UPSC प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास
UPSC प्रारंभिक परीक्षा क्विज़ 2 नवंबर 2026: करेंट अफेयर्स MCQ
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आज के करेंट अफेयर्स पर आधारित 10 प्रश्न
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प्रश्न 1 / 10
1. रक्षा अधिग्रहण परिषद की अध्यक्षता रक्षा मंत्री के पास होती है।
2. रक्षा अधिग्रहण परिषद की ओर से दी गई आवश्यकता की स्वीकृति (Acceptance of Necessity) किसी प्रस्ताव की सैद्धांतिक प्रशासनिक स्वीकृति है, कोई अनुबंध नहीं।
3. परियोजना 28 के पनडुब्बी-रोधी युद्ध स्टेल्थ कार्वेटों में पहले पोत, INS कमोर्टा, का डिज़ाइन भारतीय नौसेना के आंतरिक डिज़ाइन संगठन ने तैयार किया था।
4. गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड विशाखापत्तनम स्थित एक नवरत्न रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: PIB के रिकॉर्ड में DAC की बैठक ‘रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में’ दर्ज है।
कथन 2 सही है: PIB आवश्यकता की स्वीकृति को ‘सैद्धांतिक प्रशासनिक’ स्वीकृति बताता है; बोलियाँ, वार्ता और हस्ताक्षरित अनुबंध बाद में आते हैं।
कथन 3 सही है: 2014 की एक PIB विज्ञप्ति INS कमोर्टा को उन चार ASW स्टेल्थ कार्वेटों में पहला बताती है, जिन्हें ‘परियोजना 28 के तहत नौसेना के आंतरिक संगठन, नौसेना डिज़ाइन निदेशालय (DND), ने डिज़ाइन किया’।
कथन 4 गलत है: GRSE नवरत्न DPSU तो है, लेकिन यह कोलकाता में है।
विश्लेषण: 2 नवंबर 2026 को रक्षा मंत्रालय ने आठ अगली पीढ़ी के कार्वेटों (Next Generation Corvettes) के लिए GRSE (पाँच पोत) और गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (तीन पोत) के साथ 53,866.50 करोड़ रुपये के अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए; इनकी AoN 2022 में मिली थी।
अवधारणा नोट
सशस्त्र बलों के लिए पूंजीगत अधिग्रहण कई चरणों से होकर गुज़रता है। सबसे पहले रक्षा मंत्री की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) आवश्यकता की स्वीकृति (AoN) देती है, जो किसी प्रस्ताव की केवल सैद्धांतिक प्रशासनिक स्वीकृति है। इसके बाद बोलियाँ और वार्ता होती हैं, और तभी अनुबंध पर हस्ताक्षर होते हैं। अगली पीढ़ी के कार्वेट कार्यक्रम में यह अंतर साफ़ दिखता है: AoN 2022 में मिली, जबकि अनुबंध नवंबर 2026 में जाकर हुए। रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 के तहत Buy (Indian-IDDM) श्रेणी भारतीय विक्रेताओं के लिए आरक्षित है और इसमें कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री ज़रूरी है, जिसकी गणना मूल अनुबंध मूल्य पर होती है। यह काम रक्षा मंत्रालय के अधीन दो रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों को मिला: कोलकाता की GRSE, जो एक नवरत्न DPSU है और जिसने परियोजना 28 (कमोर्टा श्रेणी) के चारों कार्वेट बनाए, और वास्को-द-गामा स्थित गोवा शिपयार्ड लिमिटेड। 2025 की एक सरकारी पृष्ठभूमि टिप्पणी के मुताबिक़ नौसेना का आंतरिक डिज़ाइन संगठन, युद्धपोत डिज़ाइन ब्यूरो, भारतीय शिपयार्डों में सौ से अधिक युद्धपोतों के डिज़ाइन और निर्माण में मदद कर चुका है। ढाँचा यही है: डिज़ाइन नौसेना का, निर्माण DPSU का और सामग्री भारतीय; PIB ने ख़रीद श्रेणी का नाम नहीं बताया है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS3 सुरक्षा, रक्षा उत्पादन और स्वदेशीकरण; GS2 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से जुड़ी सरकारी नीतियाँ।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: आवश्यकता की स्वीकृति, Buy (Indian-IDDM), स्वदेशी सामग्री, आंतरिक युद्धपोत डिज़ाइन।
सामान्य भूल: AoN को अनुबंध या ऑर्डर मान लेना; यह केवल सैद्धांतिक स्वीकृति है और अनुबंध वर्षों बाद हो सकते हैं।
परीक्षा सुझाव: हर शिपयार्ड को उसके शहर के साथ याद रखें: GRSE, कोलकाता; गोवा शिपयार्ड लिमिटेड, वास्को-द-गामा; और परियोजना 28 को कमोर्टा श्रेणी के ASW कार्वेटों के रूप में याद रखें।
साक्षात्कार का कोण: क्या अधिग्रहण प्रक्रिया में तय समय-सीमाएँ जोड़कर AoN और अनुबंध के बीच का लंबा अंतर घटाया जाना चाहिए?
