उद्धरण-योग्य पंक्ति
“भारत आज चीन के साथ शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रह सकता है, और चीन भारत के साथ।” (एम.के. नारायणन, द हिंदू, 31 अक्टूबर 2026)
यह संपादकीय आपकी परीक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है
चर्चा में: 31 अक्टूबर 2026 को द हिंदू के मुख्य लेख (लीड) “Can India and China coexist peacefully?” (क्या भारत और चीन शांति से साथ रह सकते हैं?) में पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या भारत और चीन शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रह सकते हैं, और उत्तर दिया है कि हाँ, रह सकते हैं।
अख़बार ने लेखक का परिचय इस तरह दिया है: “एम.के. नारायणन आसूचना ब्यूरो के पूर्व निदेशक, पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल हैं”। इस साइट पर भारत-चीन से जुड़ी हाल की सामग्री के लिए देखें: सीमावर्ती क्षेत्रों पर विदेश मंत्रालय (अंग्रेज़ी), सुबनसिरी और अपर सियांग बाँधों पर हमारी रिपोर्ट (अंग्रेज़ी), भारत-चीन व्यापार पर ख़बर (अंग्रेज़ी), लद्दाख के 28 स्थानों के मानक नाम (अंग्रेज़ी) और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्लेनम पर द इंडियन एक्सप्रेस।
यूपीएससी के लिए प्रासंगिकता:
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2: भारत और उसका पड़ोस; भारत से जुड़े द्विपक्षीय समझौते; भारत-चीन संबंध।
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3: सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियाँ और उनका प्रबंधन।
- प्रारंभिक परीक्षा: 1993, 1996 और 2005 के सीमा समझौते; 2005 के समझौते के अनुच्छेद I और VII; विशेष प्रतिनिधि तंत्र (2003); डब्ल्यूएमसीसी (2012); गलवान (2020)।
- निबंध और साक्षात्कार: प्रतिद्वंद्वी पड़ोसी के साथ संबंधों का प्रबंधन; समाधान के बिना शांति।
60 शब्दों में सार
एम.के. नारायणन के अनुसार भारत-चीन संबंधों को सबसे सही ढंग से प्रबंधित सह-अस्तित्व कहा जा सकता है, जिसे गश्त के दौरान हर आमना-सामना खतरे में डालता है। उनके विचार में न 1962 और न गलवान दोनों के बीच की दूरी को पूरी तरह समझाते हैं। राजीव गांधी की 1988 की यात्रा को लेख एक प्रकाश-स्तंभ मानता है, हालाँकि वह अवसर बाद में ‘गँवा दिया गया’; 2005 के समझौते में वह प्रमाण देखता है कि चीन ‘जानता है कब झुकना है’, और निष्कर्ष निकालता है कि दोनों देश शांति से साथ रह सकते हैं।
एम.के. नारायणन का तर्क है कि भारत और चीन शांतिपूर्वक साथ रह सकते हैं, क्योंकि संघर्ष से किसी को लाभ नहीं है और चीन ने दिखाया है कि वह ‘जानता है कब झुकना है’, बशर्ते दोनों एक-दूसरे को सही ढंग से समझें।
- उनके शब्दों में आज के संबंध ‘प्रबंधित सह-अस्तित्व’ हैं, जिन पर तनाव इसलिए है कि गश्त के दौरान हर ‘विचलन’ को ‘आमना-सामना’ (फेस-ऑफ) मान लिया जाता है।
- नारायणन के विचार में न 1962 का संघर्ष और न 2020 की गलवान झड़प दोनों सभ्यताओं के बीच की दूरी को पूरी तरह समझाती है; लेख ठीक से सीमांकित न की गई सीमा को भी इसका एक कारण बताता है।
