न्यायाधीश; निर्णय 24 अगस्त 2017; निजता एक मूल अधिकार।
  • अनुच्छेद 32: इसी के माध्यम से DNPA की याचिका सर्वोच्च न्यायालय पहुँची।

DPDP अधिनियम, 2023:

  • 2023 का अधिनियम संख्यांक 22, दिनांक 11 अगस्त 2023।
  • डेटा प्रिंसिपल: वह व्यक्ति जिससे वैयक्तिक डेटा संबंधित है; डेटा फ़िड्युसरी: प्रसंस्करण का प्रयोजन और साधन तय करने वाला।
  • धारा 17(2)(b): शोध, अभिलेखन या सांख्यिकीय प्रयोजनों के लिए छूट, शर्तों के साथ।
  • धारा 18: भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड की स्थापना।
  • अर्थदंड की अधिकतम सीमाएँ (अनुसूची): ₹250 करोड़ तक (सुरक्षा उपाय, धारा 8(5)); ₹200 करोड़ (उल्लंघन की सूचना, धारा 8(6))।
  • धारा 44(3): RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) के स्थान पर “वैयक्तिक सूचना से संबंधित सूचना”।
  • DPDP नियमावली, 2025: नवंबर 2025 में अधिसूचित; 18 महीने का चरणबद्ध अनुपालन।

मामला:

  • याचिकाकर्ता: DNPA (21 मीडिया प्रकाशक) और पत्रकार युक्ता मुद्गल।
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना।
  • नोटिस: 27 अक्टूबर 2026; सुनवाई 17 नवंबर 2026 को; कोई स्थगन नहीं।
  • चुनौती: धाराएँ 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37 और 44(3); नियम 16, 17 और 23।

⚠️ संभावित भ्रामक बिंदु: न्यायालय ने नोटिस जारी किया है, कोई स्थगन या निर्णय नहीं दिया। जुर्माने की सबसे ऊँची सीमा वैयक्तिक डेटा को सुरक्षित न रख पाने के लिए है, पत्रकारिता पर लगने वाला जुर्माना नहीं। शोध वाली छूट धारा 17(2)(b) में है; RTI संशोधन DPDP अधिनियम की धारा 44(3) में है, जो RTI अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) को संशोधित करती है। निजता का आधार अनुच्छेद 21 है; प्रेस की स्वतंत्रता का अनुच्छेद 19(1)(a)।

वाद-विवाद

पत्रकारिता के लिए छूट और RTI की पुरानी कसौटी के पक्ष में (संपादकीय का मत)। सहमति और सूचना के दायित्व खोजी पत्रकारिता से मेल नहीं खाते: भ्रष्टाचार की ख़बर का पात्र उस ख़बर के लिए सहमति नहीं देगा। शोध और सांख्यिकी को छूट मिली है, ऐसे में उनके और लोकहित की रिपोर्टिंग के बीच की रेखा मनमानी लगती है। और जब धारा 8(1)(j) हर वैयक्तिक सूचना पर लागू हो जाए, तो कोई लोक प्राधिकरण उस लोकहित कसौटी के बिना ही संपत्ति या निविदा रिकॉर्ड देने से मना कर सकता है जो पुराने खंड में थी। (RTI अधिनियम की धारा 8(2), जो लोक प्राधिकरण को उस स्थिति में सूचना देने की अनुमति देती है जब प्रकटन का लोकहित संभावित नुकसान से भारी हो, DPDP अधिनियम से संशोधित नहीं हुई है।) इसमें ऊँची अधिकतम सीमा वाले जुर्माने जोड़ दें, तो सबसे ज़्यादा बोझ छोटे और स्वतंत्र न्यूज़रूम पर पड़ता है।

सावधानी के पक्ष में। पुट्टस्वामी के बाद निजता एक मूल अधिकार है, और ग़लत हाथों में पहुँचा वैयक्तिक डेटा असली लोगों को नुकसान पहुँचाता है। जब फ़ोन रखने वाला हर व्यक्ति कुछ भी प्रकाशित कर सकता है, तब “पत्रकारिता” के लिए व्यापक छूट की सीमा खींचना कठिन है। संपादकीय ख़ुद यह कठिनाई स्वीकार करता है, और मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि दुरुपयोग कैसे रोका जाएगा। केंद्रीय मंत्री का कहना है कि ये प्रावधान प्रेस की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करते। याचिकाकर्ता, जिनमें DNPA के सदस्य भी हैं, स्वयं भी इस मामले में हितबद्ध पक्ष हैं।

