🗞️ चर्चा में क्यों गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने डिजिटल अरेस्ट घोटालों पर अपने स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई की। पीठ ने भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) से कहा कि जहाँ धोखाधड़ी किसी बैंक की समुचित सावधानी (due diligence) में चूक का नतीजा हो, वहाँ वह वित्तीय संस्थाओं को पीड़ितों की क्षतिपूर्ति के लिए बाध्य करे, और यह क्षतिपूर्ति गँवाई गई रक़म से कम न हो। न्यायालय ने कहा कि वह RBI के प्रस्तावित अपने ग्राहक को जानिए (KYC) संशोधन निदेश, 2026 को उनके अधिसूचित होने से पहले जाँचेगा।
“डिजिटल अरेस्ट” एक घोटाले का नाम है, कोई अधिकार नहीं। जैसा कि The Indian Express लिखता है, “भारत में डिजिटल अरेस्ट का कोई विधिक प्रावधान नहीं है”। फ़ोन करने वाले ख़ुद को क़ानून प्रवर्तन एजेंसियों का अधिकारी बताते हैं और पीड़ितों को डराकर पैसे भेजने पर मजबूर करते हैं। 29 अक्टूबर को नया यह है कि सर्वोच्च न्यायालय अब सबसे ज़्यादा दबाव कहाँ डाल रहा है: उन बैंकों पर जिनके खातों से यह पैसा गुज़रता है, और उस नियामक पर जो इन बैंकों के नियम बनाता है।
मामला: In Re Victims of Digital Arrest
यह मामला 2025 की स्वतः संज्ञान रिट याचिका (आपराधिक) संख्या 3 है, “In Re: Victims of Digital Arrest Related to Forged Documents” (जाली दस्तावेज़ों से जुड़े डिजिटल अरेस्ट के पीड़ित)। यह उस रिट याचिका में हुई अंतरिम सुनवाइयों की कड़ी है जिसे न्यायालय ने ख़ुद शुरू किया था; अब तक कोई निर्णय नहीं सुनाया गया है।
| तिथि | पीठ | न्यायालय ने क्या किया |
|---|---|---|
| 17 अक्टूबर 2025 | न्यायमूर्ति सूर्यकांत और जॉयमाल्य बागची | 21 सितंबर 2025 की एक शिकायत पर स्वतः संज्ञान लिया। शिकायत “एक वरिष्ठ नागरिक दंपती” की थी, जिनसे 3 से 16 सितंबर 2025 के बीच उनकी जीवन भर की जमा-पूँजी ठग ली गई और जिन्हें “रु. 1,05,50,000 हस्तांतरित करने के लिए विवश किया गया” |
| 9 फ़रवरी 2026 | मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और एन.वी. अंजारिया | केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की वह न्यूनतम सीमा दर्ज की जिसके तहत वह ₹10 करोड़ या उससे अधिक के नुक़सान वाले मामले ही अपने हाथ में लेता है; अस्थायी डेबिट होल्ड पर RBI की मसौदा मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का उल्लेख किया; RBI, दूरसंचार विभाग (DoT), इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), विधि कार्य विभाग और उपभोक्ता मामले मंत्रालय से “पीड़ितों को मुआवज़े के किसी ढाँचे” पर बैठक करने को कहा |
| 4 अगस्त 2026 | CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना | RBI को निर्देश दिया कि वह अस्थायी डेबिट होल्ड पर अपनी SOP को चार सप्ताह के भीतर “औपचारिक रूप से अपनाए और परिचालित करे”; बाक़ी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से चार सप्ताह के भीतर अपने राज्य साइबर अपराध समन्वय केंद्र अधिसूचित करने को कहा; अंतर-विभागीय समिति से “साझा दायित्व और पीड़ित-मुआवज़ा ढाँचे” पर चर्चा करने को कहा |