- नारायणन के अनुसार राजीव गांधी की 1988 की यात्रा एक ‘निर्णायक मोड़’ थी, जिससे सीमा प्रश्न पर अलग से चर्चा संभव हुई।
- उनका तर्क है कि भारत चीन का ‘असली प्रतिद्वंद्वी’ नहीं है, कि संघर्ष चीन को कई वर्ष पीछे धकेल देगा, और कि चीन की सैन्य बढ़त एक ‘मिथक’ है।
सरकार के अनुसार गलवान में हिंसा इसलिए हुई क्योंकि ‘चीनी पक्ष एलएसी के ठीक पार ढाँचे खड़े करना चाहता था और ऐसी गतिविधियों से बाज़ आने से इनकार कर रहा था’, और विदेश मंत्रालय ने दर्ज किया है कि अप्रैल-मई 2020 में पूर्वी लद्दाख की घटनाओं से संबंधों पर ‘प्रतिकूल प्रभाव’ पड़ा। सैन्य संतुलन पर नारायणन के आकलन उनके अपने हैं; लेख इनके लिए कोई आँकड़ा नहीं देता।
नारायणन का आग्रह है कि दोनों देशों की सेनाओं और सीमा रक्षकों तक संदेश पहुँचें ताकि गलवान दोहराया न जाए, अनजाने में होने वाली कार्रवाई से बचा जाए और भारत चीन के इरादों को बेहतर समझे। हमारा विश्लेषण: विशेष प्रतिनिधि वार्ता और डब्ल्यूएमसीसी को सक्रिय रखें, दोनों पक्षों को एलएसी का सम्मान करने की 1993 की प्रतिबद्धता पर कायम रखें और भारत की क्षेत्रीय अखंडता पर दृढ़ रहें।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
आधिकारिक रिकॉर्ड में प्रमुख पड़ाव
| वर्ष | कदम | आधिकारिक रिकॉर्ड में |
|---|---|---|
| 1950 | राजनयिक संबंध स्थापित | ऐसा करने वाला भारत “पहला गैर-समाजवादी गुट का देश” (विदेश मंत्रालय) |
| 1962 | सीमा संघर्ष | “द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक झटका” (विदेश मंत्रालय) |
| 1988 | प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा | “द्विपक्षीय संबंधों में सुधार की शुरुआत हुई” (विदेश मंत्रालय) |
| 1993 | एलएसी पर शांति और स्थिरता बनाए रखने संबंधी समझौता | दोनों पक्ष एलएसी का सम्मान और पालन करेंगे |
| 1996 | एलएसी पर सैन्य क्षेत्र में विश्वास-निर्माण उपायों संबंधी समझौता | 29 नवंबर 1996 को हस्ताक्षरित |
| 2003 | प्रधानमंत्री वाजपेयी की यात्रा; एसआर तंत्र की स्थापना | “संबंधों और व्यापक सहयोग के सिद्धांतों पर घोषणा” (विदेश मंत्रालय) |
| 2005 | चीनी प्रधानमंत्री (प्रीमियर) वेन जियाबाओ की यात्रा, अप्रैल | “शांति और समृद्धि के लिए रणनीतिक और सहयोगात्मक साझेदारी”; राजनीतिक मापदंडों संबंधी समझौता |
| 2012 | डब्ल्यूएमसीसी की स्थापना | एसआर वार्ता के 15वें दौर में हुए समझौते से |
| 2020 | पूर्वी लद्दाख में घटनाएँ, अप्रैल-मई; गलवान में हिंसा | संबंधों पर “प्रतिकूल प्रभाव” (विदेश मंत्रालय) |
| 2024 | गश्त व्यवस्था पर समझौता; कज़ान में नेताओं की भेंट, 23 अक्टूबर; एसआर वार्ता का 23वाँ दौर, बीजिंग, 18 दिसंबर | “2020 के सभी टकराव बिंदुओं से सैनिकों की वापसी”; “लगभग पाँच वर्षों में पहली पूर्ण प्रतिनिधिमंडल-स्तरीय वार्ता” (विदेश मंत्रालय) |
| 2025 | एसआर वार्ता का 24वाँ दौर, नई दिल्ली, 19 अगस्त; मोदी-शी भेंट, 31 अगस्त; एससीओ शिखर सम्मेलन, तियानजिन, 1 सितंबर; कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर शुरू; अक्टूबर में सीधी उड़ानें फिर शुरू | यात्रा “लगभग पाँच वर्ष के अंतराल के बाद” फिर शुरू हुई (विदेश मंत्रालय) |
