🗞️ चर्चा में क्यों Bar & Bench के मुताबिक़ सर्वोच्च न्यायालय ने 2 नवंबर 2026 को केंद्र सरकार की वह अपील ख़ारिज कर दी, जो दिल्ली उच्च न्यायालय के 1 जुलाई 2026 के फ़ैसले के ख़िलाफ़ थी। उच्च न्यायालय ने वेदांता लिमिटेड और रव्वा ऑयल (सिंगापुर) पीटीई लिमिटेड के पक्ष में 2004 और 2016 में दिए गए विदेशी माध्यस्थम् पंचाटों के प्रवर्तन की अनुमति दी थी। ये पंचाट कृष्णा-गोदावरी बेसिन के रव्वा तेल क्षेत्र के अनुबंध से जुड़े हैं। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कहा कि “यह नहीं कहा जा सकता कि उच्च न्यायालय ने कोई त्रुटि की है, विधि की किसी त्रुटि की तो बात ही छोड़िए”, और सरकार को चेताया: “कोई आप पर भरोसा नहीं करेगा।”

यह मामला उसी बेसिन का है जिसका एक और विवाद इन दिनों चर्चा में है, लेकिन दोनों अलग-अलग हैं। रिलायंस के नेतृत्व वाला KG-DWN-98/3 गैस प्रवासन (गैस माइग्रेशन) विवाद, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने 30 अक्टूबर 2026 को मध्यस्थता (mediation) के लिए भेजा, एक अलग ब्लॉक और 2000 के अनुबंध से जुड़ा है (पृष्ठभूमि 31 अक्टूबर के समाचार-संकलन में)।

सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा

Bar & Bench के मुताबिक़ पीठ ने “दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फ़ैसले के ख़िलाफ़ सरकार की चुनौती पर सुनवाई करते हुए माध्यस्थम् पंचाटों के प्रवर्तन को लेकर सरकार के रवैये पर सवाल उठाए”। रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणियाँ:

  • “ये कैसी दलीलें हैं? आप इस तरह एक माध्यस्थम् पंचाट को विफल कर रहे हैं? वह भी उसके प्रवर्तन के चरण में?”
  • माध्यस्थम् के प्रति सरकार के घोषित समर्थन पर न्यायालय ने टिप्पणी की, “और हम माध्यस्थम् और सीट और यह-वह, इन सब की बातें करते हैं।” न्यायालय का इशारा सम्मेलनों और सेमिनारों में होने वाली चर्चाओं की ओर था, जबकि पक्षकार तब भी प्रवर्तन का विरोध करते रहे।
  • न्यायालय ने कहा, “कोई आप पर भरोसा नहीं करेगा,” और चेताया कि इस तरह की मुक़दमेबाज़ी से माध्यस्थम् प्रक्रिया में भरोसा घट सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार पीठ ने गौर किया कि पहला पंचाट 2004 में और अंतिम पंचाट 2016 में दिया गया था। अपील ख़ारिज करने से पहले पीठ को “उच्च न्यायालय के निष्कर्षों में दख़ल देने का कोई कारण नहीं मिला”। केंद्र की ओर से पैरवी अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने की। यह नतीजा विधिक समाचार साइटों (Bar & Bench, Law Trend, LawChakra और India Legal) ने बताया है। इन रिपोर्टों में पीठ का निष्कर्ष उद्धृत है, लेकिन इनमें न तो किसी लिखित आदेश का पाठ है, न वह प्रावधान जिसके तहत केंद्र ने अपील की थी।

विवाद: 1994 के अनुबंध से 2026 की अपील तक

कालरेखा

रव्वा पंचाट: 1994 के अनुबंध से 2026 की अपील तक

इसमें अनुबंध, कुआलालंपुर के पंचाट, मलेशियाई अदालतें, नोटिस और भारत में प्रवर्तन का मामला शामिल हैं।