संतुलित निष्कर्ष। सबसे मज़बूत तर्क सीमित है: लोक अधिकारी सार्वजनिक शक्ति और सार्वजनिक धन का कैसे उपयोग करते हैं, इससे जुड़ी सूचना जाँच के लिए खुली रहनी चाहिए, और धारा 8(1)(j) की पुरानी लोकहित कसौटी ठीक यही अनुमति देती थी। पत्रकारिता के लिए अगर कोई छूट आती है, तो उस पर भी शोध वाली छूट की तरह शर्तें लगानी होंगी। न्यायालय 17 नवंबर को मामले की सुनवाई करेगा; मंत्री और संपादकों के बीच बैठक अभी तक केवल एक प्रस्ताव है।

इस विषय पर कैसे सोचें

निजता बनाम पारदर्शिता वाले प्रश्नों के लिए “तीन अधिकार, एक कसौटी” का दृष्टिकोण अपनाएँ:

  1. अधिकारों को पहचानें: निजता (अनुच्छेद 21), वाक् स्वतंत्रता और प्रेस (अनुच्छेद 19(1)(a)), और नागरिक का जानने का अधिकार (RTI अधिनियम)।
  2. पूछें कि सूचना किसकी है: किसी निजी व्यक्ति की, या सार्वजनिक भूमिका में किसी लोक पदाधिकारी की? पुरानी धारा 8(1)(j) इसी पर टिकी थी।
  3. पूछें कि किस प्रयोजन से: क्या प्रसंस्करण उस व्यक्ति के बारे में कोई निर्णय लेने के लिए है, या जनता को सूचित करने के लिए? शोध वाली छूट भी कुछ ऐसी ही रेखा खींचती है।
  4. आनुपातिकता परखें: क्या एक व्यापक नियम (हर वैयक्तिक सूचना रोकना, पत्रकारिता को कोई छूट नहीं) ज़रूरी है, या कोई सीमित नियम काफ़ी होगा?
  5. दावे और स्थिति को अलग रखें: नोटिस कोई निष्कर्ष नहीं है; मंत्री का प्रस्ताव बैठक नहीं है; याचिका के आधार तथ्य नहीं हैं।

आरेख में समझें

वैयक्तिक डेटा संरक्षित (अनुच्छेद 21, पुट्टस्वामी) → DPDP अधिनियम, 2023: डेटा फ़िड्युसरी पर दायित्व, शोध के लिए छूट पर पत्रकारिता के लिए कोई नहीं → धारा 44(3) RTI की धारा 8(1)(j) को “वैयक्तिक सूचना से संबंधित सूचना” तक संकुचित करती है → DNPA की याचिका; 27 अक्टूबर को नोटिस, 17 नवंबर को सुनवाई → संपादकीय ऐसी सहमति माँगता है जिसमें लोक पदाधिकारी जाँच के दायरे में रहें।

इसे बाएँ से दाएँ पढ़ें: संपादकीय की दोनों आपत्तियाँ दूसरे और तीसरे चरण पर हैं।

✍️मुख्य परीक्षा: उत्तर का ढाँचा
प्रश्न

डिजिटल वैयक्तिक डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 सूचनात्मक निजता की रक्षा करता है, किंतु आलोचकों का कहना है कि इससे खोजी पत्रकारिता हतोत्साहित होती है और सूचना का अधिकार कमज़ोर पड़ता है। विधि में निजता, प्रेस की स्वतंत्रता और पारदर्शिता के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जा सकता है, परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)

निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के अभिन्न अंश के रूप में संरक्षित है (के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ, 2017)। प्रेस की स्वतंत्रता को अनुच्छेद 19(1)(a) की वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में निहित माना जाता है। डिजिटल वैयक्तिक डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 सूचनात्मक निजता को लागू करता है। डिजिटल समाचार प्रकाशकों की एक रिट याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2026 को नोटिस जारी किया है। यह याचिका पूछती है कि कहीं यह संरक्षण प्रेस और पारदर्शिता की क़ीमत पर तो नहीं दिया जा रहा।