प्रश्न 2 / 10
1. जहाँ न्यायालय संतुष्ट हो कि कोई विदेशी पंचाट प्रवर्तनीय है, वहाँ वह पंचाट उस न्यायालय की डिक्री माना जाता है।
2. भारत न्यूयॉर्क अभिसमय केवल उन पंचाटों पर लागू करता है जो किसी अन्य संविदाकारी राज्य के क्षेत्र में दिए गए हों, और केवल उन मतभेदों पर जो भारतीय विधि के तहत वाणिज्यिक माने जाते हों।
3. यह परखते समय कि प्रवर्तन भारतीय विधि की मूलभूत नीति के विरुद्ध है या नहीं, न्यायालय विवाद के गुण-दोष की समीक्षा कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: धारा 49 कहती है कि जहाँ न्यायालय संतुष्ट हो कि विदेशी पंचाट प्रवर्तनीय है, वहाँ ‘पंचाट उस न्यायालय की डिक्री समझा जाएगा’।
कथन 2 सही है: भारत ने दो आरक्षणों के साथ अभिसमय का अनुसमर्थन किया था: पारस्परिकता (किसी अन्य संविदाकारी राज्य में दिए गए पंचाट) और केवल वाणिज्यिक विवाद।
कथन 3 गलत है: धारा 48 का स्पष्टीकरण 2 कहता है कि मूलभूत नीति की कसौटी में ‘विवाद के गुण-दोष की समीक्षा शामिल नहीं होगी’।
विश्लेषण: रव्वा पंचाट इन्हीं धाराओं पर टिके हैं; Bar & Bench की रिपोर्ट के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय ने 2 नवंबर 2026 को दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ केंद्र की अपील ख़ारिज कर दी, जिसमें प्रवर्तन की अनुमति दी गई थी।
अवधारणा नोट
माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 के भाग II का अध्याय I न्यूयॉर्क अभिसमय के तहत विदेशी पंचाटों से जुड़ा है। धारा 44 विदेशी पंचाट की परिभाषा देती है: ऐसा पंचाट जो भारतीय विधि के तहत वाणिज्यिक माने जाने वाले मतभेदों पर हो, 11 अक्टूबर 1960 को या उसके बाद दिया गया हो, लिखित माध्यस्थम् करार के तहत हो, और ऐसे क्षेत्र में दिया गया हो जिसे केंद्र सरकार ने पारस्परिकता वाला क्षेत्र अधिसूचित किया है। धारा 47 बताती है कि आवेदक को क्या पेश करना होगा: पंचाट, माध्यस्थम् करार और इस बात का प्रमाण कि पंचाट विदेशी है। धारा 48 उन सीमित आधारों को गिनाती है जिन पर प्रवर्तन से इनकार किया जा सकता है। इनमें पक्षकार की अक्षमता, उचित सूचना का अभाव, सौंपे गए विषय के दायरे से बाहर का पंचाट, अनियमित अधिकरण या प्रक्रिया, ऐसा पंचाट जो अभी बाध्यकारी न हुआ हो या जिसे माध्यस्थम् के स्थान (सीट) पर अपास्त कर दिया गया हो, और लोक नीति शामिल हैं। 2016 के संशोधन के बाद से लोक नीति केवल कपट या भ्रष्टाचार, भारतीय विधि की मूलभूत नीति और नैतिकता या न्याय की सबसे बुनियादी धारणाओं तक सीमित है, और इसमें गुण-दोष की कोई समीक्षा नहीं होती। धारा 49 प्रवर्तनीय पंचाट को डिक्री मानती है। भारत ने अभिसमय पर 10 जून 1958 को हस्ताक्षर किए और 13 जुलाई 1960 को उसका अनुसमर्थन किया; भारत के लिए यह 11 अक्टूबर 1960 को लागू हुआ।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS2 न्यायपालिका और विवाद निवारण तंत्र; GS3 निवेश माहौल और अनुबंधों का प्रवर्तन।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: प्रवर्तन-समर्थक झुकाव, संकीर्ण लोक नीति, पारस्परिकता आरक्षण, न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप।
सामान्य भूल: यह मान लेना कि भारतीय न्यायालय लोक नीति के आधार पर विदेशी पंचाट के गुण-दोष की दोबारा जाँच कर सकता है; 2016 का स्पष्टीकरण इसकी मनाही करता है।
परीक्षा सुझाव: भारत और अभिसमय से जुड़ी तीन तिथियाँ याद रखें: हस्ताक्षर 1958, अनुसमर्थन 13 जुलाई 1960, प्रवर्तन 11 अक्टूबर 1960; यही तिथि धारा 44 में भी है।
साक्षात्कार का कोण: क्या राज्य के विरुद्ध विदेशी पंचाटों का सख़्त प्रवर्तन निवेश गंतव्य के रूप में भारत की छवि को जितना फ़ायदा पहुँचाता है, उतना सरकारी ख़ज़ाने को नुक़सान नहीं पहुँचाता?
प्रश्न 3 / 10
कथन-I: भारत में किसी विदेशी माध्यस्थम् पंचाट के प्रवर्तन की याचिका पर परिसीमा अधिनियम, 1963 का अनुच्छेद 137 लागू होता है, जो आवेदन का अधिकार प्राप्त होने के समय से तीन वर्ष की अवधि निर्धारित करता है।
कथन-II: विदेशी पंचाट भारत में किसी सिविल न्यायालय की डिक्री नहीं है, इसलिए परिसीमा अधिनियम का अनुच्छेद 136 उसके प्रवर्तन पर लागू नहीं होता।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही है?