| 2026 | रणनीतिक वार्ता, नई दिल्ली, 10 फरवरी; डब्ल्यूएमसीसी की 35वीं बैठक, बीजिंग, मई; 36वीं बैठक, नई दिल्ली, 6 अगस्त; एसआर वार्ता का 25वाँ दौर, बीजिंग, 25 अगस्त | अब तक डब्ल्यूएमसीसी की 36 बैठकें और एसआर वार्ता के 25 दौर; 26वाँ दौर 2027 में भारत में होना है |
2005 का समझौता क्या कहता है
इसका पूरा नाम है “भारत गणराज्य की सरकार और चीन जनवादी गणराज्य की सरकार के बीच भारत-चीन सीमा प्रश्न के समाधान के लिए राजनीतिक मापदंडों और मार्गदर्शक सिद्धांतों पर समझौता”। इस पर 11 अप्रैल 2005 को नई दिल्ली में, चीनी प्रीमियर वेन जियाबाओ की यात्रा के दौरान, हस्ताक्षर हुए। इसकी प्रस्तावना 1993 और 1996 के समझौतों का स्मरण करती है और उल्लेख करती है कि “दोनों पक्षों ने विशेष प्रतिनिधि नियुक्त किए हैं”।
- अनुच्छेद I: “कोई भी पक्ष किसी भी तरीके से दूसरे के विरुद्ध बल का प्रयोग नहीं करेगा या बल प्रयोग की धमकी नहीं देगा।”
- अनुच्छेद VII: “सीमा समाधान पर पहुँचते समय दोनों पक्ष सीमावर्ती क्षेत्रों में अपनी बसी हुई आबादी के उचित हितों की रक्षा करेंगे।”
सरकार के शब्दों में गलवान
पृष्ठभूमि के तौर पर, 19 जून की सर्वदलीय बैठक पर 20 जून 2020 के पीआईबी वक्तव्य में दो बातें दर्ज थीं:
- “15 जून को गलवान की घटनाएँ, जिनमें 20 भारतीय सैन्यकर्मियों की जान गई”;
- “15 जून को गलवान में हिंसा इसलिए हुई क्योंकि चीनी पक्ष एलएसी के ठीक पार ढाँचे खड़े करना चाहता था और ऐसी गतिविधियों से बाज़ आने से इनकार कर रहा था।”
विश्लेषण
नारायणन का तर्क
- प्रबंधित सह-अस्तित्व। नारायणन ने लिखा है: “चीन और भारत के बीच आज के संबंधों को सबसे अच्छे ढंग से प्रबंधित सह-अस्तित्व कहा जा सकता है”। लेख के अनुसार यह स्थिति “समस्याग्रस्त साबित हो रही है”, क्योंकि गश्त के दौरान हर “विचलन” को “आमना-सामना” मान लिया जाता है।
- अतीत वर्तमान को पूरी तरह नहीं समझाता। नारायणन की दृष्टि में 1962 का संघर्ष आंशिक रूप से माओ के “अहंकार” का परिणाम था, हालाँकि लेख यह भी दर्ज करता है कि इतिहासकार इसके दूसरे कारण भी बताते हैं। उनके विचार में गलवान एक “अनोखी घटना” है, जो “दोनों सभ्यताओं के बीच मौजूद दूरी” को पूरी तरह नहीं समझा सकती।
- स्वयं सीमा। अरुणाचल प्रदेश सेक्टर के बारे में नारायणन ने लिखा है: “असली खलनायक शायद जितने चीनी हैं, उतनी ही मैकमोहन रेखा भी है, जिसने ठीक से सीमांकित न की गई सीमा पीछे छोड़ दी।”
- 1988 का मॉडल। राजीव गांधी की यात्रा, जिसमें उन्होंने देंग शियाओपिंग जैसे नेताओं से भेंट की, नारायणन के शब्दों में “एक नया निर्णायक मोड़” थी, जिसने “सीमा प्रश्न पर अलग से चर्चा संभव बनाई”। लेख को अफ़सोस है कि यह अवसर “बाद में दोनों पक्षों के नेताओं ने गँवा दिया”।
- बाहरी कारक। नारायणन के विचार में क्वाड ने गतिरोध को और गहरा किया है, और चीनी रणनीतिकार मानते हैं कि अमेरिकी योजनाओं में भारत की भूमिका “चीन को घेरने की एक चाल” है।