| 29 अक्टूबर 2026 | CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना | RBI से क्षतिपूर्ति को अनिवार्य बनाने को कहा; कहा कि वह RBI के प्रस्तावित निदेशों की जाँच करेगा |
- 9 फ़रवरी के आदेश में यह भी दर्ज है कि “बताया गया है कि 53 में से लगभग 26 बैंकों ने Mule Hunter AI भी अपना लिया है”।
- 4 अगस्त के आदेश में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, दूरसंचार विभाग और I4C से कहा गया कि वे ऑडियो और वीडियो कॉल के लिए समय-आधारित “किल स्विच” पर विचार करें। CBI से “रु. 10 करोड़ की मौजूदा न्यूनतम सीमा घटाने” पर विचार करने को कहा गया।
- यही आदेश हमारे 7 अगस्त के संपादकीय: डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी और घरेलू प्रवर्तन की सीमाएँ (अंग्रेज़ी) का विषय था।
- सुश्री एन.एस. नप्पिनई न्याय मित्र (amicus curiae) के रूप में न्यायालय की सहायता कर रही हैं।
पीठ RBI के नियमों में क्या चाहती है
पीठ RBI के नियमों में क्या चाहती है
तीन सुरक्षा उपाय जिन्हें पीठ अनिवार्य बनाना चाहती है, बैंक की समुचित सावधानी में चूक होने पर क्षतिपूर्ति, और एक समय-सीमा जो अभी केवल योजना है।
नीचे पीठ के शब्द वैसे ही दिए गए हैं जैसे Bar & Bench ने उद्धृत किए; The Hindu और The Indian Express ने भी इस सुनवाई की ख़बर दी।
- क्षतिपूर्ति, एक न्यूनतम सीमा के साथ। Bar & Bench के उद्धरण के मुताबिक़: “हम इस बात पर ज़ोर देते हैं कि RBI के प्रस्तावित नियामक उपायों में वित्तीय संस्थाओं के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए कि वे डिजिटल अरेस्ट या साइबर धोखाधड़ी के पीड़ितों की उपयुक्त मुआवज़े के ज़रिए क्षतिपूर्ति करें, जो ग्राहक की गँवाई गई राशि से कम न हो, जहाँ यह पाया जाए कि धोखाधड़ी या अपराध वित्तीय संस्था की समुचित सावधानी में चूक का परिणाम था।”
- तीन सुरक्षा उपाय, अनिवार्य रूप से। “किसी खाते के पिछले रिकॉर्ड से मेल न खाने वाले असामान्य लेनदेन का अस्थायी निलंबन, स्वचालित रिपोर्टिंग, और लेनदेन की वास्तविकता जाँचने के लिए भौतिक सत्यापन, हर वित्तीय संस्था के लिए अनिवार्य होने चाहिए।”
- अनुपालन। “रिपोर्टें अंतर-विभागीय समिति को सौंपी जाएँगी। सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों को अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया जाता है।”
- राज्यों से आँकड़े। The Hindu के अनुसार पीठ ने “राज्यों को डिजिटल अरेस्ट मामलों में दर्ज FIR और उनकी जाँच व अभियोजन की स्थिति की जानकारी देने का निर्देश दिया।”
क्षतिपूर्ति वह प्रावधान है जिसे न्यायालय RBI के नियमों में शामिल देखना चाहता है। यह अभी किसी भी बैंक पर बाध्यकारी नियम नहीं है।
पीठ और नियामक: अदालत में हुई बहस
न्यायालय की अधीरता। The Hindu के मुताबिक़ CJI ने डिजिटल अरेस्ट को “इस देश के इतिहास की सबसे बड़ी वित्तीय धोखाधड़ी” बताया। RBI की प्रक्रिया पर The Indian Express ने उन्हें यह कहते उद्धृत किया: “समस्या यह है कि बैंक अधिकारी इसमें शामिल हैं… RBI नरमी बरत रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण। क्योंकि जब हम बैंकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई माँग रहे हैं, तब RBI बैंकों से परामर्श कर रहा है”। Bar & Bench के अनुसार उन्होंने कहा: “विनियमन में दायित्व का प्रावधान होना ही चाहिए। वरना हम इसे न्यायिक आदेश के ज़रिए लागू करवाएँगे”।