तथ्य: कथन-I सही है: 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 47 और 49 के तहत प्रवर्तन पर ‘परिसीमा अधिनियम, 1963 का अनुच्छेद 137 लागू होगा, जो आवेदन का अधिकार प्राप्त होने के समय से तीन वर्ष की अवधि निर्धारित करता है’।
कथन-II सही है और कथन-I की व्याख्या करता है: न्यायालय ने कहा कि ‘विदेशी पंचाट के प्रवर्तन / निष्पादन पर परिसीमा अधिनियम का अनुच्छेद 136 लागू नहीं होगा, क्योंकि वह भारत में किसी सिविल न्यायालय की डिक्री नहीं है’; इसी वजह से अनुच्छेद 137 लागू होता है।
विश्लेषण: 1 जुलाई 2026 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने रव्वा पंचाटों पर अनुच्छेद 137 लागू किया और याचिका को परिसीमा के भीतर पाया।
अवधारणा नोट
परिसीमा अधिनियम, 1963 वह समय तय करता है जिसके भीतर किसी दावे को न्यायालय के सामने लाया जा सकता है। विदेशी पंचाट पर कौन-सा अनुच्छेद लागू होगा, यह सवाल ख़ुद रव्वा विवाद में ही सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा था। Union of India v. Vedanta Ltd., (2020) 10 SCC 1 मामले में न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नज़ीर, इंदु मल्होत्रा और अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा कि माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 47 और 49 के तहत विदेशी पंचाट के प्रवर्तन की याचिका अनुच्छेद 137 के दायरे में आती है, यानी आवेदन का अधिकार प्राप्त होने के समय से तीन वर्ष। न्यायालय ने अनुच्छेद 136 को ख़ारिज कर दिया, क्योंकि विदेशी पंचाट भारत में किसी सिविल न्यायालय की डिक्री नहीं है। यह तर्क धारा 49 से निकलता है: न्यायालय के संतुष्ट होने के बाद ही पंचाट प्रवर्तनीय होकर डिक्री माना जाता है, इसलिए उस चरण से पहले वह पंचाट है, डिक्री नहीं। इसी आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने 1 जुलाई 2026 को कहा कि परिसीमा की घड़ी 10 जुलाई 2014 के कारण बताओ नोटिस से शुरू हुई और प्रवर्तन याचिका समय के भीतर थी। Bar & Bench की रिपोर्ट के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय ने 2 नवंबर 2026 को केंद्र की अपील ख़ारिज कर दी।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS2 न्यायपालिका, सांविधिक निर्वचन और विवाद समाधान।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: परिसीमा विधि, डिक्री मान लिया जाना, प्रवर्तन बनाम निष्पादन, पंचाटों की अंतिमता।
सामान्य भूल: विदेशी पंचाट पर डिक्री वाला अनुच्छेद (136) लागू कर देना; जब तक न्यायालय उसे प्रवर्तनीय घोषित न करे, वह डिक्री नहीं है।
परीक्षा सुझाव: परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 137 को 1996 के अधिनियम की धारा 47 और 49 तथा 2020 के वेदांता फ़ैसले से जोड़कर याद रखें।
साक्षात्कार का कोण: क्या संसद को विदेशी पंचाटों के लिए परिसीमा की स्पष्ट अवधि 1996 के अधिनियम में ही लिख देनी चाहिए, बजाय इसे न्यायिक निर्वचन पर छोड़ने के?
प्रश्न 4 / 10
कथन-I: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के मासिक बुलेटिन में प्रकाशित बेरोज़गारी दर सामान्य स्थिति दृष्टिकोण पर मापी जाती है, जिसकी संदर्भ अवधि पिछले 365 दिन है।
कथन-II: वर्तमान साप्ताहिक स्थिति दृष्टिकोण में किसी व्यक्ति की गतिविधि स्थिति सर्वेक्षण की तिथि से पहले के पिछले 7 दिनों की संदर्भ अवधि के आधार पर तय की जाती है।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही है?