- डरने का कोई कारण नहीं। भारत “किसी भी तरह चीन का सहयोगी नहीं है”, लेकिन “यह मानना दूर की कौड़ी है कि भारत उसका असली प्रतिद्वंद्वी है”। लेख के अनुसार संघर्ष “चीन को कई वर्ष पीछे धकेल देगा”। लेख चीन की सैन्य बढ़त को एक “मिथक” बताता है और मानता है कि “ऊँचे हिमालय के विवादित क्षेत्रों में किसी भी देश को बढ़त हासिल नहीं है”।
- चीन जानता है कब झुकना है। इसके प्रमाण के रूप में लेख 2005 के समझौते और उसके अनुच्छेद I और VII का हवाला देता है।
जहाँ लेख को दोबारा परखना ज़रूरी है
- 2005 का समझौता। लेख इसे “राष्ट्रपति हू जिंताओ के दौर” में रखता है और इसे “दीर्घकालिक रचनात्मक और सहयोगात्मक साझेदारी को बढ़ावा देने” का समझौता बताता है। विदेश मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार इस पर नई दिल्ली में प्रीमियर वेन जियाबाओ की यात्रा के दौरान हस्ताक्षर हुए और इसका विषय सीमा समाधान के मापदंड हैं; उस यात्रा में जिस साझेदारी का नाम लिया गया, वह “शांति और समृद्धि के लिए रणनीतिक और सहयोगात्मक साझेदारी” थी। उस समय हू जिंताओ चीन के राष्ट्रपति थे, लेकिन यह समझौता प्रीमियर की यात्रा से जुड़ा है।
- गलवान। लेख इसे “चीनी और भारतीय गश्ती दलों के बीच” झड़प कहता है। सरकार का विवरण ऊपर दिया गया पीआईबी का कथन है: एलएसी के ठीक पार चीनी ढाँचे, और उनसे बाज़ आने से इनकार।
- क्षेत्र। लेख “विवादित क्षेत्रों” और लद्दाख तथा अरुणाचल प्रदेश में “क्षेत्र गँवाने” की बात करता है। उत्तर में भारत का पक्ष स्पष्ट लिखें: अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश भारत के अभिन्न अंग हैं।
- सैन्य संतुलन। यह कि चीन की बढ़त एक “मिथक” है, और यह कि भारत “ऊँचे हिमालय में चीन की क्षमताओं का भरपूर मुकाबला करने में सक्षम है”, लेखक के अपने आकलन हैं; लेख इनके लिए कोई आँकड़े नहीं देता।
लेख कहाँ मज़बूत है, और कहाँ रुक जाता है
- मज़बूत पक्ष: यह संबंधों के प्रबंधन को सीमा के समाधान से अलग रखता है, और आधिकारिक तंत्र भी इसी तरह काम करते हैं; अनजाने में होने वाली कार्रवाई के प्रति इसकी चेतावनी एलएसी का सम्मान करने की 1993 की प्रतिबद्धता से मेल खाती है।
- मज़बूत पक्ष: यह खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर आँकने का विरोध करता है, जो उस बहस में एक उपयोगी सुधार है जो अक्सर हर घटना को संकट मान लेती है।
- यहाँ लेख ठहर जाता है: उन बातों पर, जो रोज़-रोज़ के संबंधों को सबसे ज़्यादा प्रभावित करती हैं: व्यापार, नदियाँ और यारलुंग त्सांगपो पर बाँध (ऊपर के लिंक देखें), और यह कि 2024 के गश्ती समझौते से वास्तव में कितना सैन्य आश्वासन मिला है।
- साक्ष्य कमज़ोर हैं ठीक वहीं, जहाँ दावे सबसे बड़े हैं: सैन्य संतुलन और चीनी सोच पर।
आगे की राह
- तंत्रों को सक्रिय रखें। एसआर वार्ता और डब्ल्यूएमसीसी के नियमित दौर हर घटना को संकट बनने से पहले बातचीत का एक माध्यम देते हैं।
- अगला गलवान रोकें। नारायणन ने लिखा है कि “फिर भी, दोनों देशों की सेनाओं और सीमा रक्षकों तक संदेश पहुँचाने होंगे”, ताकि ऐसा दोबारा न हो; एलएसी का सम्मान करने की 1993 की प्रतिबद्धता इसकी आधार-रेखा है।