केंद्र का जवाब। केंद्र और RBI की ओर से पेश महान्यायवादी (Attorney-General) आर. वेंकटरमणी ने, The Hindu के मुताबिक़, “जल्दबाज़ी न करने की सलाह दी”। उनका कहना था कि जवाबी उपाय “जादू की छड़ी घुमाकर” नहीं आ सकते, वे केंद्रीय बैंक और हितधारकों के बीच परामर्श से ही आएँगे। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित RBI (KYC) संशोधन निदेश, 2026 “30 नवंबर तक अधिसूचित और 31 दिसंबर तक परिचालित कर दिए जाएँगे”। Bar & Bench के अनुसार उन्होंने यह भी कहा कि बैंक कर्मचारियों ने धोखाधड़ी रोकी भी है और शिकायतें लगभग 50 प्रतिशत घटी हैं।
यानी निदेश अभी प्रस्ताव ही हैं। 30 नवंबर तक अधिसूचना और 31 दिसंबर तक परिचालन, यह महान्यायवादी की बताई हुई योजना है; इनमें से कुछ भी अभी हुआ नहीं है।
पैमाना: न्यायालय का रिकॉर्ड क्या दिखाता है
संदर्भ के लिए, सबसे पक्के आँकड़े वे हैं जो न्यायालय ने ख़ुद 4 अगस्त 2026 को I4C की 3 अगस्त 2026 की चौथी स्थिति रिपोर्ट से दर्ज किए:
| संकेतक | आँकड़ा (4 अगस्त 2026 के आदेश में दर्ज) |
|---|---|
| NCRP पर डिजिटल अरेस्ट की शिकायतें | 2024 में 1,23,672, 2025 में 58,239, 30 जून 2026 को समाप्त अवधि में 16,377 |
| धन वापसी तंत्र पोर्टल (Money Restoration Mechanism Portal) | 57 भागीदार बैंक और सभी 36 राज्य व केंद्रशासित प्रदेश; 36,290 मामलों में राशि लौटाई गई, कुल ₹18.05 करोड़ |
| शिकायत निवारण पोर्टल | 69 बैंकों की 1,23,590 शाखाएँ इसके दायरे में |
| e-Zero FIR | 19 राज्यों में चालू |
| राज्य साइबर अपराध समन्वय केंद्र | केवल 14 राज्यों ने अधिसूचित किए |
| CBI | डिजिटल अरेस्ट के दस मामले दर्ज; एक जाँच में 238 पीड़ित, पहली परत के 67 बैंक खाते, लगभग ₹80 करोड़ के लेनदेन, लगभग 16 राज्यों में 93 स्थानों पर तलाशी |
न्यायालय ने शिकायतों में गिरावट को “निश्चित रूप से उत्साहजनक” कहा, लेकिन साथ ही जोड़ा कि “निरंतर निगरानी अनिवार्य बनी हुई है”। I4C के आँकड़ों के हवाले से The Indian Express बताता है कि रिपोर्ट हुए नुक़सान 2024 में लगभग ₹1,935 करोड़ और 2025 में लगभग ₹1,211 करोड़ थे। इन नुक़सानों के सामने ₹18.05 करोड़ की वापसी बहुत छोटी है, और यही अंतर बैंकों से मुआवज़े के पक्ष में तर्क है।
पृष्ठभूमि के लिए एक पुराना आधिकारिक आँकड़ा: 12 मार्च 2025 के एक बयान में गृह मंत्रालय ने कहा था कि I4C ने डिजिटल अरेस्ट में इस्तेमाल हुए 3,962 से अधिक Skype ID और 83,668 WhatsApp खाते ब्लॉक किए हैं। मंत्रालय के मुताबिक़ 2021 में शुरू हुई नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग और प्रबंधन प्रणाली (CFCFRMS) ने 13.36 लाख से अधिक शिकायतों में ₹4,386 करोड़ से अधिक की राशि बचाई थी।
मुख्य परीक्षा की दृष्टि से: नुक़सान कौन उठाए?