तथ्य: कथन-I गलत है: MoSPI का मासिक बुलेटिन अपने आँकड़े ‘वर्तमान साप्ताहिक स्थिति (CWS) दृष्टिकोण के अनुसार’ देता है; 365 दिन वाली सामान्य स्थिति वार्षिक अनुमानों का आधार है।
कथन-II सही है: MoSPI के अनुसार CWS वह स्थिति है जो ‘सर्वेक्षण की तिथि से पहले के पिछले 7 दिनों की संदर्भ अवधि के आधार पर तय की जाती है’।
विश्लेषण: इसीलिए सितंबर 2026 की 5.0 प्रतिशत CWS दर को 2023-24 की वार्षिक सामान्य स्थिति वाली 3.2 प्रतिशत दर के सामने रखकर बेरोज़गारी में बढ़ोतरी नहीं कहा जा सकता।
अवधारणा नोट
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) का आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण रोज़गार को दो पैमानों पर मापता है। सामान्य स्थिति 365 दिन पीछे देखती है: मुख्य स्थिति वह गतिविधि है जिसमें व्यक्ति ने अपेक्षाकृत अधिक समय बिताया, और सहायक स्थिति उस वर्ष में 30 दिन या उससे अधिक की आर्थिक गतिविधि को जोड़ती है; दोनों को साथ में ps+ss लिखा जाता है। वर्तमान साप्ताहिक स्थिति केवल पिछले 7 दिन देखती है और मासिक व तिमाही बुलेटिनों में इसी का इस्तेमाल होता है। तीन प्रमुख अनुपात हैं: श्रम बल भागीदारी दर, कामगार जनसंख्या अनुपात और बेरोज़गारी दर। सामान्य स्थिति (ps+ss) पर, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लिए, व्यक्तियों की बेरोज़गारी दर 2017-18 के 6.0 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 3.2 प्रतिशत रह गई (पुरुष 6.1 से 3.2, महिलाएँ 5.6 से 3.2), जबकि महिला श्रम बल भागीदारी 23.3 से बढ़कर 41.7 प्रतिशत हो गई। जनवरी 2025 से सर्वेक्षण में बदलाव किया गया, और MoSPI का कहना है कि 2025 के वार्षिक अनुमान पहले की वार्षिक रिपोर्टों से पूरी तरह तुलनीय नहीं भी हो सकते। घटती बेरोज़गारी दर अपने आप में काम की गुणवत्ता के बारे में भी कुछ नहीं बताती, और यही सम्मानजनक कार्य (decent work) का सवाल है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS3 रोज़गार और संवृद्धि; GS2 सरकारी आँकड़े और साक्ष्य-आधारित नीति।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: सामान्य स्थिति (ps+ss), वर्तमान साप्ताहिक स्थिति, श्रम बल भागीदारी, काम की गुणवत्ता।
सामान्य भूल: मासिक CWS दर की तुलना वार्षिक सामान्य स्थिति दर से करना और इस अंतर को बेरोज़गारी में बढ़ोतरी बता देना।
परीक्षा सुझाव: संदर्भ अवधियाँ याद रखें: सामान्य स्थिति 365 दिन, CWS 7 दिन; सहायक काम 30 दिन या उससे अधिक होने पर गिना जाता है।
साक्षात्कार का कोण: जिस अर्थव्यवस्था में ज़्यादातर काम अनौपचारिक है, क्या वहाँ बेरोज़गारी दर ही सही प्रमुख आँकड़ा है?
प्रश्न 5 / 10
1. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन रोज़गार सृजन, कार्यस्थल पर अधिकार, सामाजिक संरक्षण और सामाजिक संवाद को सम्मानजनक कार्य के चार स्तंभ बताता है।
2. SDG 8 का उद्देश्य निरंतर, समावेशी और सतत आर्थिक संवृद्धि, पूर्ण और उत्पादक रोज़गार तथा सभी के लिए सम्मानजनक कार्य को बढ़ावा देना है।
3. SDG लक्ष्य 8.8 का उद्देश्य श्रम अधिकारों की रक्षा करना और प्रवासी कामगारों सहित सभी कामगारों के लिए सुरक्षित और संरक्षित कार्य-वातावरण को बढ़ावा देना है।
4. लिंग, आयु और दिव्यांगजनों के अनुसार बेरोज़गारी दर SDG लक्ष्य 8.5 के तहत एक संकेतक है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: ILO के एजेंडे के केंद्र में ‘रोज़गार सृजन, कार्यस्थल पर अधिकार, सामाजिक संरक्षण और सामाजिक संवाद’ हैं, जिन्हें वह सम्मानजनक कार्य के चार स्तंभ कहता है।
कथन 2 सही है: यह SDG 8 का संयुक्त राष्ट्र का अपना शब्दांकन है।
कथन 3 सही है: लक्ष्य 8.8 में श्रम अधिकार और सुरक्षित कार्य-वातावरण शामिल हैं, ‘प्रवासी कामगारों सहित’।
कथन 4 सही है: संकेतक 8.5.2 है ‘लिंग, आयु और दिव्यांगजनों के अनुसार बेरोज़गारी दर’।
विश्लेषण: संपादकीय का तर्क है कि भारत की घटती बेरोज़गारी दर को अकेले नहीं, बल्कि गुणवत्ता की इन कसौटियों के साथ पढ़ा जाना चाहिए।
अवधारणा नोट
सम्मानजनक कार्य अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की यह अवधारणा है कि नौकरी उत्पादक हो और उचित आय दे, कार्यस्थल पर सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण दे, व्यक्तिगत विकास का मौक़ा दे, और कामगारों को संगठित होने तथा अपने जीवन पर असर डालने वाले फ़ैसलों में हिस्सा लेने दे। ILO इसे चार स्तंभों में बाँटता है: रोज़गार सृजन, कार्यस्थल पर अधिकार, सामाजिक संरक्षण और सामाजिक संवाद। 2030 के एजेंडे ने यह विचार सतत विकास लक्ष्य 8 में लिया, जिसका उद्देश्य निरंतर, समावेशी और सतत आर्थिक संवृद्धि, पूर्ण और उत्पादक रोज़गार तथा सभी के लिए सम्मानजनक कार्य है। लक्ष्य 8.5 का उद्देश्य 2030 तक युवाओं और दिव्यांगजनों सहित सभी महिलाओं और पुरुषों के लिए पूर्ण और उत्पादक रोज़गार और सम्मानजनक कार्य, तथा समान मूल्य के काम के लिए समान वेतन है; इसके संकेतक औसत प्रति घंटा आय (8.5.1) और बेरोज़गारी दर (8.5.2) हैं। लक्ष्य 8.8 सभी कामगारों के श्रम अधिकारों और सुरक्षित व संरक्षित कार्य-वातावरण की रक्षा करता है, जिनमें प्रवासी कामगार, ख़ासकर प्रवासी महिलाएँ, और अनिश्चित रोज़गार वाले लोग शामिल हैं। भारत के लिए श्रम संहिताएँ और काम की गुणवत्ता पर PLFS के आँकड़े इन लक्ष्यों से मुख्य परीक्षा के स्वाभाविक जुड़ाव हैं।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS2 अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और कमज़ोर वर्गों का कल्याण; GS3 समावेशी संवृद्धि और रोज़गार।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: सम्मानजनक कार्य की कमी, सामाजिक संरक्षण का न्यूनतम स्तर, सामाजिक संवाद, अनिश्चित रोज़गार।
सामान्य भूल: सम्मानजनक कार्य को केवल रोज़गार के बराबर मान लेना; ILO इसमें अधिकार, सामाजिक संरक्षण और संवाद भी जोड़ता है।
परीक्षा सुझाव: SDG 8 के लक्ष्य 8.5 (पूर्ण रोज़गार, समान वेतन) और 8.8 (श्रम अधिकार, प्रवासी) को संकेतक 8.5.2 के साथ याद रखें।
साक्षात्कार का कोण: अगर बेरोज़गारी घटे लेकिन ज़्यादातर नया काम अनौपचारिक ही रहे, तो क्या भारत SDG 8 पर प्रगति का दावा कर सकता है?