- चीन को बेहतर समझें। उनकी चेतावनी कि “चीन को गलत समझना भारत को बहुत महँगा पड़ेगा”, सरकार और विश्वविद्यालयों में चीन संबंधी गहरी विशेषज्ञता की आवश्यकता की ओर इशारा करती है।
- मज़बूती के साथ संवाद करें। संवाद और तैयारी साथ-साथ चलते हैं, और अपने क्षेत्र पर भारत का पक्ष बातचीत का विषय नहीं है।
आँकड़े और संस्थाएँ
प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य:
समझौते:
- 1993: एलएसी पर शांति और स्थिरता बनाए रखने संबंधी समझौता, बीजिंग में हस्ताक्षरित, 7 सितंबर 1993
- 1996: एलएसी पर सैन्य क्षेत्र में विश्वास-निर्माण उपायों संबंधी समझौता, 29 नवंबर 1996
- 2005: सीमा प्रश्न के समाधान के लिए राजनीतिक मापदंड और मार्गदर्शक सिद्धांत, नई दिल्ली, 11 अप्रैल 2005, प्रीमियर वेन जियाबाओ की यात्रा के दौरान
- 2005, अनुच्छेद I: किसी भी तरीके से बल का प्रयोग या उसकी धमकी नहीं; अनुच्छेद VII: सीमावर्ती क्षेत्रों में बसी हुई आबादी के उचित हितों की रक्षा
तंत्र:
- विशेष प्रतिनिधि (एसआर) तंत्र: स्थापना 2003; 25 दौर; 24वाँ नई दिल्ली, 19 अगस्त 2025; 25वाँ बीजिंग, 25 अगस्त 2026; 26वाँ दौर 2027 में भारत में होना है
- डब्ल्यूएमसीसी: एसआर वार्ता के 15वें दौर में हुए समझौते से, नई दिल्ली, जनवरी 2012; 36 बैठकें, सबसे हाल की नई दिल्ली, 6 अगस्त 2026
प्रमुख पड़ाव:
- राजनयिक संबंध: 1 अप्रैल 1950; चीन जनवादी गणराज्य के साथ संबंध स्थापित करने वाला भारत पहला गैर-समाजवादी गुट का देश
- गलवान, 15 जून 2020: 20 भारतीय सैन्यकर्मियों ने अपनी जान गँवाई (पीआईबी)
- गश्ती समझौता, अक्टूबर 2024; कज़ान में नेताओं की वार्ता, 23 अक्टूबर 2024
- सीधी उड़ानें अक्टूबर 2025 में फिर शुरू; कैलाश मानसरोवर यात्रा 2025 में फिर शुरू
⚠️ संभावित भ्रामक बिंदु:
- 2005 का समझौता प्रीमियर वेन जियाबाओ की यात्रा के दौरान हुआ, राष्ट्रपति हू जिंताओ की किसी यात्रा में नहीं
- 2005 का समझौता सीमा के मापदंड तय करता है; शांति और समृद्धि के लिए रणनीतिक और सहयोगात्मक साझेदारी उसी यात्रा का एक अलग परिणाम है
- एलएसी सीमा का समाधान नहीं है: 1993 का समझौता कहता है कि इसके उल्लेख किसी भी पक्ष के रुख पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालते
- एसआर तंत्र 2003 से है; डब्ल्यूएमसीसी 2012 से
वाद-विवाद
| सह-अस्तित्व टिक सकता है (नारायणन का पक्ष) | सावधानी के कारण |
|---|---|
| संघर्ष से किसी पक्ष को लाभ नहीं; युद्ध चीन को कई वर्ष पीछे धकेल देगा | 1993, 1996 और 2005 के समझौतों और एसआर वार्ता के बावजूद गलवान में हिंसा हुई |
| चीन “जानता है कब झुकना है”, जैसा 2005 में दिखा | 2005 में झुकने से सिद्धांत तय हुए, सीमा नहीं |
| यह धारणा कि भारत के लिए चीन का खतरा “गंभीर” है, “हित समूहों द्वारा फैलाया गया मिथक” है | लेख इस आकलन के लिए कोई आँकड़ा नहीं देता |
| 1988 के दृष्टिकोण ने सीमा पर अलग से चर्चा का रास्ता खोला | 2020 के बाद से सीमा ने पूरे संबंध को प्रभावित किया है: लगभग पाँच वर्षों में नेताओं की पहली पूर्ण प्रतिनिधिमंडल-स्तरीय वार्ता गश्ती समझौते के बाद ही हो पाई |