28 अक्टूबर 1994 रव्वा उत्पादन साझेदारी अनुबंध पर हस्ताक्षर अक्टूबर 2004 आंशिक पंचाट, स्थान कुआलालंपुर; राशि का निर्धारण खुला छोड़ा गया 2009 और 2011 मलेशियाई कोर्ट ऑफ़ अपील ने पंचाट बहाल किया; फ़ेडरल कोर्ट ने पुष्टि की जुलाई 2014 कारण बताओ नोटिसों में लगभग $99 मिलियन की माँग अक्टूबर 2016 पुनर्गठित अधिकरण का अंतिम पंचाट 2020 सर्वोच्च न्यायालय: प्रवर्तन पर अनुच्छेद 137, तीन वर्ष की परिसीमा 1 जुलाई 2026 दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रवर्तन की अनुमति दी; आपत्तियाँ ख़ारिज 2 नवंबर 2026 सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र की अपील ख़ारिज की (रिपोर्ट के अनुसार)
Bar & Bench की रिपोर्ट के अनुसार, 2004 के आंशिक पंचाट और 2026 की उस सुनवाई के बीच, जिसमें केंद्र की अपील ख़ारिज हुई, दो दशक से अधिक का अंतर है। पैमाने के अनुसार नहीं।

कालरेखा को बाएँ से दाएँ पढ़ें। पंचाट कुआलालंपुर को माध्यस्थम् की सीट (यानी विधिक स्थान) मानकर दिए गए और मलेशिया की अदालतों में उनकी परख हुई। इसके बाद भारत में उनके प्रवर्तन की माँग की गई, और सर्वोच्च न्यायालय ने अभी यही चरण बंद किया है।

अनुबंध। रव्वा क्षेत्र के लिए उत्पादन साझेदारी अनुबंध (PSC) पर 28 अक्टूबर 1994 को हस्ताक्षर हुए। वेदांता ने 2018 में पर्यावरण से जुड़ा जो ब्योरा दाख़िल किया, उसके मुताबिक़ यह क्षेत्र, यानी ब्लॉक PKGM-1, “बंगाल की खाड़ी में कृष्णा-गोदावरी बेसिन में, आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी ज़िले के उप्पलगुप्तम मंडल के सूरसानियानम गाँव के पास” है। इसी ब्योरे में रव्वा संयुक्त उद्यम के साझेदार ONGC, वेदांता लिमिटेड (केयर्न ऑयल एंड गैस), वीडियोकॉन पेट्रोलियम लिमिटेड और रव्वा ऑयल (सिंगापुर) बताए गए हैं, और वेदांता को इसका प्रचालक (ऑपरेटर) बताया गया है।

विवाद किस रकम का था। LiveLaw ने उच्च न्यायालय के फ़ैसले के हवाले से बताया कि PSC के तहत “लाभ पेट्रोलियम (profit petroleum) में सरकार का हिस्सा इस पर निर्भर था कि निजी संविदाकारों ने कितनी कर-पश्चात प्रतिफल दर (Post Tax Rate of Return) हासिल की।” संघ की दलील थी कि कुछ भुगतान “ONGC की पिछली लागतों को दर्शाते थे और उनसे लाभ पेट्रोलियम में उसका हिस्सा घट गया”।

माध्यस्थम् और मलेशिया की अदालतें। अनुबंध की व्याख्या से जुड़े विवाद कुआलालंपुर में माध्यस्थम् के लिए गए। अधिकरण ने अक्टूबर 2004 में आंशिक पंचाट दिया (India Legal के अनुसार 12 अक्टूबर 2004 को) और रकम का निर्धारण खुला छोड़ दिया। LiveLaw का ब्योरा: “कुआलालंपुर उच्च न्यायालय ने बाद में पंचाट को अपास्त कर दिया। मलेशिया के अपील न्यायालय ने सितंबर 2009 में उसे बहाल किया, और मलेशिया के संघीय न्यायालय ने अक्टूबर 2011 में उस निर्णय की पुष्टि की।”

नोटिस और अंतिम पंचाट। जुलाई 2014 में सरकार ने कारण बताओ नोटिस जारी कर कंपनियों से लगभग $99 मिलियन की वसूली माँगी (Bar & Bench); LiveLaw के मुताबिक़ इसमें USD 64 मिलियन वेदांता से और USD 35 मिलियन रव्वा ऑयल से माँगे गए। एक पुनर्गठित अधिकरण ने अक्टूबर 2016 में अंतिम पंचाट दिया (India Legal के अनुसार 26 अक्टूबर 2016 को)। LiveLaw के अनुसार इस पंचाट को “फ़रवरी 2019 में मलेशिया के संघीय न्यायालय ने बरक़रार रखा।”