प्रश्न 6 / 10
1. व्यापार उपचार महानिदेशालय पाटनरोधी, प्रतिकारी शुल्क और रक्षोपाय उपायों से संबंधित है।
2. इस्पात उत्पादों के लिए मानक चिह्न अनिवार्य करने वाले गुणवत्ता नियंत्रण आदेश भारतीय मानक ब्यूरो स्वयं जारी करता है, इसमें केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं होती।
3. व्यापार उपचार महानिदेशालय को पहले पाटनरोधी एवं संबद्ध शुल्क महानिदेशालय के नाम से जाना जाता था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: DGTR के अनुसार वह ‘अब पाटनरोधी, CVD और रक्षोपाय उपायों से संबंधित है’।
कथन 2 गलत है: भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 2016 की धारा 16(1) के तहत केंद्र सरकार ही ‘ब्यूरो से परामर्श करने के बाद’ राजपत्र में आदेश द्वारा वस्तुओं को अधिसूचित करती है।
कथन 3 सही है: DGTR, जो ‘पहले पाटनरोधी एवं संबद्ध शुल्क महानिदेशालय के नाम से जाना जाता था’, को मई 2018 में यह नाम मिला।
विश्लेषण: राष्ट्रीय इस्पात नीति विज़न 2047 के मसौदे पर इंडियन एक्सप्रेस का स्तंभ यही सवाल उठाता है कि क्या इस संरक्षण की जगह अब प्रतिस्पर्धा को लेनी चाहिए।
अवधारणा नोट
भारत घरेलू इस्पात को दो अलग तरह के उपकरणों से बचाता है। पहला है व्यापार उपचार। व्यापार उपचार महानिदेशालय (DGTR) को मई 2018 में व्यापार रक्षा की एकीकृत एकल खिड़की एजेंसी के रूप में यह नाम मिला; यह पाटनरोधी शुल्क, प्रतिकारी शुल्क (CVD) और रक्षोपाय उपायों का काम देखता है। 2025 में सरकार ने कुछ गैर-मिश्र धातु और मिश्र धातु इस्पात फ़्लैट उत्पादों पर 200 दिनों के लिए 12 प्रतिशत का अनंतिम रक्षोपाय शुल्क लगाया था। दूसरा उपकरण है मानक। भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 2016 (2016 का अधिनियम संख्यांक 11) की धारा 16(1) के तहत केंद्र सरकार ब्यूरो से परामर्श करने के बाद राजपत्र में आदेश जारी करके यह अनिवार्य कर सकती है कि वस्तुएँ किसी मानक के अनुरूप हों और लाइसेंस या अनुरूपता प्रमाणपत्र के तहत मानक चिह्न धारण करें। इस्पात के गुणवत्ता नियंत्रण आदेश इसी शक्ति का इस्तेमाल करके घटिया और दोषपूर्ण इस्पात को घरेलू बिक्री और आयात, दोनों से बाहर रखते हैं। स्तंभ दोनों पक्ष रखता है: जिस उद्योग को अपनी क्षमता लगभग तिगुनी करनी है, उसे संरक्षण से कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन इससे निर्माण, ऑटोमोबाइल और छोटे निर्यातकों के लिए कच्चे माल की लागत बढ़ती है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS3 औद्योगिक नीति, व्यापार और उदारीकरण के प्रभाव; GS2 WTO से जुड़े मुद्दे।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: व्यापार उपचार, रक्षोपाय शुल्क, गुणवत्ता नियंत्रण आदेश, संरक्षण बनाम प्रतिस्पर्धात्मकता।
सामान्य भूल: QCO को DGTR का व्यापार उपचार मान लेना; ये BIS अधिनियम के तहत केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित मानक हैं।
परीक्षा सुझाव: हर उपकरण को उसकी संस्था से जोड़ें: पाटनरोधी, CVD और रक्षोपाय को DGTR से; QCO को BIS अधिनियम, 2016 की धारा 16 से।
साक्षात्कार का कोण: किसी मूल उद्योग का संरक्षण कब उसकी मदद करना बंद करके उससे ख़रीदने वाले उद्योगों को नुक़सान पहुँचाने लगता है?