संतुलित निष्कर्ष: नारायणन का मूल दावा, कि शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व संभव है और संघर्ष किसी के हित में नहीं, 2024 के बाद के कदमों की उचित व्याख्या है। उनका तर्क वहाँ सबसे कमज़ोर है जहाँ वह बिना साक्ष्य के सैन्य खतरे को खारिज करता है; उत्तर में उनके ढाँचे को अपनाएँ, लेकिन उसके साथ तैयारी की बात भी जोड़ें।
इस विषय पर कैसे सोचें
- प्रबंधन और समाधान को अलग रखें। एसआर वार्ता और डब्ल्यूएमसीसी जैसे तंत्र सीमा का समाधान किए बिना शांति बनाए रखते हैं; उन्हें इस आधार पर परखें कि उन्होंने कितनी घटनाएँ रोकीं।
- स्मृति नहीं, रिकॉर्ड पढ़ें। किसी पूर्व अधिकारी का लेख एक मूल्यवान दृष्टिकोण है, लेकिन तारीखें, हस्ताक्षरकर्ता और शर्तें समझौतों के पाठ से ही लें।
- दोनों बातें साथ रखें। संवाद और प्रतिरोधक क्षमता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं: दोनों एक-दूसरे को विश्वसनीय बनाते हैं।
आरेख में समझें
1993: एलएसी का सम्मान → 1996: सैन्य विश्वास-निर्माण → 2003: एसआर तंत्र → 2005: राजनीतिक मापदंड (अनुच्छेद I और VII) → 2012: डब्ल्यूएमसीसी → 2020: पूर्वी लद्दाख की घटनाएँ और गलवान → 2024: गश्ती समझौता और सैनिकों की वापसी → 2025-26: वार्ता, यात्रा और उड़ानें फिर शुरू
इसे बाएँ से दाएँ पढ़ें: 2020 से पहले का हर कदम रेखा के प्रबंधन का एक रास्ता बनाता गया; 2020 में इन सबकी परीक्षा हुई, और 2024 के बाद के कदमों ने संबंधों को फिर से खड़ा किया।
'प्रबंधित सह-अस्तित्व' आज के भारत-चीन संबंधों का एक वर्णन है। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बनाए रखने में सीमा समझौतों और संवाद तंत्रों की भूमिका का परीक्षण कीजिए तथा दोनों देशों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संभावनाओं का आकलन कीजिए। (250 शब्द)
भारत और चीन की साझा सीमा अभी तय नहीं हुई है। समाधान होने तक 1993 का समझौता दोनों पक्षों को ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा का कड़ाई से सम्मान और पालन’ करने के लिए प्रतिबद्ध करता है। 2020 के बाद के वर्षों ने दिखाया है कि इस रेखा पर एक घटना कितना तनाव पैदा कर सकती है, और यह भी कि संवाद तंत्र उसे संभालने में कितने सक्षम हैं।
यह ढाँचा कई परतों में बना है। भारत ने 1 अप्रैल 1950 को चीन जनवादी गणराज्य के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने संबंधी 1993 के समझौते के बाद 1996 में सैन्य क्षेत्र में विश्वास-निर्माण उपायों पर समझौता हुआ, 2003 में सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधि तंत्र बना और 2005 में राजनीतिक मापदंडों और मार्गदर्शक सिद्धांतों पर समझौता हुआ। इस समझौते का अनुच्छेद I कहता है कि कोई भी पक्ष किसी भी तरीके से दूसरे के विरुद्ध बल का प्रयोग नहीं करेगा या बल प्रयोग की धमकी नहीं देगा, और अनुच्छेद VII दोनों पक्षों से सीमावर्ती क्षेत्रों में बसी अपनी आबादी के उचित हितों की रक्षा