- पीड़ित से संस्था तक। अगर डिजिटल अरेस्ट को सिर्फ़ फ़ोन पर फँसे किसी भोले व्यक्ति के ख़िलाफ़ अपराध माना जाए, तो नुक़सान पीड़ित के ही सिर रहता है। न्यायालय का नज़रिया यह सवाल उठाता है कि क्या बैंक की अपनी प्रणालियों को उस लेनदेन पर चेतावनी नहीं देनी चाहिए थी जो खाते के इतिहास से मेल नहीं खाता। जहाँ सतर्कता में चूक हुई, वहाँ भुगतान बैंक करे।
- कसौटी है समुचित सावधानी। प्रस्तावित क्षतिपूर्ति वहीं लागू होगी जहाँ धोखाधड़ी “समुचित सावधानी में चूक का परिणाम पाई जाए”। यह निष्कर्ष कौन निकालेगा, किस मानक पर और कितनी जल्दी, इसी से तय होगा कि यह उपचार पीड़ितों तक पहुँचता भी है या नहीं।
- विनियमन या न्यायनिर्णयन। RBI नियम बनाने से पहले बैंकों से परामर्श करता है; पीठ इसे देरी मानती है। जब न्यायालय न्यायिक आदेश से दायित्व का प्रावधान जोड़ने की चेतावनी देता है, तो वह पुराना सवाल फिर उठता है कि न्यायिक निर्देश कहाँ ख़त्म होता है और नियामकीय रूपरेखा कहाँ शुरू होती है। हालाँकि यहाँ न्यायालय मसौदे की समीक्षा कर रहा है, उसकी जगह नहीं ले रहा।
- रोकथाम और लागत। अनिवार्य निलंबन, स्वचालित रिपोर्टिंग और भौतिक सत्यापन ईमानदार ग्राहकों के लिए भी अड़चन बढ़ाते हैं। असल सवाल ऐसी रोक बनाने का है जो अस्थायी हो, कारण बताकर लगाई जाए और जल्दी हटाई जा सके।
- संघीय क्षमता। (4 अगस्त के आदेश के समय तक) केवल 14 राज्यों ने अपने समन्वय केंद्र अधिसूचित किए थे और e-Zero FIR 19 राज्यों में चालू था। इसलिए प्रवर्तन अब भी इस पर टिका है कि राज्य राष्ट्रीय पोर्टल के बराबर पहुँचें।
आगे क्या: महान्यायवादी ने कहा है कि निदेश 30 नवंबर तक अधिसूचित और 31 दिसंबर 2026 तक परिचालित होंगे। न्यायालय लगभग 30 नवंबर को मामले पर फिर सुनवाई करेगा (Bar & Bench के अनुसार अगली सुनवाई इसी तारीख़ को है; The Hindu का कहना है कि मामला उससे पहले फिर सूचीबद्ध होगा)।
आगे की राह
- दायित्व को नियम में लिखा जाए: साफ़ क्षतिपूर्ति प्रावधान, भुगतान की समय-सीमा और ग्राहक के लिए अपील का रास्ता।
- तीनों सुरक्षा उपाय एक समान हों: असामान्य लेनदेन का निलंबन, स्वचालित रिपोर्टिंग और भौतिक सत्यापन, हर वित्तीय संस्था में लागू।
- राज्य स्तर का काम पूरा हो: हर जगह अधिसूचित राज्य साइबर अपराध समन्वय केंद्र और e-Zero FIR।
- राशि वापसी तेज़ हो: 1930 हेल्पलाइन और NCRP के ज़रिए फ़्रीज़ किया गया पैसा पीड़ितों तक जल्दी पहुँचे।
- जागरूकता जारी रहे: 1930 हेल्पलाइन, और CJI की यह सीधी बात कि “मोबाइल फ़ोन कॉल पर किसी को गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता”।
पिछली कवरेज से पृष्ठभूमि: इंडिया मोबाइल कांग्रेस में साइबर धोखाधड़ी और डीपफ़ेक के ख़िलाफ़ वैश्विक ढाँचे के लिए प्रधानमंत्री का आह्वान, हमारे 9 अक्टूबर के समाचार-सार (अंग्रेज़ी) में।
UPSC प्रासंगिकता
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3: संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती; साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें; धन-शोधन और इसे रोकना।
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2: न्यायपालिका की कार्यप्रणाली; सांविधिक और नियामक निकाय (RBI); सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप।
प्रारंभिक परीक्षा: BNS की धारा 318 और 319; IT अधिनियम की धारा 66C और 66D; I4C, NCRP और 1930 हेल्पलाइन; e-Zero FIR; अस्थायी डेबिट होल्ड; धन वापसी तंत्र पोर्टल।
मुख्य परीक्षा: “डिजिटल अरेस्ट घोटाले दूरसंचार नेटवर्क, बैंकिंग प्रणाली और पुलिस के बीच की खाइयों का फ़ायदा उठाते हैं। जब बैंक की समुचित सावधानी विफल हो, तो क्या नुक़सान बैंक को उठाना चाहिए? सर्वोच्च न्यायालय के स्वतः संज्ञान मामले के संदर्भ में चर्चा कीजिए।” (250 शब्द)