प्रश्न 7 / 10
तथ्य: PIB के अनुसार 108 स्तूप ‘असम की सीमा के निकट गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी में आई (माउ) नदी के किनारे’ स्थित हैं। विकल्प (c) सही है; सिक्किम, पश्चिम बंगाल और अरुणाचल प्रदेश वह राज्य नहीं हैं जिसका नाम PIB देता है।
विश्लेषण: 1 नवंबर 2026 को गेलेफू में भूटान नरेश के नेतृत्व में 108 स्तूपों को खड़ा करने और उनके प्रतिष्ठापन के आयोजन में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भारत सरकार का प्रतिनिधित्व किया।
अवधारणा नोट
गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी भूटान की परियोजना है, जिसे भारत समर्थन देता है, और यह असम की सीमा के पास है। 1 नवंबर 2026 को भूटान नरेश के नेतृत्व में वहाँ 108 स्तूप खड़े किए गए और उनका प्रतिष्ठापन हुआ। हज़ारों स्वयंसेवकों ने एक ही दिन में आई (माउ) नदी के 11.7 km लंबे हिस्से पर ये स्तूप खड़े किए; हर स्तूप 15 मीटर ऊँचा है और दो स्तूपों के बीच 108 मीटर की दूरी है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भारत सरकार का प्रतिनिधित्व किया। भूटान नरेश ने स्तूप संख्या 76 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस सिटी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और अटूट समर्थन के लिए समर्पित किया; यह भूटान का समर्पण है, भारत का कोई उपहार नहीं। 31 अक्टूबर से 2 नवंबर 2026 तक की अपनी यात्रा में रिजिजू ने नरेश जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक से भेंट की, भूटान के प्रधानमंत्री दाशो शेरिंग तोबगे से मुलाक़ात की और इस परियोजना के लिए भारत का समर्थन दोहराया। प्रारंभिक परीक्षा में स्थान वाला प्रश्न ही ज़्यादा संभावित है: भारत-भूटान सीमा का नक़्शा देखें और गेलेफू को असम के सामने रखकर पहचानें। मुख्य परीक्षा में यह यात्रा भारत और उसके पड़ोस वाले विषय से जुड़ती है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS1 चर्चा में रहे स्थानों की अवस्थिति; GS2 भारत और उसका पड़ोस (भूटान)।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: पड़ोसी प्रथम, बौद्ध सांस्कृतिक संबंध, सीमा संपर्क, भारत-भूटान साझेदारी।
सामान्य भूल: स्तूप संख्या 76 के समर्पण को भारत का उपहार समझ लेना; भूटान नरेश ने इसे प्रधानमंत्री को समर्पित किया था।
परीक्षा सुझाव: गेलेफू को असम और आई (माउ) नदी के साथ जोड़कर याद रखें, और भारत-भूटान सीमा के रेखा मानचित्र पर इसे अंकित करें।
साक्षात्कार का कोण: भारत किसी पड़ोसी की प्रमुख परियोजना का समर्थन ऐसे कैसे करे कि उस पर परियोजना को चलाने का आरोप न लगे?
प्रश्न 8 / 10
1. सिक्किम का सोरेंग ज़िला PMMSY के तहत शुरू किया गया भारत का पहला जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर है।
2. सोरेंग क्लस्टर में मछली पालन में एंटीबायोटिक और कीटनाशकों के उपयोग की अनुमति है।
3. PMMSY के तहत ली गई परियोजनाओं की मछली पालन प्रौद्योगिकियों में बायोफ्लॉक और पुनःपरिसंचरण जलकृषि प्रणाली शामिल हैं।
4. सोरेंग क्लस्टर में अमूर कार्प, भारतीय प्रमुख कार्प और ट्राउट पर विशेष ज़ोर दिया गया है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: PIB के अनुसार ‘सोरेंग ज़िला, सिक्किम, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत शुरू किया गया भारत का पहला जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर है’।
कथन 2 गलत है: PIB के अनुसार क्लस्टर का ध्यान ‘हानिकारक रसायनों, एंटीबायोटिक और कीटनाशकों के उपयोग के बिना पारिस्थितिक रूप से स्वस्थ मछली पालन’ पर है।
कथन 3 सही है: जिन परियोजनाओं का उद्घाटन हुआ, उनमें ‘बायोफ्लॉक और पुनर्संचारी मत्स्य पालन प्रणाली (RAS)’ शामिल हैं।
कथन 4 सही है: क्लस्टर में ‘अमूर कार्प, भारतीय प्रमुख कार्प (IMC) और ट्राउट पर विशेष ज़ोर’ है।
विश्लेषण: PIB ने 2 नवंबर 2026 को बताया कि केंद्रीय मंत्री ने जैविक प्रमाणन की मानक संचालन प्रक्रिया और 375 लाख रुपये की परियोजनाओं का शुभारंभ किया।
अवधारणा नोट
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) का एक हिस्सा क्लस्टरों के ज़रिए चलता है: PMMSY के तहत देश भर में 34 मत्स्य उत्पादन और प्रसंस्करण क्लस्टर अधिसूचित किए गए हैं। PIB सिक्किम के सोरेंग ज़िले को इस योजना के तहत शुरू किया गया भारत का पहला जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर बताता है। क्लस्टर का लक्ष्य हानिकारक रसायनों, एंटीबायोटिक और कीटनाशकों के बिना पारिस्थितिक रूप से स्वस्थ मछली पालन है, और इसमें अमूर कार्प, भारतीय प्रमुख कार्प (IMC) और ट्राउट पर विशेष ज़ोर है। PIB की 2 नवंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय मंत्री ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में मत्स्य पालन के जैविक प्रमाणन की मानक संचालन प्रक्रिया शुरू की और PMMSY के तहत 375 लाख रुपये की परियोजनाओं का उद्घाटन किया: हैचरी, फ़ीड मिल, शीत भंडारण सुविधाएँ, और बायोफ्लॉक व पुनर्संचारी मत्स्य पालन प्रणाली (RAS) जैसी प्रौद्योगिकियाँ। प्रारंभिक परीक्षा के लिए स्थान (सोरेंग, सिक्किम), योजना (PMMSY) और प्रजातियों के तीन समूह याद रखें। मुख्य परीक्षा में यह विषय जैविक प्रमाणन, रसायन-मुक्त खेती और पूर्वोत्तर में मत्स्य पालन के विकास को जोड़ता है।