उच्च न्यायालय ने प्रवर्तन की अनुमति क्यों दी

Bar & Bench के मुताबिक़ सरकार ने तीन आधारों पर प्रवर्तन का विरोध किया: परिसीमा, लोक नीति और अधिकरण का functus officio हो जाना (यानी उसका अधिदेश समाप्त हो चुका था)। दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने तीनों आपत्तियाँ ख़ारिज कर दीं। रिपोर्टों में उनका तर्क इस तरह आया है:

आपत्ति उच्च न्यायालय ने क्या कहा (रिपोर्टों के अनुसार)
परिसीमा “वर्तमान प्रवर्तन याचिका परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 137 के अनुसार परिसीमा अवधि के भीतर है, क्योंकि परिसीमा अवधि की घड़ी कारण बताओ नोटिस (SCN) जारी होने की तारीख़, अर्थात् 10.07.2014, से चलनी शुरू हुई” (Bar & Bench)
पहले ही तय हो चुके मुद्दे मुख्य आपत्तियों पर “माननीय सर्वोच्च न्यायालय भारत संघ बनाम वेदांता लिमिटेड (Union of India v. Vedanta Ltd.) मामले में पहले ही निर्णय कर चुका है” और “यह न्यायालय उन पर दोबारा नज़र नहीं डाल सकता, न उन्हें फिर से खोल सकता है” (Bar & Bench)
लोक नीति PSC के अनुसार कर-पश्चात प्रतिफल दर की गणना कैसे “की जानी चाहिए, यह मेरी समझ में कल्पना की किसी भी उड़ान में भारत की लोक नीति के कथित उल्लंघन तक नहीं ले जा सकता” (LiveLaw)
गुण-दोष धारा 48 “विवाद के गुण-दोष पर आपत्तियों को स्पष्ट रूप से बाहर रखती है” (Bar & Bench)
Functus officio अधिकरण ने “यह अधिकारिता बनाए रखी थी कि पक्षकार किसी सहमति पर न पहुँचें तो वह रकम का निर्धारण करेगा” (LiveLaw)

उच्च न्यायालय ने यह निर्देश भी दिया कि उसके अंतरिम आदेश के तहत दी गई बैंक गारंटियाँ “आठ सप्ताह के भीतर मुक्त की जाएँ” (LiveLaw)। वेदांता की पैरवी करने वाली फ़र्म शार्दुल अमरचंद मंगलदास ने SCC Online ब्लॉग पर एक नोट में इन गारंटियों को “वेदांता की ओर से दी गई लगभग 450 करोड़” की बताया; यह गारंटियों का मूल्य है, पंचाटों का नहीं।

2020 का फ़ैसला, जिस पर उच्च न्यायालय ने भरोसा किया। Bar & Bench ने लिखा कि भारत संघ बनाम वेदांता लिमिटेड मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले में “वही पक्षकार और वही उत्पादन साझेदारी अनुबंध शामिल थे”। सितंबर 2020 की LiveLaw रिपोर्ट के अनुसार न्यायालय ने कहा था कि धारा 47 और 49 के तहत विदेशी पंचाट के प्रवर्तन की परिसीमा अवधि “परिसीमा अधिनियम, 1963 के अनुच्छेद 137 से शासित होगी, जो आवेदन करने का अधिकार उत्पन्न होने की तारीख़ से तीन वर्ष की अवधि निर्धारित करता है”। साथ ही न्यायालय ने कहा था कि “विदेशी पंचाट के प्रवर्तन/निष्पादन पर परिसीमा अधिनियम का अनुच्छेद 136 लागू नहीं होगा, क्योंकि वह भारत में किसी सिविल न्यायालय की डिक्री नहीं है।”