पत्रकारिता: अधिनियम धारा 17(2)(b) के तहत कुछ शर्तों के साथ शोध, अभिलेखन या सांख्यिकीय प्रयोजनों के प्रसंस्करण को छूट देता है, पर पत्रकारिता के लिए कोई विशिष्ट छूट नहीं देता। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सूचना, सहमति और डेटा मिटाने के दायित्व प्रेस के सामान्य कामकाज से मेल नहीं खाते, और पहले के मसौदों (2018, 2019, 2021) में ऐसी छूट मौजूद थी। RTI: धारा 44(3) RTI अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) के स्थान पर ‘वैयक्तिक सूचना से संबंधित सूचना’ रखती है। इससे वे शब्द हट जाते हैं जिनके आधार पर बड़े लोकहित में वैयक्तिक सूचना का प्रकटन उचित ठहराया जा सकता था। जवाबदेही के लिए अहम संपत्ति की घोषणाएँ और निविदा रिकॉर्ड अब रोके जा सकते हैं। संस्थाएँ: याचिका भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड के कार्यपालिका द्वारा चयन को, और धारा 36 के तहत केंद्र की सूचना माँगने की शक्ति को, गोपनीय स्रोतों के लिए जोखिम बताते हुए चुनौती देती है। दूसरा पक्ष: निजता भी मूल अधिकार है। व्यापक छूट दुरुपयोग को न्योता देती है, और जब पाठक सोशल मीडिया की ओर जा रहे हैं तब यह तय करना कठिन है कि पत्रकार कौन है। सबसे गंभीर उल्लंघनों पर, जैसे वैयक्तिक डेटा को सुरक्षित न रख पाने पर, जुर्माना ₹250 करोड़ तक हो सकता है।

समाधान निरपेक्ष नियमों में नहीं, आनुपातिकता में है: सुरक्षा उपायों के साथ पत्रकारिता के लिए प्रयोजन-आधारित छूट, लोक पदाधिकारियों और सार्वजनिक धन से जुड़ी सूचना के लिए लोकहित अपवाद की बहाली, और एक स्वतंत्र न्यायनिर्णायक। परामर्श से निकला और न्यायालय की कसौटी पर कसा गया समाधान व्यक्ति के डेटा और नागरिक के जानने के अधिकार, दोनों की रक्षा करेगा।

साक्षात्कार का कोण

"निविदा घोटाले की जाँच कर रही एक रिपोर्टर को उससे जुड़े अधिकारियों के नाम और उनकी संपत्ति का ब्योरा चाहिए। क्या डेटा संरक्षण क़ानून को उसे ऐसा डेटा फ़िड्युसरी मानना चाहिए, जिसे उन्हीं अधिकारियों से सहमति लेनी पड़े? आप रेखा कहाँ खींचेंगे?"

मुख्य निष्कर्ष

  • उद्धरण-योग्य पंक्ति: “लोक पदाधिकारी और सार्वजनिक धन संभालने वाले लोग निजता की आड़ में जाँच-पड़ताल से सुरक्षित न रहें।”
  • मूल विचार: निजता का क़ानून सार्वजनिक शक्ति की ढाल नहीं बनना चाहिए; सूचना तक पहुँचने का लोकहित वाला रास्ता खुला रहे और पत्रकारिता के लिए सावधानी से सीमित दायरा बने।
  • प्रारंभिक परीक्षा के सूत्र: DPDP, 2023 का अधिनियम संख्यांक 22 (11 अगस्त 2023); धारा 17(2)(b) शोध छूट; धारा 18 डेटा संरक्षण बोर्ड; धारा 44(3) RTI की धारा 8(1)(j) को संशोधित करती है; पुट्टस्वामी, 24 अगस्त 2017, अनुच्छेद 21।
  • नीतिशास्त्र और साक्षात्कार का कोण: अधिकारी की निजता बनाम जनता का जानने का अधिकार: ईमानदारी का तक़ाज़ा है कि जो कुछ कोई अधिकारी जनता की ओर से न्यास के रूप में रखता है, उसकी जाँच जनता कर सके।
  • संभावित प्रश्न: “DPDP अधिनियम, 2023 द्वारा RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) में किया गया संशोधन निजता को सुदृढ़ करता है या पारदर्शिता को कमज़ोर? चर्चा कीजिए।” (सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2, 150 शब्द)

स्रोत:

  • “Open to investigation: On the challenge to the Digital Personal Data Protection Act, 2023”, संपादकीय, द हिंदू, 30 अक्टूबर 2026
  • LiveLaw, DNPA याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई की रिपोर्ट, 27 अक्टूबर 2026; ThePrint, सुनवाई और केंद्रीय मंत्री की टिप्पणियों पर रिपोर्ट
  • Digital Personal Data Protection Act, 2023 (Gazette of India, Act No. 22 of 2023): धाराएँ 2, 8, 17, 18, 44 और अनुसूची
  • Right to Information Act, 2005, Section 8(1)(j), NITI Aayog RTI manual में उद्धृत रूप में
  • PIB: DPDP Rules, 2025 की अधिसूचना (14 नवंबर 2025); DPDP ढाँचे पर लोकसभा में उत्तर (3 दिसंबर 2025)
  • Supreme Court, K.S. Puttaswamy (Retd.) v. Union of India, W.P.(C) 494 of 2012, 24 अगस्त 2017; DNPA, “About us”
  • टिप्पणी: उद्धरण-चिह्नों में दिए गए विधिक और आधिकारिक अंश अंग्रेज़ी पाठ के हिंदी अनुवाद हैं।