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS3 मत्स्य पालन, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण; GS1 और GS3 पूर्वोत्तर का विकास।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: क्लस्टर दृष्टिकोण, जैविक प्रमाणन, रसायन-मुक्त मछली पालन, मूल्य शृंखला।
सामान्य भूल: जैविक क्लस्टर को केवल कम रसायन वाली खेती समझ लेना; सोरेंग क्लस्टर का लक्ष्य हानिकारक रसायनों, एंटीबायोटिक और कीटनाशकों के बिना मछली पालन है।
परीक्षा सुझाव: सोरेंग (सिक्किम), प्रजातियों के तीन समूह (अमूर कार्प, भारतीय प्रमुख कार्प, ट्राउट) और दो प्रौद्योगिकियाँ (बायोफ्लॉक, RAS) याद रखें।
साक्षात्कार का कोण: क्या जैविक प्रमाणन पहाड़ी किसानों की आय बढ़ा सकता है, या यह मुख्य रूप से लागत और काग़ज़ी कार्रवाई बढ़ाता है?
प्रश्न 9 / 10
1. राज्य सरकारों को ग्राम पंचायत, ब्लॉक और ज़िला स्तर पर शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना है।
2. यदि कोई शिकायत निर्धारित प्रारूप में प्रस्तुत न की गई हो, तो उसका पंजीकरण अस्वीकार किया जा सकता है।
3. शिकायत केवल व्यक्तिगत रूप से या केंद्रीय डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के माध्यम से प्रस्तुत की जा सकती है, डाक से नहीं।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: नियमों में ‘राज्य सरकारों द्वारा ग्राम पंचायत, ब्लॉक और ज़िला स्तर पर बहुस्तरीय शिकायत निवारण तंत्र’ का प्रावधान है।
कथन 2 गलत है: ‘किसी भी शिकायत का पंजीकरण उसके प्रारूप, भाषा, प्रस्तुति के तरीक़े या किसी प्रक्रियागत कमी के आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता’।
कथन 3 गलत है: चार माध्यमों में व्यक्तिगत प्रस्तुति और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के अलावा डिलीवरी के प्रमाण के साथ स्पीड पोस्ट और टेलीफ़ोन या हेल्पलाइन भी शामिल हैं।
विश्लेषण: PIB ने 2 नवंबर 2026 को बताया कि ग्रामीण विकास मंत्रालय ने ये नियम अधिसूचित कर दिए हैं।
अवधारणा नोट
विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण), यानी VB-G RAM G, VB-G RAM G अधिनियम, 2025 के तहत चलने वाली योजना है। इसके शिकायत निवारण नियम, 2026 योजना के क्रियान्वयन से जुड़ी शिकायतों के लिए एक व्यवस्थित, बहुस्तरीय और समयबद्ध तंत्र बनाते हैं। राज्य सरकारों को इसे तीन स्तरों पर स्थापित करना है: ग्राम पंचायत, ब्लॉक और ज़िला; ज़िला स्तर पर शिकायत निवारण की निगरानी ज़िला कार्यक्रम समन्वयक करता है। कामगार चार तरीक़ों से शिकायत दर्ज करा सकता है: शिकायत निवारण अधिकारी के पास व्यक्तिगत रूप से, डिलीवरी के प्रमाण के साथ स्पीड पोस्ट से, केंद्रीय डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के ज़रिए, या टेलीफ़ोन, हेल्पलाइन अथवा राज्य द्वारा तय किसी अन्य माध्यम से। शिकायत उसी दिन पंजीकृत होनी है, और ऐसा संभव न हो तो अगले कार्य दिवस पर; साथ में एक पावती दी जानी है, जिसमें पंजीकरण संख्या, तिथि और शिकायत प्राप्त करने वाला प्राधिकारी दर्ज हो। किसी भी शिकायत को प्रारूप, भाषा या प्रक्रियागत कमी के आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता। जाँच सात कार्य दिवसों में पूरी होनी है और शिकायत प्राप्ति के 15 दिनों के भीतर उसका निवारण होना है; अनसुलझी शिकायत अगले उच्चतर स्तर पर भेजी जाती है, और अपीलें अधिनियम की अनुसूची I के अनुसार होती हैं।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS2 शासन, जवाबदेही और कमज़ोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ; GS3 ग्रामीण रोज़गार।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: शिकायत निवारण, समयबद्ध सेवा प्रदायगी, सामाजिक जवाबदेही, नागरिक-केंद्रित शासन।
सामान्य भूल: यह मान लेना कि किसी प्रक्रियागत दोष के आधार पर अधिकारी शिकायत अस्वीकार कर सकता है; नियम प्रारूप, भाषा या प्रक्रिया के आधार पर अस्वीकृति की मनाही करते हैं।
परीक्षा सुझाव: स्तर (ग्राम पंचायत, ब्लॉक, ज़िला) और समय-सीमाएँ (7 कार्य दिवसों में जाँच, 15 दिनों में निवारण) याद रखें।
साक्षात्कार का कोण: ग्रामीण कामगार किसी शिकायत तंत्र पर भरोसा किस वजह से करता है: काग़ज़ पर लिखे नियमों से या जवाब देने वाले अधिकारी से?