इसके पीछे का क़ानून: भाग II और न्यूयॉर्क कन्वेंशन

प्रावधान क्या कहता है
धारा 44 विदेशी पंचाट की परिभाषा: वाणिज्यिक मतभेदों पर, 11 अक्टूबर 1960 को या उसके बाद, न्यूयॉर्क कन्वेंशन के तहत, ऐसे राज्यक्षेत्र में दिया गया पंचाट जिसे केंद्र ने पारस्परिकता वाला अधिसूचित किया हो
धारा 47 आवेदक को मूल पंचाट (या उसकी अधिप्रमाणित प्रति), माध्यस्थम् करार और यह साबित करने वाला साक्ष्य पेश करना होगा कि पंचाट विदेशी पंचाट है। स्पष्टीकरण के तहत, इस धारा और अध्याय की आगे की धाराओं में “न्यायालय” का अर्थ वह उच्च न्यायालय है जिसे पंचाट की विषय-वस्तु पर, अगर वह कोई वाद होता, मूल अधिकारिता होती; अन्य मामलों में वह उच्च न्यायालय जो अपने अधीनस्थ न्यायालयों की डिक्रियों के विरुद्ध अपीलें सुनता है
धारा 48(1) प्रवर्तन से “केवल तभी ... इनकार किया जा सकेगा” जब विरोध करने वाला पक्षकार गिनाए गए आधारों में से कोई एक साबित करे: असमर्थता, उचित सूचना न मिलना, पंचाट का सौंपे गए विषय से बाहर जाना, अधिकरण का अनियमित गठन या प्रक्रिया, या पंचाट का अभी बाध्यकारी न होना या “उस देश के, जिसमें या जिसकी विधि के अधीन वह पंचाट दिया गया था, किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा अपास्त या निलंबित” कर दिया जाना
धारा 48(2) न्यायालय तब भी इनकार कर सकता है जब विषय-वस्तु “भारत की विधि के अधीन माध्यस्थम् द्वारा निपटाए जाने योग्य नहीं है” या प्रवर्तन “भारत की लोक नीति के विरुद्ध होगा”
धारा 48 के स्पष्टीकरण लोक नीति का उल्लंघन “केवल तभी” होता है जब पंचाट कपट या भ्रष्टाचार से प्रेरित हो (या धारा 75 या धारा 81 के उल्लंघन में हो), “भारतीय विधि की मूलभूत नीति” का उल्लंघन करता हो, या “नैतिकता या न्याय की सर्वाधिक मूलभूत धारणाओं” से टकराता हो; मूलभूत नीति वाली कसौटी में “विवाद के गुण-दोष की समीक्षा अंतर्वलित नहीं होगी” (2016 के अधिनियम संख्यांक 3 द्वारा प्रतिस्थापित)
धारा 49 प्रवर्तनीय विदेशी पंचाट “उस न्यायालय की डिक्री समझा जाएगा”
धारा 50 धारा 45 के तहत पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए भेजने से इनकार करने वाले, या धारा 48 के तहत विदेशी पंचाट का प्रवर्तन करने से इनकार करने वाले आदेश के विरुद्ध अपील होती है; इससे सर्वोच्च न्यायालय में अपील का कोई अधिकार नहीं छिनता

“सीट” क्यों अहम है। पीठ की “सीट” वाली टिप्पणी इस व्यवस्था के एक बुनियादी नियम की ओर इशारा करती है। धारा 48(1)(e) के तहत भारतीय न्यायालय ऐसे पंचाट का प्रवर्तन ठुकरा सकता है जिसे “उस देश के, जिसमें या जिसकी विधि के अधीन वह पंचाट दिया गया था, किसी सक्षम प्राधिकारी” ने अपास्त कर दिया हो। रव्वा पंचाट कुआलालंपुर को सीट मानकर दिए गए थे, इसलिए वह देश मलेशिया था। इस मामले में सीट वाले देश की अदालतें अपनी बात कह चुकी थीं: कुआलालंपुर उच्च न्यायालय ने आंशिक पंचाट अपास्त किया, लेकिन अपील न्यायालय ने उसे बहाल किया और संघीय न्यायालय ने इसकी पुष्टि की। भारतीय अदालतों से केवल यह पूछा गया था कि उसका प्रवर्तन किया जाए या नहीं।

मुख्य परीक्षा की दृष्टि से: माध्यस्थम् में वादकारी के रूप में राज्य

संकेत। यह मामला दिखाता है कि भारतीय अदालतें भाग II के सीमित, प्रवर्तन-समर्थक आधारों को ही लागू कर रही हैं। उच्च न्यायालय ने गुण-दोष को दोबारा खोलने से इनकार किया। उसने माना कि अनुबंध की शर्तों पर विवाद “कल्पना की किसी भी उड़ान में” भारत की लोक नीति का उल्लंघन नहीं बन सकता, और जिस मुद्दे को सर्वोच्च न्यायालय इन्हीं पक्षकारों के बीच पहले ही निपटा चुका था, उसे बंद माना। सर्वोच्च न्यायालय की रिपोर्ट की गई टिप्पणियाँ इससे आगे जाती हैं: वे वादकारी के रूप में राज्य के आचरण को इस सवाल से जोड़ती हैं कि निवेशक और दूसरे पक्ष भारतीय माध्यस्थम् पर भरोसा करेंगे भी या नहीं।