📌 तथ्य सार: ज्ञानकोश
प्रारंभिक परीक्षा: कथन-आधारित तथ्य:
- मामला: 2025 की स्वतः संज्ञान रिट याचिका (आपराधिक) संख्या 3, “In Re: Victims of Digital Arrest Related to Forged Documents”
- स्वतः संज्ञान: 17 अक्टूबर 2025, एक वरिष्ठ नागरिक दंपती की शिकायत पर; न्यायमूर्ति सूर्यकांत और जॉयमाल्य बागची
- 29 अक्टूबर 2026 की पीठ: CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना (तीन न्यायाधीश)
- न्यायालय की माँग: जहाँ धोखाधड़ी बैंक की समुचित सावधानी में चूक का परिणाम हो, वहाँ “गँवाई गई राशि से कम नहीं” की क्षतिपूर्ति
- जिन सुरक्षा उपायों को अनिवार्य करने की माँग: असामान्य लेनदेन का निलंबन, स्वचालित रिपोर्टिंग, भौतिक सत्यापन
- प्रस्तावित नियम: भारतीय रिज़र्व बैंक (अपने ग्राहक को जानिए) संशोधन निदेश, 2026; यह प्रस्ताव है, जिसे न्यायालय अधिसूचना से पहले जाँचना चाहता है
- NCRP पर डिजिटल अरेस्ट की शिकायतें: 1,23,672 (2024), 58,239 (2025), 30 जून 2026 तक 16,377 (I4C, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के हवाले से)
- धन वापसी तंत्र पोर्टल: 36,290 मामले, ₹18.05 करोड़ लौटाए गए (4 अगस्त 2026 का आदेश)
- e-Zero FIR 19 राज्यों में चालू; राज्य साइबर अपराध समन्वय केंद्र 14 राज्यों ने अधिसूचित किए (4 अगस्त 2026)
- डिजिटल अरेस्ट मामले हाथ में लेने के लिए CBI की न्यूनतम सीमा: ₹10 करोड़ या अधिक का नुक़सान (9 फ़रवरी 2026 का आदेश)
- BNS धारा 318(4) छल: 7 वर्ष तक और जुर्माना; धारा 319 प्रतिरूपण द्वारा छल: 5 वर्ष तक
- IT अधिनियम धारा 66C पहचान की चोरी और 66D प्रतिरूपण द्वारा छल: 3 वर्ष तक और ₹1 लाख तक जुर्माना
- I4C: गृह मंत्रालय का संबद्ध कार्यालय; हेल्पलाइन 1930; CFCFRMS की शुरुआत 2021 में
प्रारंभिक परीक्षा: संभावित भ्रामक बिंदु:
- न्यायालय ने बैंकों को भुगतान का आदेश नहीं दिया है; उसने RBI से क्षतिपूर्ति को अपने नियमों में शामिल करने को कहा है
- KYC संशोधन निदेश, 2026 एक प्रस्ताव हैं, न अभी अधिसूचित हुए हैं, न लागू; महान्यायवादी की समय-सीमा एक योजना है, घटित तथ्य नहीं
- “डिजिटल अरेस्ट” एक घोटाले का नाम है, कोई विधिक अधिकार नहीं: भारत में डिजिटल अरेस्ट का कोई विधिक प्रावधान नहीं है
मुख्य परीक्षा: तर्क और प्रमुख शब्दावली:
- प्रमुख शब्द: समुचित सावधानी, क्षतिपूर्ति, साझा दायित्व, अस्थायी डेबिट होल्ड, मनी म्यूल खाते, e-Zero FIR
- ढाँचा: रोकथाम (बैंकों के सुरक्षा उपाय), उपचार (राशि वापसी और मुआवज़ा), प्रवर्तन (राज्य केंद्र, CBI)
साक्षात्कार: इनके लिए तैयार रहें:
- “क्या ग्राहक की ग़लती का भुगतान बैंकों से करवाना उचित है?” केवल वहीं, जहाँ बैंक की अपनी समुचित सावधानी विफल हुई हो; न्यायालय की कसौटी यही है।
स्रोत: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, Suo Motu Writ Petition (Criminal) No. 3 of 2025 में अक्टूबर 2025, फ़रवरी 2026 और अगस्त 2026 के आदेश। Bar & Bench, 29 अक्टूबर 2026 की सुनवाई पर रिपोर्ट। The Hindu, कृष्णदास राजगोपाल, 30 अक्टूबर 2026 (प्रिंट)। The Indian Express, Explained, डिजिटल अरेस्ट पर, 30 अक्टूबर 2026। Press Information Bureau, गृह मंत्रालय, “Steps taken to address the issue of digital arrest scams”, मार्च 2025। भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Gazette of India Extraordinary No. 55 of 2023)। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (India Code)।
- टिप्पणी: उद्धरण-चिह्नों में दिए गए विधिक और आधिकारिक अंश अंग्रेज़ी पाठ के हिंदी अनुवाद हैं।