करने को कहता है। परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र (डब्ल्यूएमसीसी) जनवरी 2012 के एक समझौते से बना। अप्रैल-मई 2020 में पूर्वी लद्दाख की घटनाओं और 15 जून 2020 को गलवान की हिंसा ने, जिसमें 20 भारतीय सैन्यकर्मियों ने अपनी जान गँवाई, संबंधों को पीछे धकेल दिया। अक्टूबर 2024 में गश्त व्यवस्था पर हुए समझौते के फलस्वरूप 2020 के सभी टकराव बिंदुओं से सैनिकों की वापसी हुई। इसके बाद 2024 में कज़ान में नेताओं की वार्ता हुई, अगस्त 2025 में विशेष प्रतिनिधि वार्ता का 24वाँ दौर हुआ, 2025 में कैलाश मानसरोवर यात्रा और अक्टूबर 2025 में सीधी उड़ानें फिर शुरू हुईं, अगस्त 2026 में डब्ल्यूएमसीसी की 36वीं बैठक हुई और 25 अगस्त 2026 को बीजिंग में विशेष प्रतिनिधि वार्ता का 25वाँ दौर हुआ। सीमा अब भी अनसुलझी है, इसलिए हर कदम विवाद को सुलझाता नहीं, बल्कि उसका प्रबंधन करता है।
शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व संभव है, लेकिन इसका प्रबंधन करना होगा: तंत्रों को सक्रिय रखकर, समाधान होने तक एलएसी का सम्मान करके, सीमा पर समर्पित माध्यमों से बातचीत जारी रखते हुए संबंधों का दायरा बढ़ाकर, और संवाद के साथ तैयारी को जोड़कर। इस पूरी प्रक्रिया में भारत का पक्ष अडिग है: अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश भारत के अभिन्न अंग हैं।
साक्षात्कार का कोण
"एक पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने लिखा है कि भारत के लिए चीन के खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर आँका जाता है। क्या आप इससे सहमत हैं, और चीन के साथ संवाद तथा वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तैयारी के बीच आप संतुलन कैसे बनाएँगे?"
मुख्य निष्कर्ष
- ढाँचा: नारायणन के शब्दों में “प्रबंधित सह-अस्तित्व”; सीमा समाधान के बिना शांति।
- पाठ: 1993 का समझौता (एलएसी का सम्मान) और 2005 का समझौता (अनुच्छेद I: बल प्रयोग नहीं; अनुच्छेद VII: बसी हुई आबादी), जिस पर प्रीमियर वेन जियाबाओ की यात्रा के दौरान हस्ताक्षर हुए।
- माध्यम: एसआर तंत्र (2003) और डब्ल्यूएमसीसी (2012)।
- भारत का पक्ष: अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश भारत के अभिन्न अंग हैं।
स्रोत:
- The Hindu, एम.के. नारायणन, “Can India and China coexist peacefully?”, 31 अक्टूबर 2026
- Ministry of External Affairs, India-China bilateral brief, जुलाई 2026
- Ministry of External Affairs, Agreement on the Political Parameters and Guiding Principles for the Settlement of the India-China Boundary Question, 2005
- Ministry of External Affairs, Foreign Relations 2005
- Agreement on the Maintenance of Peace and Tranquillity along the Line of Actual Control in the India-China Border Areas, 7 सितंबर 1993
- PIB, Prime Minister’s Office, 19 जून 2020 की सर्वदलीय बैठक पर वक्तव्य, 20 जून 2020
- टिप्पणी: उद्धरण-चिह्नों में दिए गए विधिक और आधिकारिक अंश अंग्रेज़ी पाठ के हिंदी अनुवाद हैं।