प्रश्न 10 / 10
1. भारत लौह अयस्क में काफ़ी हद तक आत्मनिर्भर है।
2. भारत अपनी कोकिंग कोयले की अधिकांश आवश्यकता घरेलू खदानों से पूरी करता है।
3. इस्पात मंत्रालय के राष्ट्रीय इस्पात नीति विज़न 2047 के मसौदे का लक्ष्य 2047 तक 604 मिलियन टन कच्चे इस्पात की क्षमता है।
4. राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017 ने क्षमता और प्रति व्यक्ति खपत के अपने लक्ष्य वर्ष 2047 के लिए निर्धारित किए थे।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
तथ्य: कथन 1 सही है: मसौदा नीति कहती है कि भारत ‘लौह अयस्क में काफ़ी हद तक आत्मनिर्भर’ है।
कथन 2 गलत है: यही मसौदा कहता है कि भारत ‘अपनी कोकिंग कोयले की आवश्यकता का लगभग 92% आयात करता है’।
कथन 3 सही है: मसौदे का लक्ष्य 2047 तक 604 MT कच्चे इस्पात की क्षमता, 302 kg प्रति व्यक्ति खपत और 45 MT निर्यात है।
कथन 4 गलत है: NSP 2017 ने ‘2030 - 31 तक’ 300 MT क्षमता, 255 MT उत्पादन और 158 kg प्रति व्यक्ति खपत का अनुमान रखा था।
विश्लेषण: मसौदे पर 30 अक्टूबर 2026 तक टिप्पणियाँ माँगी गई थीं; यह मसौदा है, अभी नीति नहीं बना है।
अवधारणा नोट
इस्पात मुख्य रूप से लौह अयस्क और कोकिंग कोयले से बनता है, और इन दोनों कच्चे मालों के मामले में भारत की स्थिति बिलकुल अलग है। इस्पात मंत्रालय के राष्ट्रीय इस्पात नीति विज़न 2047 के मसौदे के अनुसार भारत लौह अयस्क में काफ़ी हद तक आत्मनिर्भर है, लेकिन अपनी कोकिंग कोयले की आवश्यकता का लगभग 92 प्रतिशत आयात करता है, और इस्पात निर्माण की लागत में कच्चे माल का हिस्सा 65 से 70 प्रतिशत है। मसौदे में दर्ज है कि कच्चे इस्पात का उत्पादन 2014-15 के लगभग 89 MT से बढ़कर 2025-26 में 170 MT हो गया, और स्थापित क्षमता 220 MTPA है। 2047 के लिए इसका लक्ष्य 604 MT कच्चे इस्पात की क्षमता, 505 MT तैयार इस्पात की माँग, 302 kg प्रति व्यक्ति खपत और 45 MT निर्यात है, साथ ही उत्सर्जन तीव्रता को घटाकर प्रति टन कच्चे इस्पात पर 1.54 टन कार्बन डाइऑक्साइड करना है। हितधारक 30 अक्टूबर 2026 तक टिप्पणी दे सकते थे, इसलिए यह अभी नीति नहीं है। इससे पहले की राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017, जिसे मंत्रिमंडल ने 3 मई 2017 को मंज़ूरी दी थी, ने 2030-31 तक 300 MT क्षमता, 255 MT उत्पादन और 158 kg प्रति व्यक्ति खपत का अनुमान रखा था।
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प्रश्नपत्रों से जुड़ाव: GS1 प्रमुख प्राकृतिक संसाधनों का वितरण और उद्योगों की अवस्थिति; GS3 औद्योगिक नीति, अवसंरचना और जलवायु परिवर्तन।
मुख्य परीक्षा के प्रमुख शब्द: कच्चे माल की सुरक्षा, कोकिंग कोयले के आयात पर निर्भरता, क्षमता विस्तार, हरित इस्पात।
सामान्य भूल: दोनों नीतियों की समय-सीमाएँ आपस में मिला देना: NSP 2017 का लक्ष्य 2030-31 है, जबकि विज़न 2047 के मसौदे का लक्ष्य 2047।
परीक्षा सुझाव: यह अंतर याद रखें: लौह अयस्क काफ़ी हद तक घरेलू, कोकिंग कोयला ज़्यादातर आयातित; और आँकड़े 300 MT (2030-31) और 604 MT (2047)।
साक्षात्कार का कोण: क्या भारत को कोकिंग कोयले का आयात नई प्रौद्योगिकी से घटाना चाहिए या विदेशी खदानों के ज़रिए उसकी आपूर्ति सुरक्षित करनी चाहिए?