देरी की क़ीमत। आंशिक पंचाट 2004 में और अंतिम पंचाट 2016 में आया; 2026 में भी उसके प्रवर्तन पर विवाद चल रहा था। विवाद यह था कि अनुबंध का एक फ़ॉर्मूला कैसे लागू हो, और उच्च न्यायालय को इसमें लोक नीति का कोई सवाल नहीं दिखा। फिर भी यह विवाद आंशिक पंचाट के दो दशक से ज़्यादा समय बाद तक अदालत में था। जब एक पक्षकार राज्य हो, तो वह किस तरह मुक़दमा लड़ता है, इसी से बाक़ी हर पक्ष की नज़र में पूरी व्यवस्था की छवि बनती है।

दूसरा पक्ष। सरकार की आपत्तियाँ ऐसे विधिक आधार थीं जिन्हें क़ानून मान्यता देता है: परिसीमा, लोक नीति और अधिकरण के अधिदेश की सीमाएँ। सरकार को सार्वजनिक राजस्व की रक्षा का अधिकार है, और लाभ पेट्रोलियम में उसका हिस्सा जनता का पैसा है। अदालतों का जवाब यह है कि ये आधार जान-बूझकर सीमित रखे गए हैं, और जिन दलीलों पर अदालत पहले ही फ़ैसला दे चुकी है, उन्हें दोहराना इन आधारों का इस्तेमाल नहीं है।

आगे क्या। सर्वोच्च न्यायालय के लिखित आदेश से पता चलेगा कि पीठ ने रिपोर्ट की गई पंक्ति से आगे कोई कारण दर्ज किए या नहीं। रिपोर्टों में सर्वोच्च न्यायालय के स्तर पर भुगतान से जुड़े किसी आदेश का ज़िक्र नहीं है। अब नज़र दो बातों पर रहेगी: उच्च न्यायालय के आदेश के मुताबिक़ वेदांता की बैंक गारंटियों का मुक्त होना, और पंचाटों के तहत असल वसूली।

UPSC प्रासंगिकता

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2: न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली; विवाद निवारण तंत्र और संस्थाएँ (माध्यस्थम्); महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और अभिसमय (न्यूयॉर्क कन्वेंशन)।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3: निवेश मॉडल; संसाधनों का संग्रहण और निवेश का माहौल (अनुबंध प्रवर्तन); अवसंरचना: ऊर्जा (तेल और गैस के उत्पादन साझेदारी अनुबंध)।

प्रारंभिक परीक्षा: माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 (भाग II; धारा 44, 47, 48, 49, 50); न्यूयॉर्क कन्वेंशन (भारत: हस्ताक्षर 1958, अनुसमर्थन 1960, 11 अक्टूबर 1960 से प्रवृत्त; पारस्परिकता और वाणिज्यिक आरक्षण); परिसीमा अधिनियम, 1963 का अनुच्छेद 137 (तीन वर्ष); कृष्णा-गोदावरी बेसिन; उत्पादन साझेदारी अनुबंध; functus officio।

मुख्य परीक्षा: “वादकारी के रूप में राज्य की भूमिका भारत की माध्यस्थम् व्यवस्था की विश्वसनीयता के केंद्र में है। विदेशी पंचाटों के प्रवर्तन पर हाल की न्यायिक टिप्पणियों के आलोक में विधिक ढाँचे का परीक्षण कीजिए और सुधार सुझाइए।” (सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2, 250 शब्द)

📌 तथ्य सार: ज्ञानकोश

प्रारंभिक परीक्षा: कथन-आधारित तथ्य:

  • 2 नवंबर 2026: न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनमोहन की सर्वोच्च न्यायालय पीठ ने केंद्र की अपील ख़ारिज की (Bar & Bench)
  • अपील दिल्ली उच्च न्यायालय के 1 जुलाई 2026 के फ़ैसले (न्यायमूर्ति जसमीत सिंह) के ख़िलाफ़ थी, जिसमें रव्वा पंचाटों के प्रवर्तन की अनुमति दी गई थी
  • पंचाट धारक: वेदांता लिमिटेड और रव्वा ऑयल (सिंगापुर) पीटीई लिमिटेड; 2004 (आंशिक) और 2016 (अंतिम) के पंचाट
  • माध्यस्थम् की सीट कुआलालंपुर; रव्वा PSC पर 28 अक्टूबर 1994 को हस्ताक्षर; क्षेत्र (ब्लॉक PKGM-1) कृष्णा-गोदावरी बेसिन में
  • जुलाई 2014 के कारण बताओ नोटिसों में कंपनियों से लगभग $99 मिलियन माँगे गए
  • विदेशी पंचाट: माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 का भाग II; धारा 48 में इनकार के केवल गिनाए गए आधार
  • धारा 49: प्रवर्तनीय विदेशी पंचाट न्यायालय (धारा 47 के तहत उच्च न्यायालय) की डिक्री समझा जाता है
  • न्यूयॉर्क कन्वेंशन, भारत: हस्ताक्षर 10 जून 1958, अनुसमर्थन 13 जुलाई 1960, 11 अक्टूबर 1960 से प्रवृत्त
  • विदेशी पंचाट के प्रवर्तन की परिसीमा: तीन वर्ष, परिसीमा अधिनियम, 1963 का अनुच्छेद 137 (सर्वोच्च न्यायालय, 2020)

प्रारंभिक परीक्षा: संभावित भ्रामक बिंदु:

  • भारत के दो आरक्षण: पारस्परिकता (केवल संविदाकारी राज्यों के पंचाट) और केवल वाणिज्यिक विवाद
  • धारा 48 में लोक नीति के केवल तीन शीर्ष: कपट या भ्रष्टाचार (या धारा 75 या धारा 81 का उल्लंघन), भारतीय विधि की मूलभूत नीति, नैतिकता या न्याय की मूलभूत धारणाएँ
  • विदेशी पंचाट भारत में किसी सिविल न्यायालय की डिक्री नहीं है, इसलिए अनुच्छेद 136 लागू नहीं होता (सर्वोच्च न्यायालय, 2020)
  • 450 करोड़ रुपये (वेदांता के वकील शार्दुल अमरचंद मंगलदास का नोट) बैंक गारंटियों का मूल्य है, पंचाटों का नहीं
  • रव्वा (ब्लॉक PKGM-1, 1994 का PSC) वह रिलायंस KG-DWN-98/3 विवाद नहीं है, जिसे 30 अक्टूबर 2026 को मध्यस्थता के लिए भेजा गया

मुख्य परीक्षा: तर्क और प्रमुख शब्दावली:

  • न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप, गुण-दोष की कोई समीक्षा नहीं, पंचाटों की अंतिमता; वादकारी के रूप में राज्य का आचरण निवेशकों के भरोसे को आकार देता है
  • प्रमुख शब्द: न्यूयॉर्क कन्वेंशन, माध्यस्थम् की सीट, functus officio, लोक नीति, परिसीमा, उत्पादन साझेदारी अनुबंध

साक्षात्कार: इनके लिए तैयार रहें:

  • “क्या सरकार को कभी किसी विदेशी पंचाट का विरोध करना चाहिए?” हाँ, क़ानून में दिए गए सीमित आधारों पर, लेकिन पहले से तय मुद्दों को दोहराकर नहीं।

स्रोत: Bar & Bench, “Nobody will trust you: Supreme Court slams Centre for stalling enforcement of 2004, 2016 arbitral awards”, 2 नवंबर 2026; Law Trend, LawChakra और India Legal की सुनवाई से जुड़ी रिपोर्टें, 2 नवंबर 2026; Bar & Bench, दिल्ली उच्च न्यायालय के फ़ैसले पर रिपोर्ट, जुलाई 2026; LiveLaw Business, दिल्ली उच्च न्यायालय के फ़ैसले पर रिपोर्ट, जुलाई 2026; SCC Online ब्लॉग (शार्दुल अमरचंद मंगलदास, वेदांता के वकील), जुलाई 2026; LiveLaw, विदेशी पंचाटों की परिसीमा पर सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले की रिपोर्ट, सितंबर 2020; माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996, धारा 44, 47, 48, 49 और 50; UNCITRAL, status of the Convention on the Recognition and Enforcement of Foreign Arbitral Awards (New York, 1958); Vedanta Ltd, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के पास दाख़िल रव्वा ब्लॉक का सारांश, 2018।

  • टिप्पणी: उद्धरण-चिह्नों में दिए गए विधिक और आधिकारिक अंश अंग्रेज़ी पाठ के हिंदी अनुवाद हैं।